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कोविड महामारी से उबरने का रास्ता

नितिन देसाई /  June 18, 2020

कोविड महामारी और सरकार की नीतिगत घोषणाओं को लेकर चर्चा का रुख बदल रहा है। पहले चर्चा इस बात पर केंद्रित थी कि इस महामारी से निपटने का सबसे बेहतर तरीका क्या हो सकता है। मगर अब चर्चा कोरोना से हुए सामाजिक एवं आर्थिक नुकसान से उबरने की सबसे उचित रणनीतियों पर केंद्रित हो गई है। सरकार का लक्ष्य अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देना है ताकि वृद्धि की प्रक्रिया इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही तक शुरू हो जाए और 2021-22 की पहली छमाही में तेजी पकड़ ले।

सरकार ने आर्थिक सुधार को प्रोत्साहित करने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है। यह सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोगों को राहत एवं पुनर्वास मुहैया करा रही है। इस पैकेज का विश्लेषण करते हैं तो ऐसा लगेगा कि सरकार मुख्य रूप से आसान ऋण सुविधा के जरिये निवेश को बढ़ाने पर दांव लगा रही है। क्षेत्रों के स्तर पर मुख्य पहल कृषि के लिए सुधार पैकेज है, जिसके नतीजे केवल मध्यम एवं लंबी अवधि में दिखेंगे। पैकेज में रक्षा उत्पादन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को उदार बनाने और अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की आसान भागीदारी जैसी पहल भी शामिल हैं। मगर साफ कहें तो ये मौजूदा परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक हैं। परिवारों के हाथों में ज्यादा खर्च योग्य आय के रूप में प्रत्यक्ष राजकोषीय प्रोत्साहन मुश्किल से पैकेज का 10 फीसदी है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब एक फीसदी है। यह 3-5 फीसदी के उस प्रोत्साहन से काफी कम है, जिसका ज्यादातर आर्थिक टिप्पणीकारों ने सुझाव दिया था।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान मांग में भारी गिरावट आई है। जब अगस्त के अंत में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुमान आएंगे तो हमें जीडीपी में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। इस गिरावट में बड़ा असर घरेलू खर्च योग्य आय पर दिखेगा। विशेष रूप से उन परिवारों में, जो प्रवासी एवं अस्थायी श्रम पर निर्भर हैं। जीडीपी के एक प्रतिशत प्रोत्साहन से यह समस्या दूर नहीं होगी। मांग को प्रोत्साहन दिए बिना केवल ऋण उपलब्धता को आसान बनाने से निवेश एवं वृद्धि में सुधार नहीं आएगा। वित्त मंत्रालय की वित्तीय रूढि़वादिता का मतलब है कि वृद्धि सुधरने में लंबा समय लगेगा। इस वजह से संभव है कि अगले वित्त वर्ष या उसके बाद तक वृद्धि में सुधार दिखाई नहीं दे।

महामारी को नियंत्रित करने पर ध्यान से आर्थिक वृद्धि को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करने के नीतिगत चरण में कोई बड़ा विभेद नहीं है। यह महामारी इतनी जल्दी नहीं जाएगी, जिसका संकेत दैनिक मामलों में लगातार बढ़ोतरी से भी मिलता है। हमें इस संकट से निपटने के लिए संभवतया एक साल या अधिक समय के लिए एक जन स्वास्थ्य रणनीति बनानी होगी। इस समय धारावी की तरह बड़े पैमाने पर जांच की जरूरत है। धारावी में यह महामारी नियंत्रण में आ रही है। वहां इस काम में जुटे एक व्यक्ति ने सही कहा था, 'एकमात्र विकल्प वायरस को ढूंढना है, बजाय मामलों के आने का इंतजार करने के। प्रतिक्रियात्मकता के बजाय पहले से ही सक्रिय होकर काम करने की जरूरत है।' दरअसल कोई व्यक्ति यह तर्क दे सकता है कि दोनों चिंताएं आपस में जुड़ी होनी चाहिए और हमें महामारी को नियंत्रित करने और आर्थिक एवं सामाजिक सुधार के बीच तालमेल कायम करने की कोशिश करनी चाहिए। सुधार के पहले चरण का मुख्य जोर स्वास्थ्य सेवाओं और लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित प्रवासी कामगारों और अन्य के लिए राहत एवं पुनर्वास के उपायों पर होना चाहिए।

