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रघुवंश प्रसाद की विदाई के साथ एक समाजवादी प्रयोग का अंत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 27, 2020

पूर्व केंद्रीय मंत्री और मनरेगा के सूत्रधार रघुवंश प्रसाद सिंह ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही बिहार में एक सामाजिक प्रयोग समाप्त हो गया है। मार्च 1990 का समय था। कुछ महीने पहले ही विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे और देवीलाल उनके नायब थे। चुनावों के बाद संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में हुई जनता दल की संसदीय दल की बैठक में चंद्र्रशेखर नाराज हो गए थे। कहा जाता है कि देवीलाल के अंतिम क्षणों में वीपी सिंह के पक्ष में चले जाने की वजह से चंद्र्रशेखर गुस्सा थे। देवीलाल ने चंद्रशेखर को समर्थन देने का भरोसा दिलाया था लेकिन उनके साथ न देने से वी पी सिंह प्रधानमंत्री बन गए।

आम चुनावों के कुछ ही महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें किसी को भी बहुमत नहीं मिला। जनता केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर जॉर्ज फर्नांडिस और अजित सिंह को 10 मार्च, 1990 को पटना भेजा गया ताकि मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया संपन्न कराई जाए। वह कोई सामान्य मुकाबला नहीं बल्कि छद्म युद्ध था। पार्टी के शीर्ष नेताओं की प्रतिष्ठा इससे जुड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री चुने जाने को लेकर उपजी कड़वाहट के बाद वी पी सिंह यह दिखाना चाहते थे कि उन्होंने राजनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। वहीं देवीलाल यह बताना चाहते थे कि असली प्रधानमंत्री तो वही हैं और वीपी महज कठपुतली हैं। चंद्रशेखर के लिए यह दिखाने का मौका था कि समाजवादी विरासत के असली वारिस वही हैं।

ऐसी स्थिति में बिहार के नए मुख्यमंत्री के लिए रामसुंदर दास, रघुनाथ झा और लालू प्रसाद के बीच मुकाबला होना तय था। रामसुंदर का समर्थन वीपी और फर्नांडिस दोनों ही कर रहे थे जबकि रघुनाथ को चंद्र्रशेखर का समर्थन था, वहीं लालू को देवीलाल का वरदहस्त था। ये तीनों उम्मीदवार 'समाजवाद के अक्षयपात्र' बिहार में समाजवाद की अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। 

पटना में हालात थोड़े अलग थे। वरिष्ठ समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर का 1988 में निधन हो चुका था और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर चारों तरफ असमंजस था। कर्पूरी के विश्वस्त सहयोगियों के तौर पर दो-तीन युवा नेता उभरे थे जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की उपज थे। नीतीश कुमार कुर्मी बिरादरी के थे तो लालू यादव जाति के थे जबकि रघुवंश ठाकुर थे।

नीतीश और रघुवंश दोनों ही आपातकाल के दौरान जेल गए थे। लालू बौद्धिक स्तर पर उनके समकक्ष नहीं थे लेकिन शब्दों की बाजीगरी एवं भाषण-कला में माहिर होने से उन्हें भी इस टीम में एक अहम खिलाड़ी माना जाता था। नीतीश और रघुवंश दोनों ही 1990 के चुनाव को बिहार में मध्यवर्ती जातियों के जड़वत एवं थोपे गए नेतृत्व से छुटकारा पाने के मौके के तौर पर देख रहे थे। यह नेतृत्व लोहिया और कर्पूरी ठाकुर की देन था।

लिहाजा जब लालू ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की तो उन्हें तगड़ा समर्थन मिला। नीतीश के साथ होने से संख्या में छोटा होते हुए भी प्रभावी स्थान रखने वाले कुर्मी समुदाय का समर्थन मिल गया। वहीं रघुवंश से वैशाली, शिवहर, सीतामढ़ी और रोहतास के राजपूतों का साथ मिला। उन्होंने लालू को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए पूरा जोर लगाया।

विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री पद के लिए हुआ वह चुनाव सही मायने में चुनाव था, न कि बस दिखावा। उस चुनाव में लालू को 58 मत मिले थे जबकि रघुनाथ को सिर्फ 14 विधायकों का साथ मिला।

उस समय रघुवंश का लालू को आगे बढ़ाने के पीछे क्या मकसद था? भले ही आज यह बात हास्यास्पद लगे लेकिन वह उनका आदर्शवाद था। रघुवंश गणित में पीएचडी हैं। वह सीतामढ़ी के एक कॉलेज में शिक्षक थे। लेकिन आपातकाल के दौरान अपने समाजवादी विचारों की वजह से उन्हें जेल में डाल दिया गया। उन्हें नौकरी से भी बर्खास्त कर दिया गया। फिर उन्होंने राजनीति को ही अपना व्यवसाय बना लिया।

बिहार में साठ और सत्तर के दशक बड़े बदलाव वाले थे। राजनीति का मतलब ही बगावत माना जाता था। भारत में बिहार ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां अगड़ी जातियों के नेताओं ने लोहिया के 'चौखंभा राज्य' की संकल्पना को लागू करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

बिहार के ऊंची जाति वाले समाजवादियों ने सामाजिक दबावों का सामना अपने ही तरीके से करने की कोशिश की। कुछ ने अपने उपनाम छोड़ दिए तो कुछ ने अपनी जातिगत पहचान कायम रखते हुए भी अपनी मनोदशा में बदलाव लाने की कोशिश की। रघुवंश दूसरी तरह के समाजवादी नेता थे। लालू को नेता बनाने के बाद नीतीश और रघुवंश दोनों को अहसास हुआ कि उनकी अपनी सीमाएं हैं। लालू सोशल इंजीनियरिंग में तो माहिर थे लेकिन प्रशासक के तौर पर उनमें विजन नहीं था। उनकी सोच भी लोकतांत्रिक नहीं थी, चाटुकारों से घिरे रहते थे और आलोचना उन्हें तनिक भी बरदाश्त नहीं थी।

ऐसी स्थिति में नीतीश जनता दल छोड़कर चले गए लेकिन रघुवंश के पास कोई रास्ता नहीं था। वह लालू का साथ नहीं छोड़ सकते थे। कभी-कभार वह लालू की किसी हरकत पर हल्की मुस्कान के साथ अपनी प्रतिक्रिया देते और इस्तीफे को नकार देते।

बिहार में राजपूत बिरादरी के एक अन्य समाजवादी नेता जगदानंद सिंह थे। रघुवंश और जगदानंद के बीच हमेशा ही संदेह का रिश्ता रहा। लालू ने रघुवंश की असुरक्षा को बढ़ाने के लिए हमेशा ही जगदानंद को बढ़ावा दिया। जब जगदानंद को गत नवंबर में राजद का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्तकिया गया तो रघुवंश को दीवार पर लिखी इबारत साफ नजर आने लगी। लेकिन 2014 के चुनाव में उन्हें हराने वाले रमाकिशोर सिंह को राजद में शामिल कराया गया तो उनके पास बाहर जाने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचा था।

अब बिहार में एक अलग समय है। यह एक अलग जगह भी है जहां रघुवंश प्रसाद के लिए बहुत सीमित विकल्प रह गए हैं।

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