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भारतीय उद्योग जगत की परिसंपत्तियों का नुकसान बढ़ा

कृष्ण कांत / मुंबई June 16, 2020

पिछले कुछ वर्षों के दौरान धीमी वृद्घि ने भारतीय उद्योग जगत को प्रभावित किया है। बड़ी तादाद में कंपनियों ने सहायक इकाइयों और संयुक्त उपक्रमों में अपने निवेश को बट्टे खाते में डाला है। भारत की प्रमुख कंपनियों ने पिछले 10 साल में करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डाला, जिसमें पिछले चार पांच वर्षों का योगदान ज्यादा रहा है, क्योंकि विविधता और वैश्विक उद्यम उम्मीदों पर खरा उतरने में सफल नहीं रहे।

इस तरह के नुकसान के संदर्भ में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा का उदाहरण ताजा है, क्योंकि उसने सांगयोंग मोटर्स और अमेरिकी दोपहिया व्यवसाय में अपने इक्विटी निवेश की करीब 1,800 करोड़ रुपये तक की वैल्यू को बट्टे खाते में डाला है और लगभग 19 साल में अपना पहली तिमाही नुकसान दर्ज किया। धातु, खनन और ऊर्जा दिग्गज वेदांत वित्त वर्ष 2015 से करीब 50,000 करोड़ रुपये के परिसंपत्ति नुकसान के साथ इस सूची में शीर्ष पर है, क्योंकि उसने अपने निवेश की वैल्यू घटाई है। तेल एवं गैस व्यवसाय वेदांत के लिए सबसे ज्यादा दबाव वाले रहे हैं जिससे केयर्न इंडिया की वैल्यू में बड़ी गिरावट आ गई जिसे उसने 2011 में खरीदा था।

कंपनी ने मार्च 2015 में पहली बार इस तरह का नुकसान दर्ज किया और तब उसने केयर्न इंडिया में अपने करीब 20,000 करोड़ रुपये तक के निवेश को बट्टे खाते में डाला था, जिसके बाद अन्य अगले वर्ष 12,000 करोड़ रुपये के अन्य नुकसान का सामना करना पड़ा था। वित्त वर्ष 2020 में कंपनी को कोविड-19 महामारी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट की वजह से अपने तेल एवं गैस व्यवसाय में करीब 16,000 करोड़ रुपये मूल्य की वैल्यू गंवानी पड़ी।

वेदांत ने 2011 में केयर्न का करीब 50,000 करोड़ रुपये में अधिग्रहण किया था और तब कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। 2014 में कीमतों में तेजी से गिरावट आने लगी जिससे वैश्विक रूप से तेल एवं गैस परिसंपत्तियों के लाभ एवं बाजार वैल्यू में भारी कमी आई। वित्त वर्ष 2017 में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने बट्टे खाते से संबंधित करीब 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया। कंपनी ने अपने घरेलू तेल एवं गैस क्षेत्रों और अमेरिका में शेल गैस परिसंपत्तियों की उचित वैल्यू को बट्टे खाते में डाला।

टाटा स्टील ने 2007 में कोरस (अब टाटा स्टील यूरोप) के अपने 54,000 करोड़ रुपये की अधिग्रहण की उचित वैल्यू को बट्टे खाते में डाला। इस्पात निर्माता को इस संबंध में वित्त वर्ष 2013 से करीब 33,000 करोड़ रुपये के नुकसान का सामना करना पड़ा है।

वित्त वर्ष 2019 में, टाटा संस की अन्य सहायक इकाई टाटा मोटर्स को ब्रिटिश लक्जरी यात्री कार और स्पोट्र्स यूटिलिटी निर्माता जगुआर लैंड रोवर में अपने निवेश पर करीब 28,000 करोड़ रुपये की वैल्यू को बट्टे खाते में डालने के लिए बाध्य होना पड़ा।

विश्लेषकों के अनुसार, प्रत्यक्ष तौर पर, बट्टे खाते से संबंधित नुकसान गैर-नकदी नुकसान है और इसका कंपनी के परिचालन तथा नकदी प्रवाह पर त्वरित प्रभाव नहीं पड़ता है। साथ ही, परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डालने की खबरों का शेयर कीमत पर भी त्वरित प्रभाव नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि इससे कंपनी की ईपीएस में बदलाव नहीं आता है।

हालांकि इसका मध्यावधि से दीर्घावधि में शेयर मूल्यांकन पर असर पड़ता है क्योंकि इससे कंपनी की नेटवर्थ या बुक वैल्यू में कमी आती है। इससे कंपनी का पीबी वैल्यू अनुपात प्रभावित होता है, जो दूरसंचार, धातु, खनन, और तेल एवं गैस तथा अन्य जिंस क्षेत्रों की कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण मूल्यांकन मापक है। रेटिंग एजेंसियां भी बड़े परिसंपत्ति नुकसान को ध्यान में रखकर निर्णय लेती हैं, क्योंकि इससे नकदी आकर्षित करने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। 2015 में, मूडीज ने केयर्न इंडिया में वेदांत के परिसंपत्ति नुकसान को नकारात्मक करार दिया था। परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डाले जाने के बाद नेटवर्थ में कमी की वजह से वित्त वर्ष 2014 और वित्त वर्ष 2016 के बीच वेदांत की शेयर कीमत में भारी गिरावट आई।

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