बिजनेस स्टैंडर्ड - वापस आ रही है धातु क्षेत्र की चमक
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वापस आ रही है धातु क्षेत्र की चमक

विशाल छाबडिय़ा और उज्ज्वल जौहरी / मुंबई/नई दिल्ली May 31, 2020

अनिल अग्रवाल को अपनी शानदार सफलता के लिए जाना जाता है। उन्होंने 1970 के दशक के मध्य में एक छोटे मेटल स्क्रैप डीलर के कारोबार से लेकर वेदांत रिसोर्सेज के कार्यकारी चेयरमैन बनने का सफर तय किया। वेदांत लिमिटेड और हिंदुस्तान जिंक में अपनी बड़ी हिस्सेदारी के जरिये वेदांत रिसोर्सेज एल्युमीनियम, तांबा, जस्ता, चांदी, लौह अयस्क, और कच्चे तेल के क्षेत्र में कारोबार करती है। पिछले 45 वर्षों के दौरान अग्रवाल ने कम से कम 6 अधिग्रहण किए और कई को नकदी पैदा करने वाले व्यवसायों में तब्दील किया।

बहुलांश हिस्सेदारी वाला बेहद सफल अधिग्रहण 2002 में हिंदुस्तान जिंक का किया गया था। लगभग 1,000 करोड़ रुपये में किए गए इस अधिग्रहण सौदे की लागत अब मौजूदा अनिश्चिता वाले बाजार में 47,000 करोड़ रुपये है और 18 वर्षों के दौरान इसने करीब 24 प्रतिशत का सालाना प्रतिफल (लाभांश भी शामिल) दिया है। इसलिए, यह समझना उचित होगा कि 66 वर्षीय अग्रवाल अन्य कई सामान्य निवेशकों के मुकाबले धातु कारोबार और व्यवसाय मूल्यांकन के बारे में ज्यादा समझ रखते हैं। अब, जब अग्रवाल अल्पांश शेयरधारिता खरीदकर वेदांत लिमिटेड को निजी कंपनी बनाना चाहते हैं, तो इसकी एक मुख्य वजह यह है कि व्यवसाय सस्ते मूल्यांकन पर उपलब्ध है। इसे लेकर कई विश्लेषक सहमत हैं।

एचडीएफसी सिक्योरिटीज में रिटेल रिसर्च के प्रमुख दीपक जसानी का कहना है, 'प्रवर्तकों के नजरिये से, धातु में बिकवाली अधिक हो सकती है, और इस वजह से  मौजूदा आकर्षक मूल्यांकन पर वेदांत को निजी कंपनी बनाने पर विचार किया जा सकता है।'

प्रभुदास लीलाधर के मुख्य कार्याधिकारी एवं मुख्य पोर्टफोलियो प्रबंधक (पीएमएस) अजय बोडके ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं। उनका कहना है, 'अक्सर, प्रवर्तक अपनी कंपनियों को ऐसे समय में निजी कंपनी बनाना चाहते हैं जब बाजार आंतरिक मूल्य पर उनका मूल्यांकन नहीं कर रहा हो।'

बोडके का कहना है कि अग्रवाल एक बेहद समझ-बूझ वाले निवेशक हैं, और वह लंबे समय तक वेदांत को प्राइवेट बनाए रखना नहीं चाहेंगे (यदि मौजूदा कोशिश सफल रहे) और मूल्यांकन आकर्षक होने पर इसे फिर से पब्लिक कंपनी के तौर पर देखना चाहेंगे।

इसलिए, मौजूदा समय में व्यावसायिक चक्र के क्या मायने हैं? एल्युमीनियम और तांबा जैसी प्रमुख धातुओं की कीमतें गिरकर एक दशक और 5 साल के निचले स्तरों पर आने के बाद मार्च-अप्रैल के निचले स्तरों से 16 प्रतिशत तक मजबूत हुई हैं। कीमतों में यह तेजी चीन में औद्योगिक गतिविधि बहाल होने और दुनियाभर में लॉकडाउन में नरमी की वजह से आई है। इससे भारत की हिंडाल्को, वेदांत और नालको जैसी प्रमुख धातु कंपनियों को राहत मिली है।

अभी भी कुछ विश्लेषक अल्पावधि परिदृश्य को लेकर सतर्क हैं। फिलिपकैपिटल के विकास सिंह का कहना है, 'प्रमुख एक्सचेंजों पर एल्युमीनियम इन्वेंट्री सुधरकर 17.8 लाख टन पर पहुंच गई है और वैश्विक तथा चीन में मासिक औसत दैनिक उत्पादन 1 प्रतिशत घटकर 175,000 टन और 99,000 टन पर रह गया है।' क्रिसिल रेटिंग्स का मानना है कि घरेलू मांग- खासकर पावर ट्रांसमिशन, ऑटोमोबाइल, और निर्माण क्षेत्रों से, घटी है।

हालांकि कोयला कीमतों में गिरावट सकारात्मक है। फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट्स के तहत बिकने वाले कोयले की कीमत आयात के मुकाबले 30-40 प्रतिशत सस्ती है और ई-नीलामी का औसत प्रीमियम दिसंबर 2018 के 131 प्रतिशत से घटकर मार्च में 36 प्रतिशत रह गया।

धातु कीमतों में उछाल और लागत में नरमी आने से शेयरों को मदद मिली है। जनवरी के 220 रुपये के ऊंचे स्तर से गिरकर मार्च में 88 रुपये पर रह जाने के बाद हिंडाल्को अब सुधरकर 139 रुपये पर आ गया है। वेदांत भी जनवरी के ऊंचे स्तरों से 60 प्रतिशत गिरने के बाद अब चढ़कर 92 रुपये पर आ गया है।

वेदांत में भारी गिरावट के लिए उसके विविधीकृत प्राकृतिक संसाधनों को जिम्मेदार माना जा सकता है , जिसमें तेल कीमतों में भारी गिरावट से नुकसान हुआ है। हिंडाल्को एक डायवर्सिफाइड कंपनी भी है और उसे अपनी अमेरिकी सहायक इकाइयों नोवेलिस और एलरिस (राजस्व में 70 प्रतिशत योगदान) से मदद मिलती है।

जसानी का मानना है कि वेदांत की सूचीबद्घता समाप्त कराना उसके प्रवर्तकों के लिए आसान नहीं हो सकता है, क्योंकि बड़े संस्थागत निवेशक पेश की गई मौजूदा कीमत को लेकर सहमत नहीं होंगे। जसानी का कहना है, 'धातु एक बेहद चक्रीयता वाला उद्योग है और ज्यादातर कंपनियां कर्ज में डूबी हुई हैं। अच्छे समय में कंपनियां मोटे मार्जिन और परिचालन दक्षता से लाभान्वित होती हैं और बुरे दौर में उन्हें दिवालियापन की स्थिति का सामना करना पड़ता है। अब हम इस चक्र के निचले छोर की ओर आ सकते हैं, पर आखिरकार अस्थिरता की स्थिति बाकी है।'

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