बिजनेस स्टैंडर्ड - लूम के बिखरे ताने-बाने को जोडऩे में जुटे कारोबारी
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लूम के बिखरे ताने-बाने को जोडऩे में जुटे कारोबारी

सुशील मिश्र / मुंबई 06 15, 2020

बिजनेस स्टैंडर्ड लूम के बिखरे ताने-बाने को जोडऩे में जुटे कारोबारीदिन-रात पावरलूम मशीनों की खटर-पटर से गूंजते भिवंडी को 'लूम नगरी' कहा जाता है मगर मुंबई से लगे इस इलाके में लॉकडाउन के साथ ही अजीब सी खामोशी पसर गई है। पूरे देश को बंद करने के सरकार के कदम और कोरोनावायरस के डर से ज्यादातर कारीगर अपने गांव-घर लौट गए हैं और कारोबार पर भी तगड़ी मार पड़ी है। लॉकडाउन में ढील मिली तो कारखाने खुल गए मगर कामगार जुटाने और व्यापारियों को साधने में कारोबारियों को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है।

भिवंडी को एशिया का सबसे बड़ा कपड़ा उत्पादन केंद्र कहा जाता है। यहां करीब 40 लाख लूम चलते हैं, जिनमें 10-12 लाख पावरलूम और 8-10 लाख चीनी रेपियर लूम हैं। इनके अलावा 20-25 लाख पुरानी शैली के यानी इंग्लिश लूम से भी काम होता है। इन लूमों में 10 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। लॉकडाउन के समय मशीनें थमीं तो इनमें से करीब 90 फीसदी मजदूर शहर छोड़कर अपने गांव लौट गए। बचे हुए 10 फीसदी कामगार वे हैं, जो अपने परिवार के साथ यहां रहते हैं और कारखानों में मजदूर नहीं बल्कि कर्मचारी की हैसियत से जुड़े हैं।

लूम छोड़कर गए 90 फीसदी मजदूरों को लाना ही लूम मालिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यहां के कामगार और मजदूर कहते हैं कि भिवंडी से इतने बड़े पैमाने पर पलायन की सबसे बड़ी वजह अफवाह थी। इस अफवाह ने कामगारों के बीच यह डर पैदा कर दिया कि काम तो अब मिलेगा नहीं उलटे वायरस की वजह से जान पर बन आएगी। लेकिन अब तस्वीर साफ हो गई है और कामगारों को बुलाने की कोशिश की जा रही है। माना जा रहा है कि 3-4 महीने में सब ठीक हो जाएगा।

भिवंडी ऑटो पावरलूम वीवर्स एसोसिएशन के चेयरमैन प्रदीप जिंदल ने कहा कि लॉकडाउन हटने के बाद भी कारोबार पटरी पर आने में कम से कम तीन महीने लग जाएंगे। सब कुछ ठीक रहा और कारीगरों को साध लिया गया तब भी कारोबार दीवाली के आसपास ही लय पकड़ पाएगा। स्वामी फैब्रिक्स के विजय नोगजा ने कई परेशानी गिनाईं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान पूरा उद्योग तहस-नहस हो गया है। मजदूर नहीं मिले तो लूमों को पूरी तरह चालू करना मश्किल है। आधा-अधूरा काम किया गया तो घाटे की खाई और चौड़ी हो जाएगी। इसीलिए गांव चले गए कामगारों को पावरलूम मालिक खुद बात कर मनाने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ को एसोएिशन के जरिये उनसे बात कर वापस लाने की कोशिश में जुटे हैं। लूम मालिक इतने परेशान हैं कि कामगारों को एडवांस और रेल टिकट भी भेजने को तैयार हैं।

उनकी परेशानी वाजिब भी है क्योंकि कामगारों की किल्लत खत्म हो तो वे दूसरे मोर्चों पर लगें। इनमें सबसे अहम मोर्चा अटके भुगतान का है। वित्त वर्ष के आखिरी दस दिन कारोबारियों के लिए बहुत अहम होते हैं। उसी दौरान वे अपना साल भर का बकाया और अटके बिल निपटाते हैं। लेकिन बिल पास होने के समय ही लॉकडाउन शुरू हो गया, जिस कारण पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही का पूरा भुगतान अटक गया। इस तरह कारोबारियों के बिल जनवरी से ही अटके हैं। भुगतान मिले बगैर लूम चलाने का खर्च, कामगारों की मजदूरी और कर्मचारियों का वेतन निकालना भी मुश्किल हो गया है।      

कबीरा फैब्रिक्स के प्रंबध निदेशक विनोद गुप्ता ने बताया कि बमुश्किल 10 फीसदी काम के साथ लूम चालू करना बहुत मुश्किल है और लूम नहीं चलाएंगे तो बचे मजदूर भी निकल जाएंगे। उन्होंने कहा कि बैंक 20 फीसदी अतिरिक्त कर्ज देने की बात कह रहे हैं। 5 साल के इस कर्ज की किस्तें 1 साल बाद शुरू होंगी। अगर यह कर्ज मिल जाता है तो कारोबारियों को कुछ राहत मिल जाएगी। भिवंडी में में एक दिन में करीब 5 करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता है, जो महाराष्ट्र के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी जाता है। भिवंडी में लूम चलाने वाले लूम मालिकों का कहना है कि यहां कारोबार एक-दूसरे से जुड़ा है। लॉकडाउन खुलने से पहले ही सरकार ने काम करने के लिए यूनिट चालू करने की इजाजत दे दी थी मगर मुश्किल से 10 फीसदी काम हो रहा है। इसकी वजह प्रसंस्करण इकाइयां हैं। वहां अभी पिछले ऑर्डरों का माल ही पड़ा है तो वे नया माल क्यों लेंगी। व्यापारी भी बुनकर और प्रोसेसर का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि खुद उनके पास ही बिना बिका स्टॉक भारी मात्रा में जमा है। मुंबई के ज्यादातर बड़े कपड़ा बाजार अब भी बंद हैं, इसलिए अटका भुगतान मिलने की कोई संभावना भी नजर नहीं आती। इस पूरी शृंखला का करीब 5,000 करोड़ रुपये का भुगतान फंसा है। कारोबारियों को लग रहा है कि बाजार पूरी तरह खुलने पर ही पैसा उनके हाथ आएगा।

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