बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रवासी कामगारों की जीने की जद्दोजहद
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प्रवासी कामगारों की जीने की जद्दोजहद

नितिन कुमार /  June 19, 2020

अपने घर से करीब 175 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद देहरादून में प्लंबर का काम करने वाले सौरभ कुमार के पास अपने गांव में मरम्मत के लिए कोई काम नहीं है। गांव के तालाब के पास 10 लड़कों के समूह के साथ बैठे हताश सौरभ कहते हैं, 'यहां किसी के पास पानी की फिटिंग नहीं है, इसलिए मेरे पास कोई काम नहीं है।' बिजनौर से करीब 48 किमी की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग-51 (गजरौला-चांदपुर-बिजनौर) पर उनका गांव हुसैनपुर कलां उत्तर प्रदेश के उन हजारों गांवों में से एक है जहां से हर साल प्रवासियों को शहरों में भेजा जाता है।

वहां मौजूद एक लड़के का कहना है, 'आज हम सब बेकार हैं। पिछले दो दिनों से हमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत कुछ काम मिला था लेकिन ग्राम प्रधान ने हमें काम बंद करने के लिए कहा है।' हालांकि सौरभ बीच में ही टोकते हुए कहते हैं, 'मैं भाग्यशाली हूं कि मैं घर लौटने में कामयाब रहा, लेकिन मुझे 12,000 रुपये महीने का नुकसान हुआ जो मैं देहरादून में कमाया करता था। मैं अप्रैल के मध्य में लौटा था तब से मुझे मनरेगा के तहत सिर्फ पांच दिन का काम मिला है।' उनकी आवाज में लाचारी साफ झलक रही है। वह कहते हैं, 'मैं अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे कर सकता हूं, 45 दिनों में मैं सिर्फ 1,000 रुपये कमा सकता हूं?' 

आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के प्रवासन पर कार्यसमूह की एक 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में शहरी आबादी में सभी समय में काम करने वाले प्रवासियों की हिस्सेदारी 42.9 प्रतिशत थी जिनमें से आधे से अधिक उत्तर प्रदेश और बिहार से आए थे। रिपोर्ट से पता चलता है कि देश के पुरुष कामगारों के 25 फीसदी अंतरराज्यीय पलायन में 17 जिलों का योगदान है और इनमें से दस जिले उत्तर प्रदेश के हैं।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के अनुमानों के मुताबिक अप्रैल में देश में 12.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ीं। ग्रामीण क्षेत्रों में काम के दो मुख्य स्रोत खेती और मनरेगा हैं। दोनों में ही अधिक बोझ है और वापस आने वाले सभी कामगारों को काम मिलना मुमकिन नहीं है। रबी सीजन के लिए बुआई और कटाई का दौर खत्म हो चुका है लेकिन खरीफ सीजन की अभी शुरुआत होनी है।

मनरेगा से उम्मीद

'भारतीय कृषि में श्रमिक: बढ़ती चुनौतियां' शीर्षक नाम की फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि कार्यबल का आकार वर्ष 2004-05 के 22.8 करोड़ से घटकर 2011-12 में 3.05 करोड़ हो गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि जोत में गिरावट एक बड़ी वजह है जिससे दूसरे क्षेत्रों में काम करने के लिए पलायन हुआ है। वहीं दूसरी ओर मनरेगा के तहत पंजीकृत 27.2 करोड़ लोगों में से 15 करोड़ लोगों के पास कोई काम नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि 55 प्रतिशत से थोड़ा अधिक लोग सक्रिय कामगार हैं और इसका अंदाजा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) वेबसाइट से भी मिलता है।

इसके अलावा, वित्त वर्ष 2016 और वित्त वर्ष 2020 के बीच मनरेगा के तहत प्रत्येक परिवार को दिए गए रोजगार के दिनों की औसत संख्या 47 है, जो वादे के मुताबिक 100 दिनों के काम की गारंटी के मुकाबले आधे से भी कम है। इस वित्त वर्ष (वित्त वर्ष 21) की शुरुआत से 10 जून तक प्रत्येक परिवार का दिया गया औसत रोजगार सिर्फ 18.43 दिन का था।

