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प्रवर्तकों के लिए अधिक शेयर रखने पर सेबी का नया फरमान

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  June 22, 2020

यह एक ऐसा असाधारण कदम है जिसने सबको अचरज में डाल दिया है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अधिग्रहण संबंधी नियमों में संशोधन करने के बाद इस वित्त वर्ष में कोई खुली पेशकश लाए बगैर सूचीबद्ध कंपनियों में पांच फीसदी मताधिकार को अतिरिक्त बढ़ाया जा सकता है। खुली पेशकश लाने की बाध्यता को निलंबित करने की सुविधा केवल प्रवर्तकों के लिए ही उपलब्ध है और वह भी तब जब कंपनी में पैसे लगाकर हिस्सेदारी में वृद्धि की जा रही है और वह भी केवल चालू वित्त वर्ष में ही।

अधिग्रहण नियमों के मुताबिक जब कोई व्यक्ति 25 फीसदी या उससे अधिक मताधिकार हासिल कर लेता है तो उसके लिए दूसरे शेयरधारकों से अतिरिक्त 26 फीसदी हिस्सेदारी जुटाने के लिए एक खुली पेशकश रखना बाध्यकारी होता है। जिन लोगों के पास पहले से ही 25 फीसदी से अधिक मताधिकार हैं, उन्हें ऐसी खुली पेशकश तभी करनी होती है जब वे एक ही वित्त वर्ष में पांच फीसदी या उससे अधिक हिस्सेदारी लेना चाहते हों। लेकिन सेबी के हालिया फैसले के बाद अब केवल प्रवर्तकों को ही खुली पेशकश किए बगैर पांच फीसदी हिस्सेदारी के अधिग्रहण की छूट होगी और यह सुविधा केवल मौजूदा वित्त वर्ष के लिए ही होगी।

सेबी के इस कदम को दिलचस्प बनाने वाले तीन पहलू हैं। प्रवर्तक सेबी से इस आधार पर राहत की गुहार लगाते रहे हैं कि महामारी की वजह से उनके कारोबार में तमाम दिक्कतें पैदा हो गई हैं। प्रगतिशील नियामकीय नीति की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता है लेकिन ऐसे कदमों के वास्तविक आकार काफी विवादित भी हो सकते हैं।

पहला, सूचीबद्धता संबंधी नियमों को मुल्तवी किए जाने तक की मांगें कुछ क्षेत्रों से आती रही हैं, ऐसे में गैर-सूचीबद्धता नियम के अनुपालन में छूट के लिए प्रयास करने भर को गलत बताना, प्रवर्तकों को मौकापरस्त करार देना एवं संकट के समय फायदा उठाने की कोशिश करार देना ठीक नहीं है। इसके बजाय सूचीबद्धता खत्म करने संबंधी नियम सार्वजनिक शेयरधारकों के हाथों में ताकत देते हैं जो कंपनी को बाजार से सूचीबद्धता खत्म करने के लिए जरूरी शेयरों की खरीद का भाव अपने हिसाब से तय कर सकते हैं। अगर शेयरधारकों द्वारा तय की गई कीमत प्रवर्तक के लिए बहुत अधिक है तो गैर-सूचीबद्धता की कोशिश नाकाम हो जाएगी। वहीं अगर प्रवर्तक इस भाव पर शेयर खरीदने को तैयार हो जाता है तो भी बाजार से सूचीबद्धता खत्म करने के लिए प्रवर्तक के पास 90 फीसदी शेयरों का स्वामित्व होना जरूरी है।

सेबी का नया कदम प्रवर्तक के लिए वित्तीय परिसंपत्तियां खरीदने के बजाय कारोबार में पैसा लगाने को प्रोत्साहित करता है। और इस प्रक्रिया में उन्हें खुली पेशकश लाए बगैर पांच फीसदी की बढ़ी हिस्सेदारी मिलती है। किसी भी कंपनी में अधिक फंड डालने से उस कंपनी का मूल्य बढ़ जाएगा जिसका फायदा आगे चलकर सभी शेयरधारकों को हो सकता है। नया नियम आने के बाद किसी कंपनी का प्रवर्तक यह सोचने को मजबूर हो सकता है कि वह गैर-सूचीबद्धता की महंगी प्रक्रिया से गुजरकर अपना मताधिकार बढ़ाए या फिर खुली पेशकश लाने में अपनी ऊर्जा लगाए बगैर अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ले और उसके साथ अपने कारोबार में नया निवेश भी कर ले।

दूसरा, प्रवर्तकों को खास तौर पर अधिक शेयर रख सकने वाले व्यक्तियों के तौर पर वर्गीकृत करने का केवल यही मतलब है कि शेयर अधिग्रहण बढऩे से कंपनी पर नियंत्रण में कोई बदलाव नहीं हुआ है। एक प्रवर्तक को ऐसे शख्स के तौर पर परिभाषित किया जाता है जो पहले से ही सूचीबद्ध कंपनी का नियंत्रण रखता है। ऐसे में प्रवर्तक को अधिक शेयर रखने की अनुमति देने और वह भी वरीय आवंटन के जरिये, तो उससे कंपनी पर नियंत्रण में कोई परेशानी नहीं आएगी। अगर नियंत्रण में कोई परेशानी होती तो एक खुली पेशकश से छूट देना काफी बेतुका होता।

इस तरह भले ही यह प्रवर्तक को दी गई खास सुविधा लगे, लेकिन इसके पीछे का गणित काफी सरल है-यह रियायत केवल पहले से ही नियंत्रण रखने वाले व्यक्तियों को अधिक शेयर रखने के लिए है। जो भी हो, यह रियायत मताधिकार में वृद्धि की वजह से खुली पेशकश रखने से संबंधित है और नियंत्रण में बदलाव से की जाने वाली खुली पेशकश से इसका ताल्लुक नहीं है।

आखिर में, यह पहली बार नहीं हुआ है जब किसी व्यापक आर्थिक स्थिति को देखते हुए कंपनियों को अतिरिक्त  शेयरधारिता में इस तरह की कोई रियायत दी गई है। वर्ष 2008 में लीमन संकट के समय भी खुली पेशकश के बगैर पांच फीसदी अतिरिक्त शेयर रखने का प्रावधान किया गया था लेकिन यह केवल बाजार से की जाने वाली खरीद के जरिये ही किया जाना था, वरीय आवंटन या थोक खरीद के माध्यम से नहीं।

नियमों के निर्धारण में स्पष्टता नहीं होने से मुकदमे काफी बढ़ गए और बाजार भी इस बात पर असमंजस में रहा कि यह रियायत हमेशा के लिए दी गई है या इसकी मियाद साल भर ही है। फिर यह महसूस किया गया कि द्वितीयक बाजार से शेयरों की खरीद की अनुमति देना बाजार के लिए अच्छा ही होगा।

इस बार दृष्टिकोण एकदम उलटा हो गया है। उसके पीछे यह सोच है कि कंपनी में नया फंड आना बाजार में शेयरों की खरीद करने से कहीं बेहतर होगा।
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

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