बिजनेस स्टैंडर्ड - खैरात नहीं... बेहतर नीतियों की आस
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खैरात नहीं... बेहतर नीतियों की आस

शुभायन चक्रवर्ती / मेरठ May 28, 2020

बिजनेस स्टैंडर्ड खैरात नहीं... बेहतर नीतियों की आससुनसान मेरठ शहर में बुधवार को केवल खाकी वर्दी वाले ही नजर आए लेकिन औद्योगिक क्षेत्र परतापुर में शोर करते हुए वाहन दिखाई दिए। दिल्ली की ओर जाने वाली सड़क यानी मेरठ के मुख्य औद्योगिक क्षेत्र में इस सप्ताह गतिविधियों में अचानक तेजी नजर आई है क्योंकि दो महीने बंद रहने के बाद ट्रक फिर से साजो-सामान ला रहे हैं और श्रमिक परिसरों की साफ-सफाई कर रहे हैं।

इस क्षेत्र में अब अनिवार्य स्वीकृति प्राप्त 300 विभिन्न इकाइयों का कहना है कि उन्हें दोबारा काम शुरू करने के लिए कुछ नकदी की जरूरत है। लेकिन सबसे छोटी गली वाली इकाई से लेकर सैकड़ों लोगों को रोजगार देने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्य उद्यमों (एमएसएमई) का कहना है कि वे केंद्र से मुफ्त अनुदान नहीं, बल्कि बैंक ऋण, नकदी प्रवाह और जीएसटी रिफंड से संबंधित नियमों में योजनाबद्ध तरीके से सुधार चाहते हैं।

ओलंपिक जिपर्स के प्रबंध निदेशक मयंक ए गुप्ता ने कहा कि उद्यमी सरकार द्वारा दी गई मुफ्त नकदी की खैरात नहीं, बल्कि एक ऐसा मार्ग स्थापित किए जाने में रुचि रखते हैं जिस पर उनका उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बच सके। अब निर्यातक चाहते हैं कि उनका एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर रिफंड और ड्यूटी ड्रॉबैक का तुरंत भुगतान किया जाए जो सरकारी कोष में अटका हुआ है। गुप्ता की कंपनी पॉलिएस्टर, धातु और प्लास्टिक जिपर के सबसे बड़े विनिर्माता के रूप में अपनी रेटिंग करती है जिसमें से अधिकांश भाग का निर्यात किया जाता है। गुप्ता कहते हैं कि उत्पादन के शीर्ष स्तर तक पहुंचने में 50-60 दिन लगेंगे। घरेलू बिक्री काफी कम है क्øोंकि ज्यादातर बाजारों ने अब तक जोर नहीं पकड़ा है और केवल उसी माल की खेप भेजी जा रही हैं जो 22 मार्च तक तैयार हो गया था।

सर्वाधिक अनुकूल स्थिति में दिल्ली से एक घंटे से भी कम दूर स्थित मेरठ एनसीआर में दूसरा सबसे बड़ा और सबसे अधिक विविधता वाला औद्योगिक केंद्र है जिसमें स्थानीय रूप से अनुमानित तौर पर 17,000 औद्योगिक इकाइयां हैं। उद्योगपति अक्सर इन दोनों शहरों के बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन इस फैलती महामारी ने एमएसएमई के लिए दरवाजे बंद कर दिए हैं। इनमें से कई ने 20 अप्रैल के बाद कारखाने खोलने की मांग की थी जब उद्योग के लिए लॉकडाउन में ढील दी गई थी। एक वरिष्ठ स्थानीय सरकारी अधिकारी ने कहा कि औद्योगिक इकाइयां मेरठ में एक लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं तथा उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों से आए बहुत-से श्रमिक छोड़कर जा चुके हैं। हालांकि योगी आदित्यनाथ सरकार जल्द ही अन्य औद्योगिक केंद्रों के साथ-साथ शहर के लिए विशेष धन की घोषणा कर सकती है।   

