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अप्रत्याशित नहीं है चीन की हरकत

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 31, 2020

चीन की सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) जब लद्दाख में सरहद पर आक्रामक तेवर दिखा रही है तब मैं अमेरिकी राजनीतिक व्यंग्यकार पी.जे. ओ'रॉर्क को क्यों उद्धृत कर रहा हूं?

यह 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मैन' में उद्धृत उनकी एक बेहतरीन रचना है। आप इसे उनके संग्रह 'रिपब्लिकन पार्टी रेप्टाइल' में देख सकते हैं। इसमें एक हजार से भी कम शब्दों में समूचे मानव इतिहास को प्रस्तुत किया गया है। वह तमाम महान सभ्यताओं का जिक्र करते हैं जिनका विकास और पतन हुआ या जो समय के साथ बनी रहीं। हमारे लिए आज जो बात प्रासंगिक है वह यह कि चीन को खारिज करते हुए उन्होंने कहा, 'उधर चीन में, चीनी थे।' आप इसे जैसे चाहें वैसे समझ सकते हैं। मेरा मानना है कि वह रहस्यमय चीनियों को खारिज कर रहे थे। पश्चिम में यह सोच आम है। परंतु हम पश्चिम मेंं नहीं रहते। हम सभ्यताओं के आरंभ से ही उनके पड़ोस में हैं। अगर हम आजादी के बाद चीन के साथ अपने रिश्तों पर नजर डालें तो क्या कुछ रहस्यमय नजर आता है? सन 1962 में दो मोर्चों पर उसका सैन्य हमला हमारे नेताओं को चकित करने वाला रहा होगा लेकिन केवल इसलिए क्योंकि वे भ्रमित थे।

भारत को लेकर चीन का कोई भी कदम रहस्यमय नहीं रहा। बल्कि उसके बारे मेंं अनुमान लगाया जा सकता था। मिसाल के तौर पर सन 1965 में चीन के साथ 22 दिन की जंग के दौरान भारत से याक और भेड़ें लौटाने को कहना या इस साल लद्दाख में उसकी हरकत।

सन 1967 में सिक्किम में नाथू ला में उसकी हरकत शायद यह पता लगाने की कोशिश थी कि भारत कितना प्रतिरोध करता है। उन्हें लग रहा था कि भारत काफी कमजोर है। वह अभी अभी दो लड़ाइयों से निपटा था, वह अकाल से निपटा था और अनाज के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर था, देश में राजनीतिक अस्थिरता थी और इंदिरा गांधी कमजोर थीं। याद रहे वह सन 1964 में ही परमाणु क्लब में शामिल हो चुका था। परंतु भारत के जवाब ने उसे तत्काल एक सबक दे दिया। उस छोटे, स्थानीय लेकिन तीक्ष्ण ऐतिहासिक संघर्ष का पूरा ब्योरा हाल ही में प्रबल दास गुप्ता की किताब में सामने आया है जिसका शीर्षक है, वाटरशेड 1967: इंडियाज फॉरगॉटेन विक्ट्री ओवर चाइना। मुझे इस पुस्तक का ब्लर्ब (परिचय) लिखने का मान मिला है। उसके बाद चीन ने 53 वर्षों तक शांति बनाए रखी।

क्या आप उस प्रतिक्रिया को चीन की रहस्यमयता मानेंगे? उन्होंने हमारी पड़ताल की और करारा प्रतिवाद मिलने पर इंतजार करने का निर्णय किया। सन 1960 के बाद से छह दशक मेंं चीन भारत के साथ अपने संबंधोंं को अपनी इच्छा और मनचाही गति से दिशा प्रदान करता रहा है। आज हम भले ही नेहरू को दोष देते रहें, वह सन 1962 में ही बेमानी हो चुके थे। चीन को जो चाहिए था वह उसे सन 1962 में मिल गया था। सच यह है कि लद्दाख के सामरिक महत्त्व के छोटे-छोटे टुकड़ों को छोड़कर उसने लगभग पूरा कब्जा कर लिया था। उसने अपना दावा पेश करने के बाद अरुणाचल प्रदेश को बिना किसी सैन्य हस्तक्षेप के पूरी तरह भारत के कब्जे में जाने दिया।

उसने कभी अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा नहीं छोड़ा। इस क्षेत्र में और पूरी दुनिया मेंं सत्ता के समीकरण बदलने के साथ उसके तेवर भी बदलते रहे। सन 1986-87 में वांगडुंग-समद्रॉन्ग चू (अरुणाचल) में उसने हमें एक बार फिर परखा जब उसने देखा कि राजीव गांधी ने देश के रक्षा बजट को जीडीपी के 4 फीसदी से अधिक कर दिया है। उस समय ऑपरेशन ब्रासस्टैक्स के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहद खराब थे।