उस स्थिति के बारे में विचार करें, जहां संकट भयंकर देशव्यापी सूखे से पैदा हुआ और जिसने कृषि उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचाया। साफ तौर पर सुधार तभी शुरू होगा, जब कृषि एवं श्रम आय को बहाल करने के उपाय किए जाएंगे। यही तर्क अब भी लागू होता है। सुधार के पहले चरण में सरकारी व्यय का जोर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर होना चाहिए। नैशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 के मुताबिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च का बजट 2016-17 में  जीडीपी का महज 1.17 फीसदी था। मगर यह बजट आंकड़ा है। वास्तविक खर्च के उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का सरकारी स्वास्थ्य खर्च जीडीपी के एक फीसदी से भी कम है। इसकी तुलना में विश्व बैंक द्वारा 'निम्न आय वाले देशों' के रूप में वर्गीकृत देशों ने उस साल स्वास्थ्य पर जीडीपी का 1.57 फीसदी खर्च किया। भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च 'सबसे गरीब' गिने जाने वाले देशों के औसत खर्च से काफी कम है। हम इस अनुपात को वर्ष 2025 तक बढ़ाकर जीडीपी का 2.5 फीसदी करने को प्रतिबद्ध हैं। निश्चित रूप से यह काम इस समय करना ज्यादा तर्कसंगत है, बजाय महामारी के बाद।

बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में केवल अपर्याप्त सरकारी खर्च ही एकमात्र बाधा नहीं है। चिकित्साकर्मियों की सीमित उपलब्धता और नतीजे देने में उचित जिम्मेदारी तय न करना भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ताहाली की एक बड़ी वजह है। चलायमान चिकित्सा सेवाएं, टेलीमेडिसन और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बेहतर प्रशिक्षण से चिकित्साकर्मियों की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है। जिम्मेदारी के स्तर पर यह कदम उठाया जाना चाहिए कि जब बात पोस्टिंग की पसंद की आए तो उन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिन्होंने तय मानदंडों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। निस्संदेह इसके लिए राज्य की राजधानियों में मंत्रियों और स्थानीय राजनेताओं को अपनी सरपरस्ती की ताकत त्यागनी होगी और वह मुश्किल हो सकता है।

एक अन्य क्षेत्र जिस पर सुधार के पहले चरण में ध्यान दिए जाने की जरूरत है, वह प्रवासी श्रमिकों के लिए नीतिगत ढांचा है। नैशनल इंस्टीट््यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के एक हाल के नीतिगत बयान में कई कदम उठाए जाने के सुझाव दिए गए हैं। इनमें चक्रीय प्रवासियों के लिए होस्टल, मूल निवास का प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद सुनिश्चित जन स्वास्थ्य एवं सार्वजनिक वितरण सेवाएं मुहैया कराना, ट्रेन का कम किराया, लचीला प्रशिक्षण एवं प्रतिभाओं की खोज और बेहतर ग्रामीण-शहरी रोजगार सूचना नेटवर्क आदि शामिल हैं।

यह सही है कि सुधार के शुरुआती चरण में स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रवासी कामगारों पर ध्यान देने से उतना प्रोत्साहन पैदा नहीं होने के आसार हैं, जितना पूरी अर्थव्यवस्था को चाहिए। हालांकि इसके कुछ सकारात्मक असर होंगे। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार उत्पादकता के लिए बेहतर साबित होगा। मलेरिया उन्मूलन का उत्पादकता पर स्पष्ट सकारात्मक असर देखा गया था। लेकिन यह लाभ मध्यम अवधि में दिखेगा। प्रवासी कामगारों के लिए नीतिगत सुधारों को मध्यम अवधि में लागू किया जा सकता है। इससे देश के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से में श्रमिकों की किल्लत दूर होगी और वृद्धि को सुधारने में मदद मिलेगी। इसलिए सुधार के शुरुआती चरण में और प्रत्यक्ष उपाय शामिल किए जाने चाहिए ताकि कृषि संकट दूर किया जा सके और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को मदद पहुंचाई जा सके। विशेष रूप से उन एमएसएमई को, जिनके बंद या दिवालिया होने का जोखिम है।

आदर्श स्थिति तो यह है कि सरकार इस वित्त वर्ष का संशोधित बजट पेश करे। उसे तीन या चार क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और राहत एवं पुनर्वास के लिए संसाधन एवं नीतिगत दिशानिर्देश मुहैया कराने चाहिए। अगर वह यह काम संवेदनशील तरीके से करेगी और जनसंपर्क के लिए दिखावटीपन से बचेगी तो शेष अर्थव्यवस्था उबर जाएगी और करीब एक साल में वृद्धि रफ्तार पकड़ जाएगी।

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