बिजनेस स्टैंडर्ड - चरम काल के लिए तैयारी का वक्त
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चरम काल के लिए तैयारी का वक्त

अजय शाह /  June 17, 2020

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की तरफ से ऐंटीबॉडी की गणना के बारे में किए गए सर्वे से मिले साक्ष्य देश के भीतर अत्यधिक विविधता दर्शाते हैं। अप्रैल के अंत में शहरों में कुछ कंटेनमेंट जोन ऐसे थे जिनमें करीब एक तिहाई आबादी में ऐंटीबॉडी मौजूद थीं जबकि कुछ जिलों में यह लगभग शून्य था।

इससे हमें एक अंदाजा लगता है कि महामारी किस तरह से फैलेगी? अभी तक उपलब्ध ज्ञान के मुताबिक ऐंटीबॉडी जांच में पॉजिटिव पाए गए सभी लोगों में प्रतिरोधक क्षमता का होना तय नहीं है। महामारी का प्रकोप तब कम होगा जब आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रतिरोधक क्षमता से लैस हो चुका होगा और वायरस को एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलने में दिक्कत होने लगेगी। हम कंटेनमेंट जोन में भी अप्रैल के अंत में इस सामुदायिक प्रतिरोधकता की स्थिति से दूर ही थे।

बहरहाल यहां से आगे महामारी की प्रगति काफी विविधतापूर्ण होगी। कुछ जगहों पर महामारी का धीमा पडऩा शुरू हो गया है क्योंकि वहां प्रतिरोधकता तेजी से बढऩे लगी है। लेकिन अधिकांश जगहों पर अधिकतर लोग अब भी आसानी से इसकी चपेट में आ सकते हैं। इस वजह से महामारी को लेकर हमारी प्रतिक्रिया को बेहद स्थानीय तरीके से रखना महत्त्वपूर्ण है, यानी एक शहर या एक जिले के स्तर पर महामारी से निपटने के तरीके अपनाना। हर जगह इस महामारी का प्रसार चरम बिंदु तक होगा और फिर उसमें गिरावट आने लगेगी। हर जगह के लिए चरम पर पहुंचने का समय भी अलग-अलग होगा।

इसका मतलब है कि हरेक शहर और जिले को अपने यहां स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को लेकर फिक्रमंद होने की जरूरत है। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में इस महामारी के शुरुआती चरण में ही स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था तनाव में आती दिखने लगी है। दूसरी जगहों में भी ऐसी स्थिति पैदा होनी है। हालांकि देश के बाकी इलाकों में स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था को बेहतर करने के लिए कुछ सुनहरे हफ्ते अभी शेष हैं। उम्र समूह में अंतर और स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था की हालत हरेक जगह पर महामारी के प्रतिकूल प्रभाव में भिन्नता पैदा करेगी।

जब कोई चक्रवात हमारी तरफ बढ़ता है तो हम सैटेलाइट से उसकी प्रगति पर नजर रखते हैं और हमें आगामी घटनाक्रम के बारे में भी अंदाजा होता है। उसी तरह हरेक शहर में रैंडम सैंपल के आधार पर की गई जांच के साप्ताहिक आंकड़ों की जरूरत है। जब ऐसे आंकड़े उपलब्ध हों तो हर कोई उसके हिसाब से अपनी योजना बना सकता है और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता भी मामले बढऩे की आशंका को देखते हुए अपनी कमर कस सकते हैं। हरेक शहर और हरेक जिले में ऐसे जांच आंकड़ों की जरूरत है। हरेक हफ्ते के कार्यदिवसों में लिए गए नमूनों से जुटाए आंकड़े शनिवार को जारी किए जाएं।

महामारी के चरण को देखते हुए स्थानीय स्तर पर बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने की जरूरत है ताकि जोखिम का सामना कर रही आबादी को बचाया जा सके। हरेक शहर एवं जिले में महामारी की मौजूदा स्थिति के बारे में साप्ताहिक आंकड़ों को देखते हुए उसके हिसाब से लोगों को इसके कहर से बचाने की तैयारी करनी होगी। इसके लिए आंकड़ों, सोच-विचार और समझदारी की विकेंद्रित स्तर पर जरूरत है। जब संक्रमण अपने चरम पर हो तब अधिक सख्त कदम उठाने होंगे।

