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वायरस भी नहीं बचा वैचारिक खेमेबंदी से

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 14, 2020

क्या किसी वायरस का धर्म हो सकता है? क्या महामारी की कोई विचारधारा हो सकती है? और क्या हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन जैसी दवा को लेकर भी राजनीति की जा सकती है? बहुत खेद की बात है कि इन तीनों सवालों का जवाब 'हां' है। यह बताता है कि हमारा समय कितना विषाक्त हो चला है। इससे हमें यह भी पता चलता है कि आखिर क्यों दुनिया भर में और अब भारत में भी महामारी के खिलाफ लड़ाई में इतनी अफरातफरी है। एक ठोस और संपूर्ण लॉकडाउन से हुई शुरुआत के बाद अब सत्ताधारी दल और विपक्ष तथा केंद्र और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। ज्यादा निराशाजनक बात यह है कि हमारी अधिकांश सार्वजनिक बहसें इसी परिणति को पहुंचती हैं, चाहे भले ही मामला मौजूदा मसले की तरह जीवन-मरण का क्यों न हो। जबकि वास्तव में हमें अपनी अंध श्रद्धा, नफरत, भय या कल्पना से परे जाकर इससे निपटने पर बल देना था।

हमारे देश में वायरस को शुरुआत में ही मजहब से जोड़ दिया गया जब शुरुआती प्रसार का ठीकरा तबलीगी जमात के सदस्यों पर फोड़ा गया। गुजरात जहां वायरस से निपटने की स्थिति बेहद खराब है, वहां के मुख्यमंत्री दो सप्ताह पहले तक कह रहे थे कि उनके राज्य में वायरस तबलीगियों से फैला है। यह बात अलग है कि तबलीगी जमात का आयोजन मार्च के मध्य में हुआ था। वायरस के लिए तीन महीने का समय बहुत होता है। अब कोविड-19 से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी मार्च के मध्य के कुल संक्रमितों से 20 गुना अधिक हो चुका है और किसी को तबलीगियों की याद नहीं। इस बात के कई प्रमाण सामने आए कि वायरस का धर्म विशेष से कोई लेनादेना नहीं है। महाराष्ट्र में नांदेड़ से लौट रहे सिख श्रद्धालुओं में संक्रमण पाया गया। वायरस धर्म निरपेक्ष है लेकिन इसे एक धर्म के साथ जोड़ दिया गया।

लॉकडाउन से लेकर चिकित्सा और संक्रमण से लेकर मृत्यु तक वायरस से जुड़ी बहस वैचारिक आधार पर बंटी हुई है। अगर आप नरेंद्र मोदी, डॉनल्ड ट्रंप या बोरिस जॉनसन को पसंद करते हैं तो उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है लेकिन अगर आप उन्हें नापसंद करते हैं तो वे हजारों मौतों के लिए जवाबदेह हैं। अगर आप उन्हें पसंद करते हैं तो आप उन महामारीविदों को पसंद करेंगे जो कह रहे हैं कि महामारी अप्रैल से सितंबर के बीच गायब हो जाएगी। यदि आप उन्हें नापसंद करते हैं तो आपको उन लोगों की बात पर यकीन होगा जो भारत समेत तमाम जगहों पर लाखों लोगों की मौत की आशंका जता रहे हैं। अच्छी बात यह है कि मई तक ऐसा होने का उनका पहला अनुमान गलत साबित हुआ।

महामारी जब तक इस घातक वायरस से लैस है, उसे विचारधाराओं से कोई फर्क पडऩे से रहा। परंतु इसने कुछ ऐसा किया है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते: इसने महामारीविदों को विचारधारा के आधार पर बांट दिया। जहां तक हम समझते हैं महामारी विज्ञान सदियों पुराना स्थापित विज्ञान है परंतु 2020 में यह भी शिकार हो गया।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन यानी एचसीक्यू के बारे में काफी कुछ लिखा गया है। मलेरिया की यह सस्ती दवा सात दशक से चलन में है। टं्रप ने भारत से मांगकर इसे चर्चा में ला दिया। मोदी ने आपूर्ति भी की और मामला राजनीतिक हो गया। एक तबका इसे कोरोनावायरस की दैवीय औषधि बताने लगा तो दूसरे ने कहा कि यह किसी काम की नहीं है। बल्कि इसे जहरीला भी बता दिया गया। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। नतीजा, यह हालिया इतिहास की ऐसी दवा बन गई जिस पर सर्वाधिक शोध किया गया। सभी अपनी राजनीति के पक्ष में प्रमाण तलाश रहे थे। मामला इतना राजनीतिक हो गया कि 'द लैंसेट' जैसे चिकित्सा क्षेत्र के मशहूर जर्नल ने भी इसे खारिज करता हुआ एक आलेख प्रकाशित कर दिया। वह इतने कमजोर और अस्पष्ट आंकड़ों पर आधारित था कि कोई सतर्क उप-संपादक भी उसे खारिज कर देता।

