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कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ा सुधार या महज तमाशा

देवाशिष बसु /  June 15, 2020

मोदी सरकार ने गत 3 जून को तीन ऐतिहासिक कदमों की घोषणा की जिनमें बहुत तेजी से भारत का नाटकीय कायाकल्प करने की क्षमता है। पहला, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करने का फैसला जिससे अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू की कीमतें अकाल जैसी प्राकृतिक आपदा को छोड़कर भंडारण सीमा से मुक्त हो जाएंगी। दूसरा, किसानों को अपनी उपज देश में कहीं भी और किसी को भी बेचने की पूरी छूट होगी। मौजूदा कानूनों के तहत किसान केवल कृषि उत्पाद विपणन समितियों (एपीएमसी) मंडियों में लाइसेंसधारक कारोबारियों को ही अपनी उपज बेच सकते हैं। एपीएमसी का नियंत्रण नेताओं के हाथों में होता है जो कार्टेल के तौर पर काम करते हुए मुनाफे का मोटा हिस्सा अपनी जेब में डाल लेते हैं। तीसरा, किसानों को अनुबंध पर खेती की अनुमति देना जिससे किसान थोक विक्रेताओं, एग्रीगेटरों, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों के साथ गठजोड़ कर पूंजी एवं तकनीक तक पहुंच हासिल कर पाएंगे।

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी कृषि-योग्य जमीन, सूरज की पर्याप्त रोशनी और 40 फीसदी भूभाग में पानी की मौजूदगी है और अगर इन तीनों संशोधित कानूनों को लागू कर दिया जाता है तो भारत का कायाकल्प ही हो जाएगा। किसानों को अपनी उपज का बेहतर मोल मिलेगा और भारत प्रशीतन भंडार, गोदामों, प्रसंस्करण एवं निर्यात गतिविधियों में अरबों डॉलर का निवेश आकर्षित करेगा। इसके साथ ही बंपर फसल होने पर संभावित बरबादी में कमी लाने और कृषि आय में नाटकीय वृद्धि का रास्ता भी साफ होगा। अगर ऐसा होता है तो यह भारत में अब तक हुए किसी भी बड़े सुधार जितना बड़ा होगा। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 16 फीसदी योगदान देने वाले कृषि क्षेत्र में 61 फीसदी आबादी के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर होने से यह बदलाव आखिर कितना बड़ा है?

बहुत बड़ा मौका: दिसंबर 2008 में मुकेश अंबानी ने मनीलाइफ को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि विभिन्न कारणों से हमारी अर्थव्यवस्था को खाद्य कारोबार में एक टिकाऊ मूल्य शृंखला विकसित करने का मौका नहीं मिल पाया। अंबानी ने कहा था, 'अमेरिका और यूरोप में 1950 और 1960 के दशक तक खाद्य व्यवसाय में बड़े कारोबारी आ गए थे लेकिन भारत में खाद्य क्षेत्र हमेशा से असंगठित एवं बंटा हुआ वैल्यू चेन रहा है। मेरा मत है कि भारत की खरीद क्षमता पर खाद्य क्षेत्र का दबदबा होगा।'

मुकेश अंबानी ने कहा था, 'अगर हम भारत के किसी खेत से निकली उपज को तकनीक एवं वितरण नेटवर्क की मदद से दुनिया में कहीं भी गुणवत्ता मानकों के अनुरूप भेज सकते हैं तो फिर होने वाली खरीद-बिक्री की कल्पना करें। इसका आकार सॉफ्टवेयर से भी बड़ा है। दुनिया भर में खाए जाने वाले आलू को ही लीजिए। उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान को आलू का भाव 4-5 रुपये प्रति किलो मिलता है लेकिन पश्चिम एशिया में यही आलू 25-30 रुपये प्रति किलो के थोक भाव पर बिकता है। अमेरिका में यह 90 रुपये प्रति किलो के भाव पर मिलता है जबकि यूरोप में इसका भाव 110 रुपये किलो है। ऐसे में आलू की खरीद एवं बिक्री मूल्य में अंतर 1:20 है। अगर हमारी उपज अच्छी है और अमेरिकी बाजार खुल जाता है तो आपको यह देखकर आश्चर्य होगा कि हम कितनी जल्द 20 अरब डॉलर पर पहुंच जाते हैं। खाद्य बाजार सॉफ्टवेयर सेवा बाजार से कहीं अधिक बड़ा है। और पैसा सीधे किसानों के हाथ में जाता है। अतिरिक्त लाभ भी बहुत होंगे- नौकरियां, आवास, टिकाऊ उत्पादों का एक पूरा नया दौर ग्रामीण इलाकों में शुरू होगा।'