दो बच्चों की मां हनीफा को जनवरी में अपना जॉब कार्ड मिला। वह कार्ड पर अपने बेटे का नाम जोडऩे के लिए काफी दौड़भाग कर रही हैं लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिरना खेरी गांव की रहने वाली हनीफा कहती हैं, 'मेरा बड़ा बेटा शहर में बिना नौकरी के फंसा हुआ है और मैं यहां अपने छोटे बेटे के साथ काम पाने के लिए संघर्ष कर रही हूं।' वह स्थानीय प्रशासन पर मनरेगा के तहत काम उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाते हुए अपने जॉब कार्ड में चार प्रविष्टियों की ओर इशारा करती हैं। वह कहती हैं, 'जब से मुझे यह कार्ड मिला है  मैंने सिर्फ चार दिनों के लिए काम किया है। यहां किसी को भी 100 दिन का काम नहीं मिलता है। हमें अनाज के लिए भी पैसा देना पड़ रहा है जिसे संभवत: सरकार हमें मुफ्त में उपलब्ध कराती है।' आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत काम करने वाले 5.48 करोड़ परिवारों में से केवल 40 लाख लोगों को ही 100 दिनों का रोजगार और मजदूरी मिली जो महज 7.41 फीसदी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (2007-08) से पता चलता है कि देश में 28.3 फीसदी कामगार प्रवासी थे। हालांकि, 2011 की जनगणना के अनुसार, आर्थिक प्रवासी सभी प्रवासियों के दसवें हिस्से से भी कम हैं और उनकी तादाद 4.5 करोड़ से थोड़ा अधिक है। अपनी शिक्षा का खर्च पूरा करने के लिए नई दिल्ली में बढ़ई के तौर पर काम कर रहे अरमान अली बेरोजगार हैं। वह सरकारी नौकरी करने के ख्वाहिशमंद हैं।

अली निराशा के साथ कहते हैं, 'इतनी पढ़ाई करने के बाद भी मैं कुदाल पकडऩे के लिए तैयार हूं लेकिन यह सरकार वह भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है।' सभी भर्तियां रद्द करने के सरकार के फैसले पर अफसोस जताते हुए अली कहते हैं कि वह न केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि उन लाखों लोगों के लिए भी चिंतित हैं, जो जल्द ही इन रिक्तियों के लिए उम्र के लिहाज से पात्रता नहीं रख पाएंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन 13 गांवों में बिज़नेस स्टैंडर्ड ने दौरा किया उनमें से केवल एक गांव में मनरेगा का काम उपलब्ध था। कुछ गांवों में जहां 20-25 दिन पहले ही काम पूरा हो गया था वहां अभी तक भुगतान नहीं किया गया था। भुगतान में देरी की बात को स्वीकार करते हुए अहरौला तेजवन गांव के प्रधान पप्पू राम का कहना है कि कागजी काम पूरा हो चुका है और एक सप्ताह के भीतर भुगतान कर दिया जाएगा।

2005 में मनरेगा कानून लागू होने के बाद से मनरेगा पर काम कर चुके सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने बताया कि सरकार को उच्चतम न्यायालय के फैसले के मुताबिक समय पर कामगारों का भुगतान करना चाहिए।

इससे अर्थव्यवस्था में मांग को भी बढ़ावा मिलेगा। डे कहते हैं, 'मनरेगा के तहत अभी पर्याप्त पैसा है लेकिन स्थानीय प्रशासन की अक्षमता के कारण लोगों को काम नहीं मिल रहा है। यह उनकी गलती है कि उन्होंने पहले से ही परियोजनाओं का शेल्फ नहीं बनाया है। वे जितना काम करते हैं उसके हिसाब से उन्हें दो बार काम देना चाहिए।'

हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड को दिए गए साक्षात्कार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन प्रवासी कामगारों को राज्य का संपत्ति करार दिया और करीब एक करोड़ प्रवासी कामगारों को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से जोडऩे की अपनी परियोजना के बारे में बताया था। उन्होंने कहा, 'हम राज्य में 90 लाख एमएसएमई में कम से एक और अधिकतम 10 अतिरिक्त कामगारों को जोड़ रहे हैं। इससे 1 करोड़ से ज्यादा रोजगार के अवसर मिल सकते हैं।' सौरभ और बाकी के लाखों लोगों के लिए सरकार ही उनकी आखिरी उम्मीद है। 28 वर्षीय सौरभ कहते हैं, 'हमारे पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। हम काम की भीख मांग रहे हैं, कृपया हमारी मदद करें, वरना हमें खुद को मारने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।'

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