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महिलाओं की कामकाजी भूमिका का पैमाना है बोर्डरूम की विविधता

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  June 03, 2020

कुछ दिन पहले इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर एडवाइजरी सर्विसेज (आईआईएएस) की तरफ से आई एक रिपोर्ट में भारतीय कंपनियों के बोर्डरूम की विविधता को लेकर कुछ अच्छी खबरें आई हैं। मसलन, कंपनियों के बोर्डरूम में महिलाओं का समग्र प्रतिनिधित्व मार्च 2014 के छह फीसदी से साल-दर-साल बढ़ते हुए 17 फीसदी हो गया है। इस रिपोर्ट ने उस परंपरागत धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि प्रवर्तक परिवार से आने वाली महिला ही निदेशक पद के लिए लोकप्रिय पसंद होती है। महिलाओं, पत्नियों या बेटियों के नजरिये से यह अच्छा है लेकिन इससे बोर्ड के कामकाज में कोई सुधार नहीं आता है।

प्रॉक्सी सलाहकार फर्म द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़े दिखाते हैं कि निफ्टी 500 कंपनियों के बोर्डरूम में केवल 98 प्रवर्तक महिला निदेशक (16 फीसदी) ही हैं। उनमें से आधी कार्यकारी भूमिकाओं वाली हैं और नेतृत्व की स्थिति में रहते हुए कंपनी का संचालन कर रही हैं। यह दिखाता है कि बोर्ड में नियुक्त हो रही महिलाओं का बड़ा हिस्सा पेशेवर अनुभव और विशेषज्ञता रखता है।

बोर्डरूम में विविधता लाने का कदम कारोबारी समझ के लिहाज से भी मुफीद है। आईएमएफ के एक हालिया अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि वरिष्ठ पदों पर महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी वाली फर्मों का परिसंपत्तियों पर रिटर्न (आरओए) कहीं अधिक रहा है और वरिष्ठ प्रबंधन या निदेशक स्तर पर एक पुरुष की जगह किसी महिला के मौजूद होने से आरओए में 8-13 आधार अंकों की वृद्धि देखी गई है। असल में, एमएससीआई वल्र्ड इंडेक्स में शामिल जिन कंपनियों के बोर्ड में तीन या उससे अधिक महिला निदेशक हैं, उन्होंने इक्विटी पर रिटर्न (आरओई) 10.1 फीसदी जुटाया है जबकि अन्य कंपनियों का आरओई 7.4 फीसदी ही रहा है।

यह महिला पेशेवरों के नजरिये से एक उत्साहजनक खबर है। लेकिन उनकी राह में अब भी कई चुनौतियां खड़ी हैं। भारत में केवल 16 फीसदी स्वतंत्र निदेशक ही महिलाएं हैं जबकि स्टॉक्स यूरोप 600 सूचकांक में शामिल कंपनियों की 34 फीसदी स्वतंत्र निदेशक महिलाएं हैं।

एक समस्या शीर्ष प्रबंधन में बैठे पुराने लोगों की वह सोच है जिसकी वजह से बोर्ड की बैठकों के दौरान महिला निदेशक खुद को दबा हुआ और चुप महसूस करती हैं। आम तौर पर महिलाओं को अब भी निदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए पहली पसंद नहीं माना जाता है जब तक कि बोर्ड लैंगिक विविधता सुनिश्चित करने को लेकर जागरूक न हो। यह भी एक सच है कि महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में अधिक योग्य होने पर ही निदेशक पद के लायक समझा जाता है और पुरुषों की तुलना में उन्हें बोर्ड निदेशक बनने के लिए कहीं ऊंची कीमत अदा करनी पड़ती है।

कई लोगों का मानना है कि यह समस्या केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। कई देशों में हुए शोध से पता चला है कि महिलाओं के लिए शिखर की तरफ बढऩा अब भी काफी मुश्किल है। महिला निदेशकों को पेश आने वाली चुनौतियां एक पीढ़ी पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हैं। एक चुनौती उनके पास कारोबारी अनुभव की है। महिलाएं शीर्ष स्तर की नौकरियों में अहम पदों, मसलन मानव संसाधन विभाग के प्रमुख के तौर पर तैनात हैं लेकिन मुख्य कारोबार से जुड़े अनुभव के मामले में वे कहीं पीछे हैं। जबकि किसी भी कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी या बोर्ड निदेशक बनने के लिए ऐसी योग्यता होना जरूरी माना जाता है।

एक अन्य बड़ी चुनौती संगठन में उच्च पदों पर महिलाओं की कमी की है। मध्यम प्रबंधन स्तर पर महिलाओं की अधिक संख्या न होने से शिखर की तरफ जाने वाली राह अवरोधों से भर जाती है। अध्ययनों से पता चला है कि भारत में कनिष्ठ स्तर से मध्यम स्तर के पदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत तेजी से गिरता है।

इसके कई कारणों में महिलाओं का शादी या मातृत्व की वजह से अपने पेशेवर करियर या उच्च शिक्षा को छोडऩा भी शामिल है। यही वजह है कि तीस वर्ष के आसपास की तमाम महिलाएं अपना करियर बीच में ही छोड़ देती हैं क्योंकि उनके लिए घर एवं काम दोनों भूमिकाओं के बीच न्याय कर पाना मुश्किल होने लगता है। कई भारतीय कंपनियों का प्रबंधन इस पहलू का जिक्र करते हुए यह कहता है कि महिलाओं के काम छोडऩे या दोबारा काम पर लौटने के फैसले पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता है। काम की लचीली नीतियां या बढ़ती हुई छुट्टियों की व्यवस्था करियर बनाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए थोड़ी ही मददगार हो सकती हैं।

इस सोच में एक बिंदु है लेकिन यह भी समान रूप से सच है कि महिलाएं अब भी कार्यस्थल पर दोहरे मानदंडों एवं गतिरोधों का सामना करती हैं। अब भी तमाम कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों की सोच बंद पाई जाती है। महिलाओं को कितनी ही बार लैंगिकवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है मसलन, 'आप महिलाएं आपस में क्या गॉसिप कर रही हैं' या 'फिर एक बार पुरुषों की शिकायत हो रही है क्या'?

जोन सी विलियम्स और रैचेल डेम्पसी ने अपनी चर्चित किताब 'व्हाट वक्र्स फॉर वूमन ऐट वर्क' में आधुनिक दौर के लिंग आधारित अवरोधों को चार श्रेणियों में बांटा है। महिलाओं को बार-बार खुद को साबित करना होता है, स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व के बीच सही संतुलन साधने की चुनौती किसी तनी रस्सी पर चलने जैसी होती है, कार्यस्थल पर माताएं हाशिये पर होती हैं और बरताव के सबसे अच्छे तरीके को लेकर महिलाओं के बीच आपसी प्रतिस्पद्र्धा देखी जाती है। इस तरह इस पर कोई संदेह नहीं है कि महिलाओं को अपने पुरुष सहकर्मियों की तुलना में अब भी आधा पाने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।

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