अंबानी ने हमारे साथ बातचीत में कहा था, 'पिछले साल से इस पर लगातार गौर करने के बाद मुझे लगता है कि हम अपनी सारी खामियों को एक अवसर में तब्दील कर सकते हैं। हमारे खेत छोटे आकार के हैं लेकिन तकनीक की मदद से हम उन्हें जोड़ सकते हैं। सही इनपुट होने पर भारतीय किसानों को विश्व-स्तरीय होने से रोकने वाली कोई वजह नहीं है। कमी सिर्फ वितरण की है। हमारे पास सीधे वितरण लॉजिस्टिक की नई लहर पर सवार होने का मौका है। मुझे लगता है कि हरेक को बाजार अर्थव्यवस्था से रिश्ता कायम करने लायक होना चाहिए। अगर आप कुछ पैदा करते हैं तो आपको उसे एक बाजार भाव पर बेचने में भी सक्षम होना चाहिए।'

ये तीनों नए कानून 12 साल पहले की इस सोच से ही तालमेल रखते हैं। उस समय अंबानी ने कहा था कि हम उपभोक्ताओं के स्तर पर लागत में 20 फीसदी कटौती कर सकते हैं और किसानों की क्षमता तिगुनी की जा सकती है। कृषिआय मौजूदा स्तर से अगले कुछ वर्षों में 600 फीसदी से लेकर 900 फीसदी तक बढ़ाई जा सकती है। अंबानी ने कहा था, 'भारत आज 15 करोड़ टन उपज पैदा करता है। हम अगले कुछ फसल सत्रों में ही इसे 30-40 करोड़ टन तक पहुंचा सकते हैं, बशर्ते हम इसे एक व्यवस्था के जरिये और विश्वस्तरीय गुणवत्ता से करें।' ध्यान रखें कि ये आंकड़े वर्ष 2008 के हैं।

सवाल है कि क्या गलत हो सकता है? इसका जवाब है बहुत कुछ। भारत में कारोबार करने के साथ भारी संघर्षपरक लागत जुड़ी होती है। इस मामले में खासकर इसके नया होने और कृषि के राज्य सूची का विषय होने से जमीनी स्तर पर गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। आदर्श रूप में हमें एक भरोसेमंद एवं समय पर कीमत पड़ताल, किसानों, कारोबारियों एवं खरीदारों को जोडऩे, एक कारोबारी व्यवस्था और ऑर्डर पूरे करने के लिए भौतिक वितरण संबंधी ढांचे की जरूरत है। पूंजी बाजार जैसा एक जटिल ढांचा तैयार हो जाए तो हमें लौह आवरण वाले अनुबंधों की जरूरत होगी। इन्हें लेकर तमाम विवाद खड़े होंगे जिनके त्वरित, सरल एवं सस्ते समाधान की व्यवस्था करनी होगी। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बेहतर स्थिति वाली फर्में कृषि क्षेत्र में प्रवेश करने से हतोत्साहित होंगी। मैं इस बात को लेकर आशंकित हूं कि इन सबके असरदार होने के लिए क्या कोई भी शख्स जवाबदेह या प्रोत्साहित होगा? इसके अलावा कृषि के राज्य विषय होने से मोदी की अच्छी मंशा और आकांक्षा भी राज्यों की सीमाओं पर जाकर रुक जाएगी, यहां तक कि भाजपा के शासन वाले राज्यों में भी।

समाधान: इस समस्या का हल नीति आयोग कुछ राज्यों को प्रायोगिक परियोजना के लिए चुनकर कर सकता है। इसके साथ ही आयोग को रिलायंस, आईटीसी और महिंद्रा जैसे कुछ बड़े कारोबारी समूहों को भी साथ में जोडऩा होगा। उन्हें एक दूसरे के मुकाबले में खड़ा करना होगा ताकि वे भारतीय लागत पर सबसे आधुनिक तकनीक लेकर आएं और देश के किसान को वैश्विकबाजार से जोडऩे का इकलौता संकल्प लेकर आगे बढ़ें। इस प्रयोग के फीडबैक अनिवार्य रूप से सकारात्मक होने चाहिए, डिजाइन में उन्हें समायोजित किया जाए ताकि विवेकपूर्ण बदलाव किए जा सकें।

संयोग से हम विकसित देशों से सीखकर प्रक्रिया में आगे बढ़ सकते हैं। आखिर में, मोदी को एक व्यक्ति को अगले चार वर्षों में एक मुकाम तक पहुंचने के लिए जवाबदेह बनाना होगा। ऐसा नहीं होने पर तीनों कानूनों में बदलाव की यह पहल महज एक तमाशा ही साबित होगी।

Keyword: Agriculture Reforms, Agri Marketing, Ordinance, Farmers, APMC, कृषि सुधार, विपणन, अनुबंधित कृषि, किसान,
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