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सुधार नहीं हो पाने के लिए अफसरशाही जिम्मेदार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 07, 2020

तीन सवाल हैं: पहला, क्या नरेंद्र मोदी आर्थिक सुधारक हैं  ? दूसरा, पी वी नरसिंह राव, मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की भारत के आर्थिक सुधारकों की सूची में वह किस पायदान पर आएंगे? और तीसरा, अपने सुधारवादी विचारों को अमलीजामा पहनाने में वह कितने सफल रहे हैं? अगर पहले सवाल का जवाब हां है तो अपने कार्यकाल के सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहे मोदी के पास दिखाने को क्या है?

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दूसरी सरकार ने वर्ष 2010 में अपनी धीमी खुदकुशी की तरफ जब कदम बढ़ाए थे, उसके 10 साल बीतने के बाद कई घोषणाएं की गई हैं और सुधारों का सिलसिला फिर से शुरू होने का इंतजार कर रहे तमाम लोगों ने इनका स्वागत भी किया है। रेलवे, कृषि, बैंकिंग, विनिर्माण, श्रम कानून, ऊर्जा क्षेत्र, नागरिक उड्डयन, कई नए क्षेत्रों- कोयला, खनन, सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की मंजूरी जैसे कई प्रभावी कदम उठाए गए हैं। लेकिन पहली कक्षा में पढऩे वाले बच्चे की तरह अगर सबके नीचे एक रेखा खींच दी जाए तो जवाब लगभग शून्य ही होगा।

इसी से तीसरा सवाल खड़ा हो जाता है। क्या मोदी अपने बड़े, सुधारवादी विचारों को लागू करने में सक्षम हैं? अगर आप ना कहते हैं तो आपको बेवकूफ, नक्सल (शहरी या देहाती) होना होगा। महज चार घंटों के नोटिस पर लागू नोटबंदी और देशव्यापी लॉकडाउन के फैसलों के बारे में सोचिए। यह निर्णायक नेतृत्व है। फिर अपने आर्थिक सुधारवादी विचारों को असलियत में बदल पाने में उन्हें इतनी समस्या क्यों हो रही है? इसका ताल्लुककोरोनावायरस से नहीं है। वायरस तो महज तीन महीने पहले आया है। देश की अर्थव्यवस्था तो करीब दो साल से ढलान पर थी। कोरोना की वजह से हमारी आर्थिक स्थिति और बिगड़ रही है। लेकिन उसके पहले भी काफी गंभीर संकट मौजूद था। हम उनके पहले सुधारवादी कदम भूमि अधिग्रहण कानून से शुरू करते हैं। आप इसका ठीकरा राजनीति या राहुल गांधी पर फोड़ सकते हैं।

लेकिन मैं अपने खयाल और 'द प्रिंट' की आर्थिक मामलों की सीनियर एसोसिएट एडिटर रम्या नायर के सहयोग से एक सूची रख रहा हूं। आप इसमें कुछ और चीजें जोड़ सकते हैं। सीबीडीटी के तत्कालीन सदस्य अखिलेश रंजन के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई थी जो प्रत्यक्ष करों में व्यापक बदलाव सुझाने वाली थी। इस समिति ने वर्ष 2019 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी लेकिन अभी तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। वह फाइल दिवंगत जॉर्ज फर्नांडिस के शब्दों में कहें तो 'अफसरशाही की भ्रमण कक्षा' में भेज दी गई है जहां पर वह किसी मंजिल तक न जाकर बस घूमती रहेगी।

नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री ने गरीब कल्याण योजना की घोषणा की थी जो एक कर माफी योजना ही थी। इरादा पी चिदंबरम की वीडीआईएस योजना की तरह बड़ी रकम जुटाने का था लेकिन कुछ नहीं हासिल हुआ। योजना में कर की दर इतनी दंडात्मक थी कि यह माफी योजना ही नहीं रह गई। इसके लिए बनाए गए नियम इतने जटिल थे कि योजना के तहत कोई खुलासा करने के लिए काफी गैरकानूनी होना होगा।