एक बार फिर भारत ने तीव्र प्रतिक्रिया दी और चीन पीछे हट गया। यही सबक सामने आया कि चीन बेमकसद गोली नहीं चलाएगा। कम से कम तब तक तो बिल्कुल नहीं जब तक कि उसे जीत का पूरा भरोसा न हो। यानी जब तक वह सन 1962 जैसा सबक सिखाने की स्थिति में न हों। और भी काफी बातें हैं। माओ त्सेतुंग सन 1970 में पेइचिंग में भारतीय दूतावास संभाल रहे ब्रजेश मिश्रा को देख रहस्यमय ढंग से मुस्काए थे। जनता पार्टी की तत्कालीन सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान उसने वियतनाम पर हमला किया था। सन 1992 में हमारे राष्ट्रपति की चीन यात्रा के दौरान उसने परमाणु परीक्षण किया था। इतना ही नहीं दलाई लामा की तवांग यात्रा को लेकर भी उसने नाराजगी दिखाई थी। यानी सन 1962 से दोकलाम तक सब एक तयशुदा तरीके से हुआ। संदेश दो, दावा मजबूत करो और वापस लौट जाओ। हाल के चूमर, देपसांग और दोकलाम विवादों का अंत इसी तरह हुआ। वह केवल अपनी हनक दिखाना चाहता है। चूमर में यह भारत के लिए था और दोकलाम में भूटान के लिए।

हम पत्रकारों के पास यह सुविधा होती है कि विषय के जानकारों से सीख सकें। हमें भी आजाद भारत के सर्वश्रेष्ठ सामरिक विद्वान के सुब्रमण्यम और जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी से लेकर सी राजा मोहन राव और कई अन्य विद्वानों से सीखने को मिला है। परंतु दो संवाद ऐसे हैं जो आज प्रासंगिक लगते हैं।

मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री संपादकों के एक समूह को मिलने बुलाया और हमेंं एक अहम सबक दिया। उन्होंने कहा कि चीन भारत को अस्थिर रखने के लिए पाकिस्तान को अत्यंत चतुराई से मोहरा बना रहा है। उन्होंने कहा कि हमारा भविष्य तभी बेहतर होगा जब हम त्रिकोणीय स्थिति का तोड़ निकालें।

वह पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते चाहते थे। उनका मानना था कि अधिक बड़े और ताकतवर चीन के बजाय पाकिस्तान से शांति स्थापित करना अधिक आसान होगा। चाहे जो भी हो चीन के लिए भारत को पाकिस्तान से उलझाए रखना कम महंगी रणनीति है। मनमोहन सिंह ने हमें जो रणनीति बताई थी वह आज उपलब्ध नहीं है क्योंकि पाकिस्तान मोदी और भाजपा की राजनीति के मूल में है। वे पाकिस्तान के बजाय चीन के साथ शांति स्थापना को महत्त्व देंगे। चीन के नेताओं के साथ बार-बार बैठकों और उनके जोरदार स्वागत का यही राज है।

दूसरी घटना वह है जब अटल बिहारी वाजपेयी ने बताया था कि चीन किस तरह सौदेबाजी करता है। उन्होंने कहा था, 'देखिए आप और हम बैठे हैं और वार्ता कर रहे हैं। हम दोनों कुछ चाहते हैं। मैं आपसे कुछ मांगूंगा, आप मना कर देंगे। मैं कहूंगा कि चलिए उतना नहीं कुछ कम दे दीजिए। आप दोबारा मना कर देंगे। लेकिन अंतत: आप थोड़ी रियायत देने को तैयार हो जाएंगे। परंतु चीन ऐसा कभी नहीं करेगा।'

दोनों नेताओं का यही कहना था कि चीन के व्यवहार में एक निरंतरता है जिसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए लद्दाख की घटना पर चकित होने की जरूरत नहीं है। हमें गत वर्ष 5 अगस्त को ही इसका अनुमान लगा लेना था जब हमने जम्मू कश्मीर का दर्जा बदला था।

हम इस बात से अनभिज्ञ नहीं थे कि उस भौगोलिक क्षेत्र मेंं एक तीसरा पक्ष चीन भी है। गृहमंत्री अमित शाह ने यह बयान देकर कोई रास्ता नहीं छोड़ा कि हम अपनी जान की बाजी लगाकर भी अक्साई चिन को वापस लेंगे। इसके बाद नए मानचित्र सामने आए और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के भारतीय क्षेत्र से गुजरने पर आपत्ति जताई गई। लद्दाख-अक्साई चिन मेंं सन 1962 से ही यथास्थिति बनी हुई है। भारत ने इसे बदलने का इरादा सार्वजनिक कर दिया।

लद्दाख में फिलहाल जमीनी हकीकत क्या है वह मुझसे मत पूछिए क्योंकि मुझे पता नहीं है। मैं उपग्रहों से ली जाने वाली तस्वीरें नहीं पढ़ सकता। दूसरे लोग उन्हें किस तरह पढ़ते हैं यह उनके राजनीतिक नजरिये से तय होता है। यह समय इतने ध्रुवीकरण का है कि 65 वर्ष पुरानी दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन तक पर राजनीति हो सकती है। ऐसे मेंं पहाडिय़ों की उपग्रहों द्वारा ली गई तस्वीर से अधिक ईमानदारी की आशा मत कीजिए। मैं बस यह कह सकता हूं कि इसका अनुमान पहले से होना चाहिए था और तैयारी भी कर लेनी थी। बीते 60 सालों की तरह चीन का कदम अनुमान के मुताबिक ही था। यहां तक कि उसने समय भी अनुमान के हिसाब से चुना यानी बर्फ पिघलने के बाद।

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