किसी भी शहर या जिले में महामारी के चरम दौर वाले कुछ हफ्ते खासे असुविधाजनक होने वाले हैं। स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था का धराशायी होते जाना, बीमारी एवं मौत से जुड़ी मानवीय त्रासदी और डर की वजह से होने वाला आर्थिक पराभव इसके आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक तनाव को बढ़ाने का काम करेगा। भारत की क्षमताएं कम हैं और हमें यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि कोई इस समस्या को दूर करने वाला है। हरेक शहर और जिले में कारोबार जगत, स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े लोगों और समझदार लोगों को एक साथ खड़े होने की जरूरत है ताकि इस मुश्किल दौर से निकलने के लिए सोच-समझकर योजना बनाई जाए और उससे निकला जा सके। सभी संगठनों को हर महीने अपने कर्मचारियों का औचक नमूना लेना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या चल रहा है? इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिक खतरनाक काम कौन हैं और फिर सजगता बरतते हुए उसे सुधारा जाए। यह प्रक्रिया महामारी के चरम काल का अंदाजा लगाने में मददगार होगी और उसके मुताबिक संगठन के कुछ हिस्सों को शिथिल भी किया जा सकेगा। अधिकतर संक्रमित लोगों को कोविड-19 के इलाज में स्वास्थ्य देखभाल पर अतिरिक्त खर्च की जरूरत नहीं है लेकिन 1-2 फीसदी लोगों को कुछ दिनों या हफ्तों तक सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में इलाज का मोटा खर्च उठाना पड़ता है। स्वास्थ्य बीमा इस महामारी से जुड़े वित्तीय जोखिम को कम करने में असरदार है। ऐसी स्थिति में नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बीमा के मौजूदा हाल की ध्यानपूर्वक समीक्षा करनी चाहिए ताकि स्वास्थ्य बीमा प्रदाता कंपनियां कोविड-19 के इलाज का खर्च उठाने के वादे पर खरा उतरें। कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ईएसआईएस) देश भर में लाखों कर्मचारियों को बीमा सुरक्षा देता है लिहाजा उन्हें कोविड का इलाज सुनिश्चित कराने के लिए स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी निजी कंपनियों से तत्काल संपर्क करने की जरूरत है।

भले ही हमारा ध्यान कोविड-19 के संक्रमितों की जान बचाने पर है लेकिन स्वास्थ्य देखभाल संकट को लेकर भी फिक्रमंद होना उतना ही अहम है। मरीजों के भीतर अब डर बैठने लगा है, स्वास्थ्य देखभाल संगठन भारी मुश्किल में हैं और टेली-मेडिसन कोई असरदार जवाब नहीं हो पाया है। आम लोग एवं स्वास्थ्य देखभाल संगठन लॉकडाउन की अवधि में अपनी सांस रोककर बैठे हुए थे लेकिन ऐसा हमेशा नहीं रह सकता है। हमें स्वास्थ्य देखभाल की सामान्य स्थिति बहाल करने की जरूरत है।

सबसे बड़ा डर यह है कि कोविड-19 को लेकर कहीं हम पर थकान न हावी होने लगे। यह महामारी खत्म नहीं हुई है। अभी महामारी का चरम पर पहुंचना बाकी है और वह अलग-अलग जगहों पर अलग समय पर होगा। ऐसे में हम मास्क के इस्तेमाल, वेंटिलेटर की उपलब्धता और भीड़भाड़ से बचने में कोताही नहीं बरत सकते हैं। महामारी का चरम दौर गुजरने के बाद मनोदशा एवं समृद्धि का पुनर्निर्माण खासा चुनौतीपूर्ण होगा। हम सभी को लक्ष्य पर निगाह बनाए रखने, आंकड़ों के विश्लेषण और कई कदम उठाने की जरूरत है। सैकड़ों शोधपत्र आने चाहिए जिनसे साक्ष्य तैयार होने के साथ ही भविष्य के लिए बेहतर कदमों का मार्गदर्शन भी मिलेगा।

चाहे जन स्वास्थ्य हो, स्वास्थ्य देखभाल हो, वृहद अर्थशास्त्र हो या वित्त हो, कोविड-19 ने भारतीय राज्य की संस्थागत क्षमता में मौजूद गहरी खाइयों की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट कराया है। हमें अपनी नाखुशी से पार पाना होगा और सकारात्मक रुख अपनाते हुए संस्थागत सुधारों के डिजाइन एवं क्रियान्वयन में उच्च बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल करना होगा। ये संस्थागत सुधार भविष्य के लिए हमें कहीं बेहतर स्थिति में पहुंचाएंगे।

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)

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