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लंबी मुकदमेबाजी से भारत से हमारी निकासी को झटका

देव चटर्जी /  June 28, 2020

बीएस बातचीत

दक्षिण अफ्रीका की कंपनी बिडवेस्ट ने करीब 18 महीने पहले मुंबई इंटरनैशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (मायल) में अपनी हिस्सेदारी बेचने का निर्णय लिया था लेकिन साझेदार जीवीके द्वारा शुरू की गई मुकदमेबाजी के कारण यह लेनदेन पूरा नहीं हो सका। जीवीके ने पहले इनकार करने के अधिकार के आधार पर अदालत का रुख किया था। बिडवेस्ट की निवेश इकाई बिड सर्विसेज डिविजन मॉरिशस के निदेशक रॉरी मैकी ने देव चटर्जी से बातचीत में कहा कि लंबी चलने वाली कानूनी प्रक्रिया देश को एक पसंदीदा एफडीआई गंतव्य बनाने के लिहाज से कोई मिसाल कायम नहीं करेगी। पेश हैं मुख्य अंश:


बिडवेस्ट मायल में अपनी हिस्सेदारी बेचने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसकी निकासी की राह आसान नहीं दिख रही है। आखिर समस्या क्या है?

हम 2006 से ही मायल का एक निवेशक हैं। हमने एयरपोट्र्स कंपनी साउथ अफ्रीका (एसीएसए) एवं जीवीके के साथ मिलकर मुंबई हवाई अड्डे के लिए बोली मंगाई थी। शुरू में मायल में हमारी 27 फीसदी हिस्सेदारी थी जबकि एसीएसए की 10 फीसदी और जीवीके की 37 फीसदी हिस्सेदारी थी। शेष हिस्सेदारी भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पास थी। मायल में विदेशी निवेशकों की बराबर हिस्सेदारी थी। बाद में बिडवेस्ट ने अपनी कुछ हिस्सेदारी जीवीके को बेच दी थी। मायल में बिडवेस्ट की हिस्सेदारी अब महज 13.5 फीसदी है। इसलिए हमने अपने गैर-प्रमुख निवेश को समेटने की योजना बनाई। इसी क्रम में 2017 में रॉथ्सचाइल्ड ऐंड कंपनी को किसी संभावित खरीदार तलाशने के लिए नियुक्त किया गया। साझेदार होने के नाते हमने जीवीके और एसीएसए से भी संपर्क किया और उन्होंने हिस्सेदारी खरीदने की इच्छा जताई थी। लेकिन रॉथ्सचाइल्ड ने संभावित खरीदार के तौर पर अदाणी की पहचान की और जनवरी 2019 में उनकी गंभीर मंशा को भांपते हुए हमने जीवीके को अपना पहला नोटिस भेजा। लेकिन जीवीके ने अदालत का रुख करने का निर्णय लिया। उसके बाद हम लंबी  और महंगी मुकदमेबाजी में उलझ गए।


जीवीके के पास पहले इनकार करने का अधिकार था, उसका पक्ष क्या था?

पहले इनकार करने के अधिकार के कारण ही हमने जनवरी 2019 में जीवीके को सबसे पहले नोटिस जारी किया था। इसी तरह 2011 में भी हमने नोटिस जारी किया था जब अपनी हिस्सेदारी उन्हें बेची थी। लेकिन इस बार जीवीके ने तकनीकी मुद्दा उठाया और विस्तृत जानकारी मांगी। उसके बाद हमने मार्च 2019 में दोबारा नोटिस जारी किया और उन्हें 30 दिनों का समय दिया। जीवीके ने हमें पहले इनकार करने के अधिकार का उल्लेख करते हुए जवाब भेजा लेकिन उन्होंने निर्धारित 30 दिनों के भीतर लेनदेन पूरा करने में असमर्थता जताई। उसके बाद जीवीके ने दिल्ली उच्च न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी और अदालत ने मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू कर दी।

क्या आपने जीवीके के साथ बातचीत शुरू की थी?

जीवीके को हमारी हिस्सेदारी खरीदने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया और उसके बाद एएआई का अधिकार हो जाता है। जीवीके का कहना है कि इस खरीदारी के लिए समय-सीमा में विस्तार किया जाए ताकि इसमें मंजूरियां हासिल करने के लिए आवश्यक समय को भी शामिल किया जा सके। लेकिन जीवीके का पक्ष मायल के शेयरधारिता अनुबंध की शर्तों के खिलाफ है। यदि हमने लेनदारों के साथ-साथ एएआई को भी न केवल आवेदन भेजा बल्कि यह भी कहा कि आवेदन मायल द्वारा तैयार किया गया है। चूंकि जीवीके के पास नियंत्रण योग्य हिस्सेदारी नहीं है, इसलिए उसने ऐसा कोई आवेदन नहीं किया। जुलाई 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि जीवीके को हमारे शेयर खरीदने के लिए गंभीरता दिखानी होगी। लेकिन अपील करने पर यह मामला मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया गया। मामला फिलहाल अदालत में लंबित है। इस प्रकार महंगी मुकदमेबाजी हमारे ऊपर थोप दिया गया। इस प्रकार की मुकदमेबाजी भारत को एक पसंदीदा एफडीआई गंतव्य बनाने के लिहाज से सही नहीं है।


क्या आपने जवीके होल्डिंग कंपनी के अन्य निवेशकों से संपर्क किया?

हमने निवेशकों को नोटिस दिया और वे हमारे विकल्पों का आकलन कर रहे हैं। वास्तव में हमने जनवरी 2019 में ही पहले इनकार करने के अधिकार संबंधी नोटिस जारी किया था और उस समय कोई निवेशक नहीं था। लेकिन 18 महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने लेनदेन पूरा नहीं किया है।


क्या कोविड-19 के कारण व्यवधान के बावजूद अदाणी समूह अभी भी मायल में दिलचस्पी दिखा रहा है?

मायल में उनकी दिलचस्पी लगातार बनी हुई है और वे हमारे साथ किए गए शेयर खरीद समझौते का सम्मान करते हैं। कोविड-19 के कारण हवाई यात्रा में हुए व्यवधान को कुछ ही महीनों में सुचारु कर लिया गया। मायल जाहिर तौर पर भारतीय विमानन क्षेत्र की प्रमुख परिसंपत्ति होगी।


आपने अपनी निकासी योजना के साथ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की थी। उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?

मैंने दिसंबर में दिल्ली की यात्रा की थी और एएआई के अधिकारियों से मुलाकात की थी। साथ ही हमने नागर विमानन मंत्रालय को पत्र भी लिखा था। हम उम्मीद करते हैं कि वे जल्द से जल्द इस मामले को निपटाने में मदद करेंगे।

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