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जनहित याचिकाओं पर अदालतों का विरोधाभासी रुख

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  July 01, 2020

लॉकडाउन में कोरोना संक्रमण के मामले बढऩे के साथ ही अदालतों में दायर होने वाली जनहित याचिकाओं (पीआईएल) की संख्या भी बढ़ी है। पीआईएल की अवधारणा को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने 1980 में आत्मसात किया तो न्यायपालिका के भीतर से ही इसे विरोध का सामना करना पड़ा था। जब एक एक्टिविस्ट पीठ ने पीआईएल पर सुनवाई के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को आगरा के एक महिला पुनर्वास गृह में बिजली, पंखे और साफ शौचालय मुहैया कराने के बारे में निर्देश दिया था तो एक न्यायाधीश ने ही यह कहते हुए इसकी सार्वजनिक मंच से आलोचना की थी कि अब लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय ही इस घर को चला रहा है। पिछले हफ्तों में पीआईएल पर दिए गए आदेश ऐसे लगेंगे मानो अदालतों ने कोविड संकट के प्रबंधन की बागडोर संभाल ली है और सरकार ने अपना कार्य न्यायपालिका के हाथों में सौंप दिया है।

न्यायाधीश कोविड संकट के समय छोटे से छोटे मामलों में भी अधिकारियों को आदेश दे रहे हैं। मसलन, उड़ान भरने वाले विमानों में शारीरिक दूरी के नियम का पालन करने के लिए बीच वाली सीट को खाली रखा जाए या फिर जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा के दौरान किस तरह के मानक तय किए जाएं। सार्वजनिक हित की भावना से प्रभावित होकर ऐसी याचिकाएं दायर करने वाले नागरिकों के पक्ष में आदेश देने के साथ ही न्यायाधीश मीडिया रिपोर्टों पर भी स्वत: संज्ञान लेकर आदेश जारी कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश कदम खुद सरकार की तरफ से ही अदालतों के किसी अंकुश के बगैर उठाए जा सकते थे लेकिन संकट की इस घड़ी में केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया आपाधापी वाली रहने से अदालतों को बीच में उतरना पड़ा है। दूसरे देशों में सरकारों को कोविड संकट के समय पीआईएल के जरिये चाबुक नहीं लगानी पड़ी है, उन्होंने न्यायपालिका के दबाव एवं धक्के के बगैर खुद ही वह काम किए जो वे कर सकते हैं।

पीआईएल का अचरज में डालने वाला एक और पहलू यह है कि कार्यपालिका ने चुपचाप अदालतों के न्याय-क्षेत्र को स्वीकार कर लिया है। सरकार अपने दायरे में प्रवेश करने के लिए अदालतों की प्रस्थिति को लेकर मुखर रही है। भले ही अदालतें कार्यपालिका की सीमा में काफी भीतर तक घुस चुकी हैं लेकिन उसे लेकर आलोचना की सुगबुगाहट भी नहीं सुनाई देती है। बोझ को चुपचाप न्यायाधीशों पर डाल दिया गया है, चाहे वह भलाई के लिए हो या बुरे के लिए।

ऐसे किसी भी कदम के साथ यह खतरा है कि अनिर्वाचित न्यायाधीशों का मन अस्थिर हो सकता है। सार्वजनिक मुद्दों पर जारी आदेशों की समीक्षा करने से यह पता चलेगा कि किसी  न्यायाधीश का नजरिया एवं निजी झुकाव भी इन याचिकाओं का भविष्य तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। एक न्यायाधीश का बाहरी ताकतों से प्रभावित नहीं होना और निरपेक्ष सोच रखना महज किताबी बातें हैं।

खुद न्यायविदों ने ही अपने निर्णयों में इसकी पुष्टि की है। बार एसोसिएशन की लाइब्रेरी में अक्सर यह टिप्पणी सुनी जाती है कि 'बताओ, न्यायाधीश कौन है? फिर मैं तुम्हें कानून के बारे में बताता हूं।' कहा जाता है कि कृत्रिम मेधा किसी मसले पर किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगा सकती है।

न्यायपालिका की ताकत एवं कमजोरी कभी भी इतनी स्पष्ट नहीं रही है जितनी कोरोना संकट के समय पीआईएल का निपटारा करते समय नजर आई है। न्यायाधीशों ने संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए परस्पर विरोधी आदेश पारित किए। मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि भूखे-प्यासे एवं पैदल ही अपने घरों की तरफ लौट रहे लाखों श्रमिकों की तस्वीरों को देखकर अपने आंसू नहीं रोक पा रहे हैं। दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने पीआईएल दायर करने वालों से पूछा कि 'हम उन्हें पटरियों पर चलने से कैसे रोक सकते हैं?' उन्होंने सरकार की वह बात मान ली कि इन श्रमिकों का ठीक से ख्याल रखा जा रहा है। इस प्रकरण ने 1976 के बंदी प्रत्यक्षीकरण  मामले में आई उस टिप्पणी की याद दिला दी जिसमें आपातकाल के दौरान कैदियों की 'मां जैसी देखभाल' का दावा किया गया था। उन शब्दों ने सत्ता में बैठे लोगों का पक्ष लिया था।

हालांकि जब कुछ वरिष्ठ वकीलों के समूह का पत्र अदालत को मिला तो उसका दिल पसीज गया। इस पत्र में प्रवासी मजदूरों को पेश आ रही समस्याओं और उन पर अन्य अदालतों के रवैये के बारे में बताया गया था। वैसे यह बहुत देर से उठाया गया और नाकाफी कदम था, फिर भी शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों के रुख का ही अनुसरण किया। पीठ में बदलाव का भी असर पड़ा था। दरअसल अलग न्यायाधीशों वाले पीठों के पास मामले जाने के आश्चर्यजनक नतीजे हो सकते हैं। गुजरात उच्च न्यायालय के एक पीठ ने अहमदाबाद सिविल अस्पताल 'अंधेरा कैदखाना' बताया था लेकिन दूसरे पीठ के पास जब यह मामला गया तो उसके न्यायाधीश अस्पताल प्रबंधन के नजरिये से कुछ हद तक सहमत दिखे। यह मौत की सजा को लेकर 'न्यायिक अनिश्चितता' होने पर दिवंगत न्यायाधीश पी एन भगवती की टिप्पणी की याद दिलाता है। उन्होंने कहा था, 'मैं मरने जा रहा हूं या जिंदा रहूंगा, यह इससे तय होगा कि अदालती पीठों का गठन किस तरह होता है?' पीठों का संयोजन महज प्रक्रियागत मामला नहीं है, इसमें मुख्य न्यायाधीश का पूर्ण विवेकाधिकार होता है। हाल के  वर्षों में पीठों का गठन काफी चर्चा में रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने अपने संवाददाता सम्मेलन में इस मसले को खुलकर उठाया था। वैसे सर्वोच्च अदालत के 31 न्यायाधीश एक तरह नहीं सोच सकते हैं लेकिन पीआईएल की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों में समाज की नब्ज पहचानने की क्षमता और उसके हिसाब से कदम उठाने की मंशा जरूर होनी चाहिए।

इंसाफ की देवी आंखों पर पट्टी बंधे होने से भले ही फरियादियों को देख नहीं पाएं लेकिन पीआईएल एक अपवाद है जब इस पट्टी को खोलकर समाज में हो रही हलचल देखनी चाहिए।

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