बिजनेस स्टैंडर्ड - ठाणे के लघु उद्योगों में कम श्रमिकों के साथ काम जारी
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ठाणे के लघु उद्योगों में कम श्रमिकों के साथ काम जारी

सुब्रत पांडा और शैली सेठ मोहिले /  05 29, 2020

बिजनेस स्टैंडर्ड ठाणे के लघु उद्योगों में कम श्रमिकों के साथ काम जारीजब आप मुंबई से 20 किलोमीटर दूर ठाणे में वागले इंडस्ट्रियल एस्टेट में प्रवेश करेंगे तो आपको खाली दुकानें, नहीं बेचे जा सकने वाले सामानों का ढेर और मास्क पहने कुछ निराश कार्यकर्ता आपका स्वागत करते नजर आएंगे। महामारी और लंबे समय तक लॉकडाउन की वजह से इस एस्टेट में मौजूद करीब 200 विनिर्माण इकाइयों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं जहां से इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों से लेकर फार्मास्यूटिकल्स और परिधानों तक की बड़ी फैक्टरियां हैं और यहां से इन चीजों की आपूर्ति होती है। 

करीब 58 साल पुरानी इस एस्टेट में कभी 800 विनिर्माण इकाइयां हुआ करती थीं लेकिन अब रियल एस्टेट की लागत, ज्यादा यातायात और श्रमिकों की कमी की वजह से इसने अपना आकर्षण खो दिया है। फिर भी, ये इकाइयां प्रमुख ब्रांडों के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें लार्सन ऐंड टुब्रो, गोदरेज ऐंड बॉयस, सीमेंस, किर्लोस्कर ऑयल इंजन आदि जैसे ब्रांड शामिल हैं।  सूक्ष्म, लघु और मझोले स्तर के उद्यमों (एमएसएमई) की परेशानियों को दूर करने के लिए सरकार ने हाल में वित्तीय पैकेज की घोषणा की लेकिन यह उनकी वित्तीय चिंताओं को दूर करने में विफल रहा है । ऐसा लगा कि यह पैकेज पर्याप्त नहीं था और जो हाथ इन इकाइयों के पहिए चलाते थे वे अब गायब हो गए हैं।

फार्मास्यूटिकल उपकरण का निर्माण करने वाले टेकमेक इंजीनियर्स के पार्टनर ए वाई अकोलावाला कहते हैं, 'हालात ठीक नहीं है। हमें फैक्टरी चलाने में काफी मुश्किल आ रही है। लॉकडाउन नियमों में ढील दिए जाने के बाद एक पखवाड़े पहले इस इकाई में काम शुरू हुआ। लेकिन नए आदेशों को लागू करने की बात को दरकिनार कर दें तो मार्च के अधूरे काम को ही पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसकी वजह यह है कि यहां श्रमिकों की भारी कमी है।'  वह कहते हैं, 'लोग अपने गांव या पैतृक स्थानों पर चले गए हैं। हमारे पास 25 कर्मचारी हैं लेकिन अब मैं सिर्फ 10 के साथ काम कर रहा हूं। उनका यह डर है जो लोग यहां से गए हैं वे जल्दी वापस नहीं आएंगे। यह एक जरूरी सेवाओं की आपूर्तिकर्ता कंपनी है इसलिए टेकमेक के पास मांग की कोई कमी नहीं है। लेकिन श्रमिकों की कमी की वजह से यह नए ऑर्डर नहीं ले पा रहा है।'

कई अलग वजहों से भी लोगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। एमके रबर वक्र्स के मालिक जिमी मैलियाक्कल कहते हैं, 'हमारे कर्मचारी काम पर नहीं आ पा रहे हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर ठाणे के संवेदनशील क्षेत्रों में रहते हैं।'

कुछ मीटर की दूरी पर मौजूद सैंग फास्टनर्स में निदेशक अभिजात सांघवी 10-15 प्रतिशत क्षमता के साथ काम कर रहे हैं क्योंकि उनके 50 कर्मचारियों में से केवल 10 ही काम के लिए आ रहे हैं। ज्यादातर कर्मचारी मुंबई में रहते हैं और सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण आने-जाने में असमर्थ हैं।

सांघवी को इस बात का डर है कि उत्पादन शुरू करने में देरी से उन्हें ज्यादा नुकसान होगा क्योंकि कारोबार उनके प्रतिस्पर्धियों के पास चला जाएगा। वह कहते हैं, 'हम अपने ग्राहकों को सामग्री नहीं दे सकते हैं जिनके लिए हम एकल स्रोत वाले आपूर्तिकर्ता हैं। इसलिए वे मेरे प्रतिस्पर्धियों के पास जा सकते हैं।'