इस सप्ताह की शुरुआत में मेरठ औद्योगिक विकास मंच ने एमएसएमई मंत्रालय को सुझाव दिया था कि सरकार से जीएसटी के रिफंड की वापसी या बिक्री बिलिंग से प्राप्ति का बैंकों द्वारा वित्तपोषण किया जाना चाहिए, जबकि अगले वर्ष देय सावधि ऋण की किस्त को मौजूदा देनदारी के रूप में वर्गीकृत न किया जाए। साई इलेक्ट्रिकल्स के प्रबंध निदेशक गिरीश कुमार ने कहा कि हर कोई जानता है कि बैंकों की अपनी समस्याएं हैं और अचानक अधिक ऋण वितरण शुरू नहीं किया जा सकता है। ऑर्डर रद्द होने की स्थिति में हम पिछले साल के अपने राजस्व के 80 प्रतिशत स्तर तक पहुंचकर ही प्रसन्न हो जाएंगे। कुमार कहते हैं कि ट्रांसफॉर्मर विनिर्माण लागत वाला काम है और जब तक निर्माण कार्य गति नहीं पकड़ लेते, तब तक बिजली वितरण कंपनियों या निजी खरीदारों की मांग धीमी ही रहेगी।

कार्य स्थल के प्रबंधक ने बताया कि शहर के बाहर कंपनी की विनिर्माण इकाई में तकरीबन 100 में से केवल 20 कर्मचारियों ने ही दोबारा काम शुरू किया है। समय सीमा पहले ही आगे खिसकाई जा चुकी है। इस समय सीमा तक काम पूरा करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। अगर 50 से ज्यादा कर्मचारी हों तो, जिला क्वारंटीन नियम के तहत एक पाली में केवल 33 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए ही अनुमति होती है। परेशानी बेशुमार फिलहाल यह शहर कोविड-19 महामारी का प्रसार झेल रहा है। गुरुवार तक यहां 402 मामले सामने आ चुके हैं। इसके परिणामस्वरूप अधिकारियों ने लॉकडाउन में कड़ाई कर दी है।

कुछ ढील दिए जाने के एक दिन बाद शहरी क्षेत्र के हिस्सों को आम तौर पर बंद कर दिया जाता है। वेस्टर्न यूपी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा कि मई की शुरुआत में पूरे शहर को हॉटस्पॉट घोषित कर दिया गया था और पड़ोस का प्रत्येक भाग अपने आप में कंटेनमेंट क्षेत्र बन गया था। नतीजतन खुदरा कारोबार में प्रतिदिन दो करोड़ से ज्यादा का नुकसान होना जारी है। सुविधाओं में सुधार करने और माल की आवाजाही आसान बनान के लिए हम सरकार से नीतियों को सुधारने की काफी गुजारिश कर चुके हैं। संभवत: मेरठ के सबसे प्रसिद्ध उद्योग-खेलों का सामान बनाने वाले उद्योग ने सबसे अधिक चुनौतियों का सामना किया है। स्पोट्र्स गुड्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (एसजीईपीसी के अनुसार ऑर्डर रद्द किए जाने से केवल अप्रैल में ही 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। मेरठ में 3,000 विभिन्न कंपनियों अनुमानित रूप से 25,000 कर्मचारियों को रोजगार देती हैं। टेनिस का सामान बनाने वाली एक छोटी-सी इकाई के मालिक प्रमोद अग्रवाल ने कहा कि जालंधर के बाद मेरठ खेल उपकरणों का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन निर्यात में इसकी हिस्सेदारी ज्यादा है। जिले की सीमाएं बंद होने से तैयार उत्पाद को बाहर ले जाना भी लगभग असंभव है। औद्योगिक कोलाहल से दूर मेरठ के सबसे दमदार निर्यात क्षेत्र में से एक शहर की अंदरूनी गलियों में ही चुपचाप दम तोड़ सकता है जिसने 350 सालों से अपना कब्जा जमाया हुआ है। कैंची बाजार का कैंची उद्योग सालों से बड़ी चुनौतियों का सामना करता आया है जिसमें चीन की कंपनियों द्वारा मूल्य प्रतिस्पर्धा भी शामिल है। लेकिन इस लॉकडाउन ने कई लोगों को मुश्किल में डाल दिया है।

तीसरी पीढ़ी की कैंची बनाने वाले मोहम्मद रईस ने कहा, 'बहुत-से लोगों के पास तो जरूरी उपकरणों की मरम्मत तक के लिए भी पैसे नहीं हैं जिनका इस्तेमाल हम धार लगाने और वेल्डिंग के लिए करते हैं। पिछले पांच महीनों के दौरान मुझे एक भी भुगतान नहीं मिला है।' फरवरी तक रईस 15 लोगों को रोजगार दे रहे थे अब तीन लोगों के अलावा बाकी सब छोड़कर जा चुके हैं।

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