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आमूलचूल सुधार ही वास्तविक

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 29, 2020

यदि देश के किसानों को दी जाने वाली कुल सब्सिडी का आकलन किया जाए, जिसमें फसल उत्पादन पर मूल्य समर्थन, उर्वरक, बिजली और पानी की सब्सिडी तथा गत वर्ष शुरू की गई प्रत्येक किसान को सालाना 6,000 रुपये देने की योजना शामिल है तो यह पूरी राशि 4 लाख करोड़ रुपये अथवा जीडीपी के करीब 2 फीसदी के बराबर होगी। यह तब है जबकि सब्सिडी के कई तत्त्वों को शामिल नहीं किया गया है। मिसाल के तौर पर किसानों के बैंक ऋण पर कम ब्याज दर और समय-समय पर की जाने वाली कर्ज माफी आदि।

चूंकि ये तमाम सब्सिडी और मूल्य समर्थन कार्यक्रम फसली खेती के लिए हैं इसलिए 14 करोड़ हेक्टेयर खेती की जमीन के लिए सरकार की लागत करीब 30,000 रुपये प्रति हेक्टेयर पड़ती है। यानी दो हेक्टेयर तक के रकबे वाले छोटे किसानों को सालाना लगभग 60,000 रुपये का लाभ मिलता है। अगर आप यह बात किसी किसान से कहेंगे तो वह हंसेगा।

चूंकि इसमें इतनी राशि शामिल है इसलिए देश के मेहनतकश लेकिन संकटग्रस्त किसानों की मदद के लिए न्यूनतम आय समर्थन का विचार व्यावहारिक नजर आता है। परंतु केवल तभी जबकि हर तरह की मौजूदा सब्सिडी और मूल्य समर्थन को समाप्त कर दिया जाए। परंतु यह विचार अपने आप में इतना कठोर है कि केंद्र या राज्य का कोई सत्ताधारी दल इस पर शायद ही विचार करे। यही कारण है कि इस माह के आरंभ में कृषि सुधारों के नाम पर मामूली रद्दोबदल देखने को मिला।

वास्तविक सुधारों में पानी के अत्यधिक इस्तेमाल पर लगाम लगाना भी शामिल होगा। पानी का अत्यधिक इस्तेमाल इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पंप लगाने के लिए बिजली या तो नि:शुल्क मिलती है या उस पर भारी भरकम सब्सिडी दी जाती है। विद्युत अधिनियम में प्रस्तावित बदलाव में ऐसी क्रॉस सब्सिडी को खत्म करने की संभावना पहले ही खारिज है। ऐसे में आज विनिर्माण क्षेत्र इसकी भरपाई के लिए अतिरिक्त दर चुकाता है। पानी के अतिशय उपयोग को हतोत्साहित करने से पानी की कमी वाले इलाकों मसलन पंजाब में धान की खेती और महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में गन्ने की खेती पर अंकुश लग सकता है।

इससे चीनी और चावल के निर्यात को मिल रही कृत्रिम तेजी को भी खत्म किया जा सकेगा। ऐसे निर्यात पानी का निर्यात करने के समान हैं क्योंकि धान और गन्ने की फसल में सबसे अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। कुल मिलाकर, हम देश भर में बढ़ते जल संकट को भी थाम सकते हैं क्योंकि 80 फीसदी पानी का इस्तेमाल खेती में होता है।

कड़े सुधारों से अनाज का अतिशय भंडारण भी समाप्त होगा और वह धनराशि बचेगी जो अभी खाद्य सुरक्षा के नाम पर बरबाद हो रही है। इससे खरीद मूल्य को मिलने वाला कृत्रिम बढ़ावा दूर होगा जो गन्ने को देश की सबसे मुनाफे वाली फसल बनाता है। यही कारण है कि हमारे देश में चीनी की उत्पादन लागत विश्व में सबसे अधिक है और देश की चीनी की कीमत शेष विश्व बाजार से 50 फीसदी अधिक है। एक ओर जहां देश के उपभोक्ता इसकी लागत वहन करते हैं, वहीं सरकार को चीनी निर्यात को व्यावहारिक बनाए रखने के लिए प्रति किलोग्राम 10 रुपये की राशि व्यय करनी होती है।

आप कह सकते हैं कि ऐसे समय में जबकि अधिकांश किसान हाशिये पर जीवन बिता रहे हैं और गरीबी के कगार पर हैं, ऐसे में मौजूदा कृषि नीतियों को समाप्त करना बहुत सामान्यीकृत और नुकसान पहुंचाने वाला विचार है। कमोबेश सन 2016 की नोटबंदी की तरह। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि एक कम नुकसानदेह तथा भलीभांति सोचा-विचार और चरणबद्ध बदलाव वाला कार्यक्रम नहीं लागू किया जा सकता। खासतौर पर तब जबकि अंतिम लक्ष्य एकदम स्पष्ट है कि किसानों के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि, किसानों के वास्तविक कल्याण पर ही व्यय हो। उदाहरण के लिए, आज की लागत के एक छोटे हिस्से पर भी एक समझदारी भरी सब्सिडी और मूल्य समर्थन व्यवस्था लागू की जा सकती है और इसके साथ भी सभी किसानों के लिए एक अधिक उदार आय समर्थन योजना के लिए धन बचाया जा सकता है।

सरकार भी यही मानती है कि भारत में आमूलचूल सुधार केवल संकट के दौर में ही अपनाए जा सकते हैं। ऐसे में कोविड संकट को जाया नहीं करना चाहिए। यह सही है कि एक चिकित्सकीय संकट की तुलना आर्थिक नीति सुधार का अवसर देने वाले विदेशी मुद्रा संकट से नहीं की जा सकती है लेकिन यदि सुधार का विचार हो तो ऐसे वास्तविक सुधार लाए जाएं जो सकारात्मक परिणाम देने वाले हों।

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