बिजनेस स्टैंडर्ड - महामारी से बैंकों की सेहत ज्यादा खराब
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महामारी से बैंकों की सेहत ज्यादा खराब

अनूप रॉय, नम्रता आचार्य और अभिजित लेले /  06 15, 2020

बिजनेस स्टैंडर्ड महामारी से बैंकों की सेहत ज्यादा खराबदेश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार जब कहते हैं, 'मेरे पास पैसा है, लेकिन पैसा लेने वाला कोई नहीं है।' तो इस बात से स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश में बैंक का ऋण बाजार भी इस दौर के सबसे बड़े संकट से प्रभावित हो रहा है।

कम कर्ज लिए जाने की वजह से बैंकों के पास इस वक्त काफी नकदी है जिस पर उन्हें जमाकर्ताओं को ब्याज का भुगतान करना पड़ता है लेकिन इस वक्त अपने मुख्य कारोबार से उन्हें महरूम होना पड़ रहा है जो कर्ज देकर ब्याज कमाने से जुड़ी है। इससे कुमार की निराशा साफतौर पर झलकती है। इस महीने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की बैठक में उन्होंने कहा, 'मैं बैंकरों के बीच जोखिम से बचने के बारे में बहुत कुछ सुनता रहता हूं। लेकिन क्या कर्ज लेने वालों के बीच भी जोखिम से बचने की धारणा नहीं बनी है?'

यह एक वैध सवाल है क्योंकि आमतौर पर देश के बैंकरों पर आलसपन के साथ बैंकिंग करने को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों से पता चलता है कि ऋण वृद्धि 50 फीसदी गिरकर बमुश्किल साल-दर-साल 6 फीसदी रह गई है। यह भविष्यवाणी बेहद गंभीर है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का अनुमान है कि वित्त वर्ष के लिए ऋण वृद्धि 0-1 फीसदी रह सकती है जो महामारी के प्रसार से पहले के 8-9 फीसदी के अनुमान से करीब 800 आधार अंक कम है।

क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारमण का कहना है, 'यह संकट अभूतपूर्व है और इसका आर्थिक नतीजा भी कुछ ऐसा ही होगा। मसलन कम पूंजीगत खर्च की मांग के साथ-साथ लोग सोच-समझ कर खर्च करेंगे। इससे चालू वित्त वर्ष में सभी क्षेत्रों में कर्ज लेने की दर काफी धीमी होगी। कॉरपोरेट ऋण पोर्टफोलियो के सबसे ज्यादा प्रभावित होने की उम्मीद है।'

हालांकि रेटिंग एजेंसियों और बैंकरों को विश्वास है कि कर्ज की मांग कम होगी लेकिन ताजा मांग कृषि क्षेत्र और सूक्ष्म, लघु, एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से की जा सकती है। बाजार जोखिम से बचने के एहतियात कर रहा है। इस बीच गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी धीरे-धीरे वापसी कर रही हैं। शायद यही कारण हैं कि कुछ बैंकर अपनी उम्मीद बनाए हुए हैं। यूको बैंक के प्रबंध निदेशक (एमडी) और मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) ए के गोयल कहते हैं, 'एमएसएमई और एनबीएफसी जैसे क्षेत्रों में काफी मांग है। कृषि क्षेत्र में भी अच्छी फसल होने के कारण हम मांग देख रहे हैं। मेरा मानना है कि कुल मांग में धीरे-धीरे तेजी आएगी। बैंक का ऋण वितरण स्तर स्वीकृत सीमा का 30-40 प्रतिशत है।' पंजाब ऐंड सिंध बैंक के एमडी और सीईओ एस हरिशंकर का कहना है कि कर्ज की मांग कम है लेकिन लॉकडाउन को धीरे-धीरे हटाए जाने से इसमें कुछ सुधार दिख रहा है। वह कहते हैं, 'मौजूदा मांग एमएसएमई की तरफ से है। लेकिन इसकी प्रगति धीमी रही है। एमएसएमई के लिए निर्धारित 1,200 करोड़ रुपये के मुकाबले अब तक बैंक केवल 150 करोड़ रुपये ही वितरित कर पाया है।' ऐसा आंशिक रूप से इसलिए है क्योंकि बैंक खुद ही ग्राहकों के लिए अपने पात्रता मानदंडों को बदल रहे हैं, खासतौर पर खुदरा क्षेत्र के लिए।

