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अर्थशास्त्र एवं कल्याण

संपादकीय /  June 07, 2020

कोविड-19 के आर्थिक झटके से उबरने की प्रक्रिया का खाका सावधानी से बनाने की जरूरत होगी। निकट भविष्य में उठाए जाने वाले नीतिगत निर्णय इस रिकवरी की ताकत एवं स्थायित्व निर्धारित करेंगे। एक लोकतंत्र में फैसले अक्सर विभिन्न संस्थानों से प्रभावित होते हैं, लिहाजा यह अहम है कि व्यवस्था चीजों को जल्द-से-जल्द पटरी पर लाने के इरादे से काम करे। इस मकसद को हासिल करने की संभावना का जल्द ही परीक्षण होगा। उच्चतम न्यायालय ने मौजूदा ऋण स्थगन अवधि में देय ब्याज माफ करने के बारे में सरकार से उसकी राय मांगी है। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि वह स्वास्थ्य संबंधी मसलों पर अर्थशास्त्रीय मुद्दों को तरजीह नहीं दे सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कर्जदारों को अपने कर्जों की अदायगी अगस्त अंत तक स्थगित करने की इजाजत दी हुई है। हालांकि इस स्थगन अवधि में ब्याज की अदायगी को चुनौती देते हुए कहा गया है कि इससे 'एक कर्जदार होने के नाते याची की मुश्किलें बढ़ी हैं और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार में बाधा एवं अवरोध पैदा करता है'।

आरबीआई ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में कहा है कि ब्याज की जबरन माफी से बैंकों पर असर पड़ेगा और जमाकर्ताओं के हित खतरे में पड़ेंगे। अब सरकार को अपना जवाब दाखिल करना है। बैंकिंग नियामक की दलील में कोई खामी तलाशना मुश्किल ही है। जहां यह बात सही है कि कोविड-19 और लॉकडाउन से अधिकांश आर्थिक पहलू प्रभावित हुए हैं वहीं इसका यह मतलब नहीं है कि आर्थिक एवं वित्तीय प्रशासन के बुनियादी नियमों को तिलांजलि दे दी जाए। ब्याज अदायगी से छूट देने पर बैंकिंग प्रणाली को करीब 2 लाख करोड़ रुपये का आघात लगेगा। हालांकि कर्जदाता संस्थानों को अंदेशा है कि महामारी के दुष्प्रभावों से उनके कर्ज फंसने की दर बढ़ेगी लेकिन ब्याज माफ करने से तो समूची बैंकिंग प्रणाली के प्रति विश्वास पर असर पड़ेगा। यह भी स्वीकार करना होगा कि बैंकों की अपने जमाकर्ताओं के हितों का ध्यान रखने की भी जवाबदेही है। सरकार ने मौजूदा हालात में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को छह महीनों के लिए स्थगित कर दिया है जिससे लेनदारों की समस्या और बढऩे की आशंका है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली कोविड-19 संकट के पहले भी कोई अच्छी स्थिति में नहीं थी।

सच कहें तो आरबीआई ने कर्जदारों को समर्थन देने के लिए अपनी तरफ से कई कदम उठाए हैं। ऋण स्थगन के अलावा केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की है, प्रणाली में तरलता को बढ़ाई है और एकबारगी कर्ज पुनर्गठन की मंजूरी देने की भी संभावना है। बैंकिंग नियामक कर्जदारों के लिए हरसंभव कदम उठा रहा है लेकिन समूची आर्थिक प्रणाली के लिए ब्याज को माफ कर देना कोई समाधान नहीं हो सकता है। बैंकों के अलावा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी इस आघात को शायद न झेल पाएं। एनबीएफसी की नाकामी से वित्तीय स्थायित्व से जुड़े जोखिम बढ़ जाएंगे। इसके अलावा इस बात की कोई पुख्ता वजह नहीं है कि व्यवस्था को जमाकर्ताओं एवं निवेशकों के हितों की कीमत पर केवल कर्जदारों के हितों का ही ख्याल क्यों रखना चाहिए? स्पष्ट रूप से जमाकर्ताओं एवं निवेशकों के जीवन का अधिकार किसी भी तरह से कर्जदारों से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आखिरकार बैंकों का कर्जदारों एवं जमाकर्ताओं दोनों के साथ आनुबंधिक दायित्व है। अगर कर्जदारों का ब्याज माफ किया जाता है तो बैंक अपने जमाकर्ताओं को सेवा किस तरह दे पाएंगे? इस तरह एक संतुलन होना जरूरी है।

वैसे सरकार को अगर लगता है कि कर्जदारों के कुछ खास समूहों को अधिक राहत की जरूरत है तो उसके लिए प्रावधान बजट से हो, न कि बैंकिंग प्रणाली से। हमें यह ध्यान रखना होगा कि वित्तीय प्रणाली की सेहत को किसी भी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सरकार को दायित्वों की पूर्ति के लिए स्थिर वित्तीय प्रणाली एवं कार्यशील अर्थव्यवस्था दोनों की जरूरत है।

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