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जरूरी है कोविड की जांच बढ़ाना और सच का सामना

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  July 02, 2020

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक कोविड-19 से अब तक 16,000 से अधिक जानें गई हैं। कुल मौत के मामले में भारत विश्व में आठवें पायदान पर है। प्रति 10 लाख लोगों में मौत की बात करें तो करीब 11 मौतें हुई हैं। यह आंकड़ा ब्रिटेन, स्पेन और इटली जैसे देशों से काफी कम है जहां प्रति 10 लाख 600 लोगों ने जान गंवाई है।

इन आंकड़ों को दो तरह से देखा जा सकता है। आप इन्हें आशावादी और निराशावादी नजरिया कह सकते हैं लेकिन यदि अधिक सटीक ढंग से कहना तो इन्हें देखने के वास्तविक तरीकों में बांटा जा सकता है। आशावादी नजरिये से भारत या भारतीयों के पास कुछ विशेष है जिसके कारण कोविड-19 सही मायनों में पकड़ नहीं बना पा रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि हमारी प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है, दूसरों का दावा है कि ऐसा शुरुआती दौर में बरती गई कड़ाई की वजह से हो सकता है। यह सही है कि भारत में आबादी की औसत उम्र, ज्यादा नुकसान उठाने वाले यूरोपीय देशों की तुलना में कम है। परंतु प्रति व्यक्ति कम मृत्यु दर को समझने के लिए केवल इतना काफी नहीं है।

यदि हकीकत पर नजर डाली जाए तो ऐसे सवाल उठते हैं जो स्वयं आंकड़ों पर प्रश्न करते हैं। इस विषय पर डेटा रिपोर्टर रुक्मिणी एस ने, जो इस विषय को लगातार कवर कर रही हैं, कहा है कि भारत में महामारी के जोर पकडऩे के पहले से ही बीमारियों से होने वाली मौत के आंकड़े दिक्कतदेह रहे हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2017 में मलेरिया से 200 मौत होने की बात कही गई थी जबकि वास्तविक आंकड़ा इससे 250 गुना अधिक होने की आशंका है। बहुत संभव है कि महामारी के दौरान मौत के आंकड़े और भी कम गिने जाएं। हमने ऐसी रिपोर्ट देखी हैं जिनके मुताबिक कोविड-19 के संभावित पीडि़तों को अस्पताल में जगह नहीं दी गई या फिर श्वसन की गंभीर बीमारी से मरने वालों की कोरोना जांच नहीं की गई।

संक्षेप में कहें तो देश के बड़े हिस्सों से आ रहे मौत के आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। वुहान में मौत के आंकड़ों की एक मात्र विश्वसनीय जानकारी अंत्येष्टि गृहों के इस्तेमाल की जानकारी जुटाकर हासिल की जा रही थी। आशा करते हैं कि हमें कभी उस स्थिति में न जाना पड़े।

देश के अंदरूनी हिस्सों में ऐसी तमाम खबरें हैं कि कैसे लोगों को बिना किसी सूचना के जला दिया गया या दफना दिया गया ताकि संक्रमण न फैले। कई बार तो पुजारी तक को नहीं बुलाया गया। यह बात मुझे स्मरण कराती है कि हमें अभी एक प्रभावी राज्य बनने के लिए बहुत लंबा सफर तय करना है।

यकीनन अगर हम ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे की क्षमता चरमराती हुई नजर आने लगे तो काफी देर हो चुकी है। यह सुझाव देना सही नहीं है कि हम उस समय सबसे बुरे हालात से निपटने की तैयारी करें जबकि बुरे हालात आ चुके हैं।

ऐसे में हम वहीं पहुंच जाते हैं जो बात हम एकदम आरंभ से जानते थे: एक खुली पारदर्शी और व्यापक जांच नीति। हमें केवल उन संपर्कों की जांच नहीं करनी चाहिए जिन पर संदेह है बल्कि सभी संदेहास्पद लोगों की जांच की जानी चाहिए और ऐंटीबॉडी जांच की उपलब्धता बढ़ानी चाहिए। ऐसा करने से विभिन्न समुदायों में तेजी से वायरस के संक्रमण की जांच की जा सकेगी।

कोई भी राज्य, शासन या सरकार अगर खतरे को नागरिकों से छिपाती है तो इससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता है। देश के नागरिकों को भय की नहीं बल्कि सूचना की आवश्यकता है। निवेशकों और अर्थव्यवस्था को भी इसी की आवश्यकता है।

कई राज्य सरकारें अतीत में जांच के मोर्चे पर पिछड़ गई हैं। कुछ ने आंशिक तौर पर अपनी स्थिति बेहतर की है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल को अब यह स्वीकार करना पड़ा है जांच दर में सुधार हो रहा है। अन्य जगह हालात अधिक बुरे हैं। तेलंगाना प्रति 10 लाख महज 2,000 लोगों की जांच कर रहा है जबकि पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में यह आंकड़ा 15,000 प्रति 10 लाख है।

ऐसे में अति आत्मविश्वास घातक है। कर्नाटक में कुछ सप्ताह पहले इतनी आत्मसंतुष्टि दिख रही थी कि मुख्यमंत्री  बीएस येदियुरप्पा बेंगलूरु के सांसद के साथ एमटीआर में मसाला दोसा खाते नजर आए लेकिन महज चंद रोज बाद ही मामलों में तेज इजाफे के चलते बेंगलूरु में नए सिरे से लॉकडाउन लागू करना पड़ा।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो वह हर मामले में विशिष्ट है। प्रधानमंत्री ने इसकी तारीफ की और अपने राजनीतिक आकाओं के निर्देश पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने आगरा मॉडल के नाम पर एक प्रस्तुति तैयार की। मैं कहना चाहूंगा कि ये बातें प्रमाणों के सामने नहीं टिकतीं लेकिन प्रमाण हैं ही नहीं। समाचार पत्र द हिंदू की डेटा टीम के अनुसार पारदर्शिता के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे खराब है। समाचार एजेंसियों के अनुसार मुख्यमंत्री ने शिकायत की कि उन्हें सही आंकड़े नहीं मिल रहे हैं। ऐसा तब हुआ जब स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े अन्य स्वतंत्र जांचकर्ताओं की तुलना में ऊंचे नजर आने लगे। बेहद कमजोर जांच दर के बावजूद संक्रमितों की तादाद का कम होना एक पहेली है। उत्तर प्रदेश के राजनेता सोच सकते हैं कि यह भी बस एक और संकट है जिसमें खबरों की सुर्खियों का प्रबंधन करने की आवश्यकता बस है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है।

हर राज्य सरकार के लिए जवाब एक ही है जो पहले था: जितनी ज्यादा संभव हो जांच करें, चिह्नित करें, पता लगाएं, लक्षित ढंग से लॉकडाउन करें और रोकथाम जोन बनाएं। जब तक टीका नहीं बन जाता इसे दोहराएं। तथ्यों को छिपाने या अति आत्मविश्वास में आने का कोई फायदा नहीं है। वायरस इन बातों से बेपरवाह है।

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