श्रमिकों की कमी के अलावा, इन एमएसएमई के संचालन में नकदी की भारी कमी देखी जा रही है। अकोलावाला कहते हैं, 'हम नकदी को लेकर जूझ रहे हैं। इसलिए हम अपने ग्राहकों से मार्च के लिए हमारा बकाया भुगतान करने के लिए कह रहे हैं ताकि हमारे पास अपनी फैक्टरियों को चलाने के लिए कुछ नकदी रहे।'

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा साझा किए गए प्रवासी मजदूरों के वापस आने के आंकड़ों के मुताबिक अब तक गुजरात और महाराष्ट्र से अधिकतम तादाद में श्रमिक उत्तर प्रदेश वापस गए हैं। दोनों राज्यों से क्रमश: दो लाख और 50,000 मजदूर उत्तर प्रदेश चले गए हैं और यह तादाद श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के जरिये यात्रा करने वालों की है।

चैंबर ऑफ स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (सीओआईए) के उपाध्यक्ष संदीप पारिख का कहना है कि ठाणे क्षेत्र की अधिकांश औद्योगिक इकाइयों ने मार्च महीने के लिए अपने कर्मचारियों को पूरी मजदूरी और अप्रैल के लिए 50 प्रतिशत मजदूरी दी है। इसके बावजूद यह महीना भी पूरी तरह बरबाद हो गया।

पारिख की कंपनी एसजे इंडस्ट्रीज को भी कामगारों की कमी की वजह से की तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जिन सामानों की बिक्री न हो पाई उसका भंडार जमा हो गया है जबकि आपूर्ति शृंखला में भी दिक्कत आ रही है और परिवहन सुविधाओं की कमी का सामना भी करना पड़ रहा है।

लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को पूर्ण मजदूरी देने के सरकार के निर्देश से नाराज एमएसएमई संघों का प्रतिनिधित्व करने वाली उद्योग संस्था कोसिया ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की है। पारिख के मुताबिक कुछ गुजारा भत्ता मिलने से मजदूर खुश थे। अब जब उनमें से ज्यादातर लोग वापस अपने गांव चले गए हैं  तो पारिख को यकीन नहीं हो रहा है कि उन्हें अब वापस आने के लिए राजी किया जा सकता है। वह कहते हैं, 'वे बहुत डरे हुए हैं और वे बस यहां से चले जाना चाहते हैं।'

एमएसएमई केंद्र जिन दो समस्याओं का सबसे ज्यादा सामना कर रहे हैं उनमें से एक श्रमिकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। दो महीने तक चले लॉकडाउन की वजह से उनकी हालत खस्ता हो गई है। वे सरकार के राहत पैकेज से राहत मिलने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन अब वह उम्मीद भी धराशायी हो गई है।

पारिख कहते हैं, 'सरकारी पैकेज पूरी तरह से व्यर्थ है। उन्होंने एमएसएमई के लिए कुछ भी नहीं किया है सिवाय ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) के रूप में 2,500 करोड़ रुपये देने के जिसके साथ भी कई तरह की चेतावनी और शर्ते हैं। बाकी सब चीजें गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों को स्थगित करने से जुड़ी हैं।'

वह आगे कहते हैं कि ऋण भुगतान पर रोक के बजाय ब्याज में छूट और सरकार द्वारा वेतन के कुछ हिस्से का भुगतान करने जैसे कदम से मदद मिलती क्योंकि ऋण भुगतान पर रोक से संकटग्रस्त उद्योगों की फंडिंग की लागत बढ़ेगी।

दूसरे भी इस बात पर सहमति जताते हैं। अकोलावाला कहते हैं, 'सरकारी पैकेज ऋण से जुड़ा है और इसलिए इससे हमें किसी भी तरह का फायदा नहीं होगा। इसके बजाय जीएसटी में कमी से अधिक मदद मिलती क्योंकि इससे इकाइयों को अन्य निश्चित और परिचालन लागतों को पूरा करने के लिए कुछ नकदी हाथ में होती।'

विशेषज्ञों को भी लगता है कि एमएसएमई के लिए सरकारी पैकेज कारगर नहीं है क्योंकि उपयोगकर्ता और उद्योग स्तर पर मांग को बढ़ाने के मकसद से कोई भी उपाय प्रत्यक्ष या लक्षित नहीं दिखते हैं। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर के आर सेकार कहते हैं, 'हालांकि पैकेज अच्छा लगता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर कम होता है। एमएसएमई कई मुद्दों का सामना कर रहे हैं चाहे वह प्राप्तियों से जुड़ा हो, औपचारिक ऋण मिलने की सहूलियत हो या फिर ज्यादा ब्याज लागत  हो। कोविड-19 की स्थिति ने हालात को बदतर बना दिया है।'

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