मुझे इस त्रासदी पर द हिंदू का संपादकीय खासा पसंद आया। मैं सोचता हूं काश मैं भी उतना अच्छा कुछ लिख पाता लेकिन अफसोस कि मैं नहीं लिख पाया इसलिए मैं उस अखबार को उद्धृत कर रहा हूं। अखबार ने लिखा, 'कोविड के बाद का विश्व एक दहशतजदा विश्व है। अब कोई संस्था, कोई आकलन प्रक्रिया अछूती नहीं रह गई है।' अखबार आगे यह लिखता है कि अहम सबक यह है कि यह मानना गलती है कि वैज्ञानिक प्रक्रिया, सत्ता, पैसे, विशेषाधिकार और राजनीति से मुक्त होती है। यह संपादकीय इतना धारदार था कि उसने इस सप्ताह मेरे आलेख के विषय की विचार प्रक्रिया को जन्म दिया।

इन सारी बातों का क्या अर्थ है? क्या इन दिनों सबकुछ राजनीतिक, धु्रवीकृत और कड़वाहट भरा नहीं हो गया है? महामारी इससे क्यों अछूती रहे?

इसका उत्तर एक प्रतिप्रश्न में है। यदि देश (इस मामले में पूरा विश्व) किसी शत्रु की परिभाषा को लेकर उलझा हुआ है तो हथियारों के प्रभाव पर झगड़कर क्या होगा?

राजनीति कभी समाप्त नहीं होती लेकिन पक्षपात को तो कुछ समय के लिए रोका जा सकता है और इसे विशेषज्ञों और सैनिकों के हवाले किया जा सकता है। मजाक उड़ाने से बात नहीं बनने वाली। हमने देखा कैसे कोविड कार्य बल के उन वरिष्ठ सदस्यों का मजाब उड़ाया जाता है जो हर दोपहर दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग करते हैं।

यह सही है कि वे हमें जरूरत से कम जानकारी देते हैं। मैं भी इसकी शिकायत कर चुका हूं लेकिन सोशल मीडिया पर उनका लगातार मजाक बनाना ठीक नहीं। अगली बार जब वे आपको अपनी स्क्रीन पर नजर आएं, खासकर आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव, तो उनके चेहरे पर उभर आए काले धब्बों पर भी ध्यान दें। बाकियों का भी यही हाल है। यह टीम तीन महीने से अधिक समय से लगातार काम कर रही है। यह तनाव मामूली नहीं है।

हम जानते हैं कि बीमार पडऩे वालों में भी बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो ठीक हो जाएंगे। यदि हम जल्दी जांच करें, लोगों को समय पर ऑक्सीजन दे सकें और अस्पतालों में जरूरतमंदों को बेड मुहैया करा सकें तो ठीक होने वालों की तादाद और बढ़ेगी।

मुंबई के आंकड़े (दिल्ली में ऐसे आंकड़े मिलना मुश्किल है) बताते हैं कि मौत के अधिकांश मामले बीमारी का पता चलने के चार दिन के भीतर के हैं। यानी उनका पता चलने और इलाज होने में देरी हो रही है। केवल जल्दी ऑक्सीजन मिलने से भी कई लोगों की जान बच सकती है। हमें संक्रमण और मौत के मामलों का राजनीतिक लाभ लेने के बजाय यह मांग करनी चाहिए।

हमें इस बात को लेकर सचेत रहना होगा कि इस समय गूढ़ बातें करना आत्महत्या करने जैसा ही है (तर्क करने वालों के लिए, न कि स्तंभ लिखने वालों के लिए)। गत सप्ताह मेरे स्तंभ पर आई प्रतिक्रियाओं ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित किया। मैंने यह बताने का प्रयास किया था कि मोदी सरकार आर्थिक सुधारों को लागू करने में क्यों पिछड़ रही है।

मैं सावधानी बरत रहा हूं ताकि इस बात को लेकर कोई बवाल खड़ा हो कि मैं लोगों को मोदी सरकार से प्रश्न करने से रोक रहा हूं। जब मोदी के नंबर दो अमित शाह समेत भाजपा नेता महामारी का इस्तेमाल विपक्ष शासित राज्य सरकारों पर हमले करने में करते हैं या उन्हें गिराते हैं तो वे एक गंभीर संकट का राजनीतिक फायदा ही तो उठा रहे हैं। नतीजा, एक दूसरे से उलझने और आरोप-प्रत्यारोप के रूप में सामने आ रहा है। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि कोविड किसी के नियंत्रण में नहीं है।

Keyword: वायरस, वैचारिक खेमेबंदी, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन, दवा, चिकित्सा, संक्रमण, एचसीक्यू, मलेरिया,
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