मोदी सरकार के आर्थिक फैसलों में एक पैटर्न दिखता है। फॉलोअप, योजना का डिजाइन और क्रियान्वयन में काफी वक्त लग जाता है। और जब तक ऐसा होता है तब तक यह अफसरशाही का ऐसा घालमेल बन जाता है कि वह हद से ज्यादा पकाया हुआ स्पागेटी बाउल नजर आने लगता है। मसलन, पीएसयू बैंकों के सुधार की क्या स्थिति है? जिस बैंक होल्डिंग कंपनी के गठन की बात की गई थी, वह कहां है? पीएसयू बैंकों के प्रमुखों को लंबा कार्यकाल देने और बोर्ड की जवाबदेही तय करने के बारे में क्या हुआ है? ये सारे अच्छे विचार अफसरशाही की जानलेवा कक्षा में घूम रहे हैं।

ऊर्जा क्षेत्र के सुधार तो इससे दोगुनी बड़ी त्रासदी है। इसके लिए अब तीसरी बार कोशिश की गई है। इसके नतीजे का इंतजार करते हैं। कोयले के बारे में भी यही हालत है। पिछले छह वर्षों में कोयला एवं खनन सुधार लाने और निजी बिक्री को लेकर इतनी बार घोषणाएं की गई हैं कि गूगल भी साफ-साफ नहीं बता पा रहा है। महामारी काल में एक बार फिर इसकी घोषणा की गई है। मोदी सरकार छह साल में एक भी पीएसयू बेच पाने में नाकाम रही है। सरकार एयर इंडिया को भी नहीं बेच पाई है। इस साल तो यह और भी बड़ी चुनौती है। लेकिन अपने पहले कार्यकाल में भी मोदी की टीम ने ऐसे जटिल बिक्री दस्तावेज तैयार किए थे कि उसे समझने के लिए शायद भगवान शिव जैसी बुद्धिमत्ता रखनी पड़ती। और फिर कंपनी को खरीदने के लिए हनुमान जैसे साहस एवं ताकत की जरूरत होती ताकि बाकी जिंदगी सीबीआई, सीबीडीटी, सीवीसी और अदालतों एवं जेल के चक्कर लगाते हुए बीतती। पिछले छह वर्षों में ये एजेंसियां पहले से अधिक मजबूत होती गई हैं।

इस तरह हमारे पहले दो सवालों के जवाब तीसरे सवाल में ही निहित हैं। मोदी का प्रदर्शन दोनों मोर्चों पर खराब रहा है। वह हमारे सुधारवादी नेताओं की रैंकिंग में कहीं नहीं दिखते हैं। वह खुद अपने विचारों को ही वह अमल में नहीं ला पाते हैं। विचारों के लिए ए प्लस मिलता है लेकिन अमल के मामले में सी माइनस। दिवालिया संहिता, जीएसटी लागू करने एवं कुछ सार्वजनिक बैंकों के विलय की वजह से उन्हें रैंकिंग में बी माइनस मिलता है। हम 1991 की तरफ लौटते हैं। नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने आर्थिक सुधार लागू करने का राजनीतिक निर्देश दिया लेकिन उसमें लोकसेवकों की एक बेहतरीन टीम भी शामिल थी। यह सिलसिला कमोबेश 2009 तक जारी रहा और फिर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति ने सुधार के विचार को भी खत्म कर दिया। सुधारों को अमलीजामा पहनाने वाले लोगों की सूची तैयार कीजिए।

