बिजनेस स्टैंडर्ड - बहुत से संकट: समय को बरबाद करने की कीमत
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बहुत से संकट: समय को बरबाद करने की कीमत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  June 15, 2020

दुनिया वर्षों तक टालमटोल और मिथ्या बयानबाजी की कीमत चुका रही है। बड़े संकट इसलिए सामने आ रहे हैं क्योंकि हमने उन चीजों को ठीक नहीं किया, जो बिगड़ी हुई थीं। इस वजह से हम कोविड-19 का सामना कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य और आर्थिक संकट दोनों पैदा हुए हैं। भारत से लेकर अमेरिका तक पूरी दुनिया में इस उठापटक से गरीब ही वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। उन पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ उनकी संक्रमण से जान गई हैं और दूसरी तरफ आजीविका भी छिन गई है। 

जब यह हृदय विदारक संकट हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है, तभी एक अन्य आपदा-जलवायु परिवर्तन भी खतरे का संकेत दे रही है। पिछले 15 दिनों के दौरान भारत का पूर्वी हिस्सा चक्रवाती तूफान से प्रभावित हुआ है, जिसने जान-माल को नुकसान पहुंचाया है। देश के पश्चिमी हिस्से में कोरोना से प्रभावित शहर मुंबई तूफान निसर्ग से किसी तरह मामूली बच गया। मगर महाराष्ट्र के तटीय जिलों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं रही। हम जानते हैं कि इन आपदाओं के बाद के हालात बहुत खराब होते हैं क्योंकि ये विकास के लाभ और लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए बुनियादी ढांचे में वर्षों से किए जा रहे निवेश को अपने साथ ले जाती हैं। मगर यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। टिड्डी दल पहले ही देश के पश्चिम हिस्से में खेतों को खड़ी फसलों को चट चुके हैं। अब ये भारत के उत्तरी राज्यों और अफ्रीका के देशों में भी पहुंच गए हैं। इनके आगामी महीनों में और अधिक नुकसान पहुंचाने की आशंका है।

इन अलग-अलग घटनाओं के जलवायु परिवर्तन से संबंध होने पर कोई संदेह नहीं है। आज हमें जो जमीन पर दिखाई दे रहा है, वह तूफानों की बारंबारता एवं तीव्रता बढऩे और बारिश का असामान्य एवं अत्यधिक होने का नतीजा है। मौसम में यह बदलाव इसलिए आया है क्योंकि जमीन एवं समुद्र के तापमान में बदलाव हुआ है। भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि न केवल तूफानों की संख्या बढ़ रही है बल्कि तूफानों की रफ्तार भी बढ़ रही है, जिसकी वजह जमीन और समुद्र के तापमान में बदलाव है। इस वजह से विनाश बढ़ रहा है और ऐसे घटनाक्रमों का अनुमान लगाना मुश्किल होता जा रहा है।

टिड्डी दल के प्रकोप का इन स्थितियों से संबंध है। पहले 2018 में और फिर 2019 में अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका के मरुस्थलों में कई बार तूफान और अत्यधिक बारिश की घटनाएं देखने को मिलीं। फिर 2019 और अब 2020 में उन्हीं अफ्रीकी क्षेत्रों और भारतीय मरुस्थल में बेमौसम बारिश और लंबा मॉनसून देखने को मिला। इस वजह से मरुस्थल टिड्डियों के लिए अनुकूल प्रजनन केंद्र बन गए और इनकी वृद्धि इंडिविजुअल स्टेज से ग्रीगेरियस स्टेज में पहुंच गई। इनका फैलाव प्रकोप की श्रेणी से भारी बढ़ोतरी की श्रेणी में पहुंच गया। जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोविड-19 के खतरे को महामारी घोषित करने में लंबा समय लिया, उसी तरह खाद्य एवं कृषि संगठन भी यह विचार कर रहा है कि कब टिड्डी दलों में भारी बढ़ोतरी को एक आपदा घोषित किया जाएगा।

कोविड-19 प्रकृति के साथ हमारे बिगड़ते संबंधों का नतीजा है। यह उस समय को भी खोने का भी नतीजा है, जब हम सार्वजनिक स्वास्थ्य और एक ऐसा समानता वाला समाज बनाने पर निवेश कर सकते थे, जिसमें गरीबों पर दोहरी मार नहीं पड़ती। आज हमारे सामने मौजूद जलवायु परिवर्तन और अन्य मुद्दों को लेकर भी यही स्थिति है। इनमें बहुत अधिक समय ना-नुकुर करने या आवश्यक रफ्तार एवं पैमाने पर व्यवस्थित तरीके से काम न करने में बेकार कर दिया गया। अब हमारे पास समय नहीं है। मेरी पीढ़ी इस मौके को गंवा चुकी है। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लें कि यह केवल शुरुआत है। इस समय विश्व (धनी या उभरते विश्व) के गरीब सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। वे सबसे अच्छे दौर में भी मुश्किल से अपनी जीविका चला पाते हैं। अब हम बुरे दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन जैसा कि मैं कहती रहती हूं कि कोविड-19 और जलवायु परिवर्तन हमें सिखाते हैं कि हम एक कमजोर व्यक्ति जितने ही मजबूत हैं।

ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? मैं वह सब दोहरा सकती हूं, जो हम जानते हैं। लेकिन मैं उस एक सौदेबाजी नहीं किए जा सकने वाले बुनियादी सिद्धांत के बारे में बताना चाहती हूं, जिसे हमें और नहीं करना चाहिए। हमें समस्याओं से इनकार या उन्हें ढंकना नहीं चाहिए। इस समय एक साथ जितनी आपदाएं एक साथ आ रही हैं, वे दुनिया को और असुरक्षित बना देंगी। उनसे सरकारों को ज्यादा सत्तावादी और असहिष्णु बनने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसा हमें सभी जगह दिखाई दे रहा है। भारत में हमारे शीर्ष विधि अधिकारी ने सामाजिक और प्रशासनिक समस्याओं की तरफ ध्यान खींचने वाले लोगों को गिद्ध बताते हुए आलोचकों की तुलना शिकारी पक्षियों से की है। किसी राष्ट्रीय संकट के समय सरकार किसे अनावश्यक आरोप बताती है और किन चीजों को आवश्यक समझती है, इनके बीच एक बारीक रेखा होती है। ऐसे में उस समय खुद पर अंकुश लगाना बेहतर होता है, अन्यथा इससे सरकारी संकल्प कमजोर होंगे।

मगर इस स्थिति में बदलाव जरूरी हैं। हमें कम नहीं ज्यादा सूचनाएं हासिल करने की जरूरत है। हमें यह भी जानने की जरूरत है कि जमीनी स्तर पर क्या हो रहा है ताकि हमारे कार्यों को बेहतर निर्देशित किया जा सके। इससे हम गलती नहीं करेंगे या उन्हें दोहराएंगे नहीं। यह बात हमेशा ध्यान में रखी जानी चाहिए कि आज कोविड-19 वैश्विक महामारी है क्योंकि चीन या डब्ल्यूएचओ के वैज्ञानिकों में सत्ता के सामने सच बोलने का साहस नहीं है। हम सभी को चियरलीडर्स बनाने से समस्या खत्म नहीं होगी। इससे वे बहुत से संकट विकराल होंगे, जो आगे बरकरार रहेंगे।

(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)

Keyword: Covid-19, Economic Crisis, Disaster, Climate Change, कोविड-19, स्वास्थ्य, आर्थिक संकट, आपदा, जलवायु परिवर्तन,
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