ऋण वृद्धि चुनौती का एक हिस्सा है। नौकरी गंवाने और वेतन में कटौती से खुदरा कर्जदारों को नुकसान होगा लेकिन कंपनियां भी समान रूप से प्रभावित होंगी क्योंकि उनका कारोबार लॉकडाउन के दो महीने से अधिक समय तक बंद ही रहा। कुछ विश्लेषकों का सुझाव है कि अगर बैंक सावधान नहीं हैं, तो सकल गैर-निष्पादित संपत्ति या फंसा हुआ कर्ज मौजूदा 9.3 फीसदी से बढ़कर दोगुना हो सकता है।  उदाहरण के लिए, ऑब्जर्वेटरी ग्रुप के वरिष्ठ विश्लेषक (भारत) अनंत नारायण का अनुमान है कि सकल एनपीए का स्तर अग्रिम ऋण का 18-20 फीसदी तक हो सकता है क्योंकि जीडीपी वृद्धि दर में भी कमी है और लॉकडाउन से विभिन्न प्रभावित क्षेत्रों में अतिरिक्त 28-30 फीसदी अग्रिम ऋण जोखिम में होगा। आधार के लिहाज से देखा जाए तो रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक मार्च 2021 तक सकल एनपीए बढ़कर 11.3-11.6 प्रतिशत हो जाएगा।

वहीं इंडिया रेटिंग्स 2020-21 में देश में 5.5 लाख करोड़ रुपये तक की गिरावट की बात कर रही है। उसका अनुमान है कि कंपनियों का इसमें करीब 3.4 लाख करोड़ रुपये का योगदान हो सकता है जबकि गैर कंपनियों जिनमें खुदरा, कृषि और एमएसएमई शामिल हैं, उनका इसमें करीब 2.1 लाख करोड़ रुपये का योगदान है। आईडीबीआई बैंक के उप प्रबंध निदेशक सुरेश खटनहार का कहना है कि बैंक ने खुदरा क्षेत्र में कर्ज लेने वालों के लिए मौजूदा नियमों पर दोबारा गौर किया है। स्कोर में सख्ती लाई गई है  और ऋण:मूल्य (एलटीवी) अनुपात की समीक्षा की गई है। कई बैंकरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति ने भुगतान अवधि को टालने का लाभ उठाया है तो यह स्वत: तरीके से बैंक के लिए जोखिम का संकेत देता है। हालांकि इससे ग्राहकों की पिछला ऋण ब्योरा प्रभावित नहीं होता है लेकिन बैंक उन्हें नए ऋण देने के लिए तैयार नहीं हो सकते हैं।

बैंकों ने क्रेडिट कार्ड की सीमा कम कर दी है और ज्यादातर मामलों में प्राइवेट बैंकों ने क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर नकदी निकालने की सुविधा खत्म कर दी है। खटनहार का कहना है कि बैंक विमानन क्षेत्र, पर्यटन और होटल जैसे विशेष उद्योगों में लोगों को कर्ज देने में सतर्क रुख अपना रहे हैं । वह कहते हैं, 'जिनका कर्ज लेने का स्कोर ज्यादा अच्छा है उनके लिए ही जोखिम लिया जा सकता है।'

जिन लोगों ने फिलहाल भुगतान टालने का लाभ उठाया है उनके ब्याज में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि इस मुद्दे से जुड़ी तस्वीर तभी साफ हो पाएगी जब उच्चतम न्यायालय इस पर महत्त्वपूर्ण फैसला देगा। हालांकि जिन लोगों ने ऋण भुगतान को फिलहाल टालने का लाभ नहीं उठाया है उनके लिए भी ऋण चुकाना मुश्किल होगा।

वास्तव में यह एक दुष्चक्र है और यह चक्र हर किसी को प्रभावित करेगा। देश में 70 फीसदी बैंकिंग क्षेत्र पर सरकारी बैंकों का नियंत्रण है इसलिए सरकार भी इससे प्रभावित होगी। नतीजतन चूक बढ़ जाएगी और कर्ज के पुनर्गठन के अनुरोध भी खूब आएंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि बैंक दिवालिया कार्यवाही के लिए कर्ज भुगतान में चूक करने वालों को एनसीएलटी में घसीटना चाहेंगे या नहीं।

विशेषज्ञों का कहना है यदि वे ऐसा करते हैं तो इसके दो संभावित नतीजे होंगे। पहला, संकटग्रस्त परिसंपत्ति के लिए पर्याप्त खरीदार नहीं होंगे और समाधान लगभग असंभव होगा, वहीं दूसरा, बैंकों को अंतत: लगभग सभी संकटग्रस्त कर्ज में से नुकसान सहने के लिए तैयार रहना होगा।

ईवाई में वित्तीय सेवा के प्रमुख अबिजर दीवानजी कहते हैं, 'बैंक पूरी तरह से तैयार नहीं लगते क्योंकि किसी ने पुनर्गठन के लिए संभावित कर्जदाताओं की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू नहीं की है और न ही वे उनके साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।'

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