इसमें तीन तरह के लोग थे। अफसरशाह अर्थशास्त्री (आईएएस अफसर एन के सिंह, वाई वी रेड्डी, डी सुब्बाराव, के पी गीताकृष्णन), अर्थशास्त्री अफसरशाह (मोंटेक सिंह आहलूवालिया, विमल जालान, विजय केलकर, राकेश मोहन) और कुछ विशुद्ध अफसरशाह जो काम को अंजाम देना जानते थे। राव के पीएमओ में प्रमुख सचिव ए एन वर्मा, लगभग हरेक महत्त्वपूर्ण सुधार समिति के प्रमुख रहे नरेश चंद्रा और आबिद हुसैन के बारे में सोचिए। एक कड़वा सच यह है कि उनके लिखे एक भी ज्ञापन में कभी भी किसी संशोधन या स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं होती थी जबकि आज लॉकडाउन के दौर में ऐसा होना आम हो चुका है।

वे लोग तीन तरह से अलग थे। पहला, पेशेवर अफसरशाहों ने सरकार को 'माई-बाप' की बेहद ताकतवर भूमिका में देखा हुआ था। उस ताकत का लुत्फ उठा चुके ये अफसर उसे छोडऩे के लिए खुशी-खुशी तैयार थे। यह किसी भी सुधार या 'न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन' की भावना है।

दूसरा, सुधारों से पहले के दौर में लंबा पेशेवर करियर बिता चुके इन अफसरों को लाइसेंस-कोटा राज की दुश्वारियों के बारे में बखूबी मालूम था। मोंटेक एवं एन के सिंह को न्यूयॉर्क के होटल में खासी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी जब भारतीय क्रेडिट कार्ड वहां पर वैध नहीं माने गए थे। ऐसे कड़वे अनुभवों ने सुधार की इच्छा जगाई।

तीसरा, आईएएस अफसरों के समूह के साथ आर्थिक विशेषज्ञों के आ जाने से सुधारवादी खेमे को बौद्धिक संबल भी मिला। इन सबको आर्थिक गतिविधियों से जुड़े मंत्रालयों में लंबे कार्यकाल भी दिए गए। एन के सिंह का वाणिज्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव से आगे का सफर इसकी एक मिसाल है। वह तो अब भी 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष हैं। आज आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास अकेले टिकाऊ आर्थिक अफसरशाह हैं।

दरअसल सिविल सेवा के मौजूदा नेतृत्व में अधिकांशत: 1985-87 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। उनका करियर सुधारों के दौर में आगे बढ़ा है, लिहाजा उन्हें नहीं मालूम कि सुधारों के पहले क्या नहीं मिलता था। उन्हें उन शक्तियों की भी जानकारी नहीं है जिन्हें उनके पूर्ववर्तियों ने त्याग दिया। उन्हें आईएएस होते हुए भी प्रीमियर पद्मिनी कार के लिए तीन साल इंतजार नहीं करना होता है। उनमें सुधारों के लिए प्रेरणा का अभाव है और लॉकडाउन के समय तो वे पुराने दौर की शक्तियों का लुत्फ उठाना सीख रहे हैं।

कल्पना करें कि एक लोकसेवक यह आदेश जारी कर रहा है कि 138 करोड़ लोग रात नौ बजे से सुबह पांच बजे तक कफ्र्यू में रहेंगे क्योंकि अंधेरे में बाहर निकलना खतरनाक है। अगर आप ग्रीन जोन में हैं तो आप टूटी-फ्रूटी आइसक्रीम का मजा ले सकते हैं और ऑरेंज जोन में शायद आप स्ट्रॉबेरी ही खा सकें। लेकिन रेड जोन में तो केवल वनिला आइसक्रीम ही मिलेगी और वह भी होम डिलिवरी होने पर। और फिर 'जान है तो जहान है' कहते हुए शुक्रिया अदा करें।  जहां तक सुधारों की बात है तो क्या आप मुझसे ये सारी शक्तियां छोडऩे को कह रहे हैं? मैंने अभी साफ-सुथरा मेमो लिखना भी नहीं सीखा है।

Keyword: Economic Reformer, Bureaucracy, PSU, FDI, अफसरशाही, आर्थिक सुधारक, रेलवे, कृषि, बैंकिंग, विनिर्माण, पीएसयू,
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