बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत का अपना 'न्यू डील' पल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, October 25, 2020 09:05 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

भारत का अपना 'न्यू डील' पल

विनायक चटर्जी /  05 27, 2020

कोविड संकट के कारण उत्पन्न मौजूदा परिस्थितियों पर की जा रही तमाम आर्थिक टिप्पणियों में विंस्टन चर्चिल की मशहूर उक्ति 'किसी भी संकट को कभी व्यर्थ न जाने दो' की आजकल अक्सर चर्चा हो रही है। लेकिन इसमें यह महत्त्वपूर्ण संदेश भी निहित है कि ऐसे चुनौतीपूर्ण हालात में आदर्श रूप से नीति-निर्माताओं को परंपरागत समझ से बाहर आकर मौजूदा समय के लिहाज से प्रासंगिक एकदम नए तरह के समाधान लेकर आने चाहिए।

अरबों रुपये का सवाल यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को एक ब्लैक होल में तब्दील होने से बचाने के लिए सही मायने में कितने बड़े राहत पैकेज की दरकार है? सरकार के समक्ष रखे गए तमाम सुझाव 'राहत पैकेज के मुख्य घटक' तालिका में दिए गए हैं।

करीब 30 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित पैकेज देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 14 फीसदी है। मौजूदा समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को इतने बड़े स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत है। इससे साफ जाहिर होता है कि परंपरागत तौरतरीकों पर आगे बढऩे से किसी भी तरह की बात नहीं बनने वाली है।

अब सवाल यह खड़ा होता है कि 30 लाख करोड़ रुपये का बंदोबस्त कहां से किया जा सकता है? मेरे हिसाब से इसके लिए संसाधन इस तरह जुटाए जा सकते है:

► केंद्रीय बजट के राजकोषीय घाटे को बढ़ाकर चार फीसदी राशि जुटाई जा सकती

राष्ट्रीय नवीकरण-प्रथम चरण (अक्टूबर 2020 तक) का सृजन कर पांच फीसदी राशि जुटाई जाए

राष्ट्रीय नवीकरण- द्वितीय चरण (नवंबर 2020 से मार्च 2021 तक) के माध्यम से पांच फीसदी राशि का इंतजाम किया जाए

इस समाचार पत्र में पिछले महीने प्रकाशित अपने लेख में मैंने कहा था कि राष्ट्रीय नवीकरण कोष (एनआरएफ) अपने आप में एक ऐतिहासिक पहल होगी। यह काफी हद तक रूजवेल्ट की तरफ से 1930 के दशक में लाए गए 'न्यू डील' कार्यक्रम या द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए लाए गए 'मार्शल प्लान' जैसा होगा।

एनआरएफ 50 वर्षों के लिए गठित एक कोष होगा जिसमें पहले 10 वर्षों के लिए पुनर्भुगतान पर रोक होगी। उसके बाद सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष करों या दूसरे रचनात्मक साधनों पर 1-2 फीसदी उपकर लगाकर इस फंड को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। (क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के साथ अनौपचारिक चर्चा में यह संकेत मिला है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वे भी एक विश्वसनीय पहल के तौर पर इस नई सोच वाली योजना का स्वागत कर सकती हैं।)

एनआरएफ के लिए 60 फीसदी वित्त का इंतजाम सरकार घरेलू बाजार से उधारी जुटाकर कर सकती है। और बाकी 40 फीसदी राशि की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय बाजार से मित्रवत रुख रखने वाले विकास वित्त संस्थानों के जरिये किया जा सकता है। कुछ उसी तरह जैसे बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए जापान से 0.5 फीसदी ब्याज पर 60 वर्षों के लिए एक लाख करोड़ रुपये जुटाए गए हैं।

लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि इस दिशा में आधे-अधूरे प्रयासों का कोई फायदा नहीं होने वाला है। 1930 के शुरुआती वर्षों में छाई महान आर्थिक मंदी ने रूजवेल्ट के न्यू डील कार्यक्रम के लिए बुनियाद तैयार की थी जिसमें बड़े पैमाने पर किए गए लोक निर्माण एवं वित्तीय सुधार कार्यक्रमों के प्रभाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आने वाले कई दशकों तक महसूस होते रहे। लिहाजा एनआरएफ में मुख्य रूप से जोर एक बेहद असरदार लोक निर्माण कार्यक्रम चलाने पर दिया जाना चाहिए। इसके दायरे में उन परियोजनाओं को रखा जाना चाहिए जो भारत के दूरदराज के इलाकों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा कर सकें।

लेकिन हम किस तरह का लोक निर्माण कार्यों  की बात कर रहे हैं?

ये परियोजनाएं ऐसी हों जो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने के साथ ही स्थायी परिसंपत्ति का निर्माण करे और उनका बहुस्तरीय प्रभाव भी हो।

स्वास्थ्य ढांचे को नए सिरे से गठित करने की जरूरत- अगर कोविड ने कोई एक काम किया है तो वह यह है कि किसी देश में स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति वहां के लोगों की जिंदगी और मौत का फर्क पैदा कर सकती है।

वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में होने वाले बदलाव से फायदा उठाने का मौका- कोविड महामारी से उबरने के बाद की दुनिया में कंपनियां अपने विनिर्माण एवं वैल्यू चेन गतिविधियों को चीन से हटाकर किसी और देश में ले जाकर अपना जोखिम कम करने की सोच रही हैं। ऐसे में भारत के लिए इस निवेश का कुछ हिस्सा अपने यहां आकर्षित करने का एक बढिय़ा मौका है।

इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मेरी राय में ये पांच तरह के लोक निर्माण कार्यक्रम कारगर हो सकते हैं:

तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड): सागरमाला परियोजना में अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी से करीबी संपर्क रखने वाले अत्यधिक एकीकृत लॉजिस्टिक एवं विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए ऐसे 14 क्षेत्रों की पहचान की गई थी। ये परियोजनाएं सरकार के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने और निवेशकों के लिए चीन के बाहर वैकल्पिक निवेश गंतव्य की तलाश का मकसद पूरा करते हैं। सीईजेड को विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) का उन्नत संस्करण होने के साथ ही भारत में कारोबार करने से जुड़ी सारी नकारात्मक बातों से दूर रखना चाहिए।

नदी संपर्क परियोजना: पानी की अधिकता वाली नदियों को कम पानी उपलब्धता वाली नदियों से जोडऩे का विचार कई दशकों से चर्चा में रहा है। इस तरह की विशाल परियोजना के पारिस्थितिकी एवं पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर पुरजोर तर्क दिए जाते रहे हैं लेकिन यह भी साफ है कि आने वाले दशकों में बढ़ते शहरीकरण एवं वृद्धि को देखते हुए पानी की मांग में होने वाली खासी बढ़ोतरी को पूरा करने के लिए जल ढांचागत क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है। भारत न्यू डील परियोजना के तहत अमेरिका में नदियों को जोडऩे के लिए बनाए गए टेनेसी वैली प्राधिकरण की तर्ज पर अपने कदम आगे बढ़ा सकता है।

राज्यों की नई राजधानियों का निर्माण: कोविड संकट ने बड़े महानगरों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे बड़े शहरी क्षेत्रों का विखंडन और शहरी वृद्धि का बड़े शहरों के बाहर भी फैलाव एक अच्छे विचार के तौर पर सामने आया है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिहाज से बल्कि क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता कम करने के लिहाज से भी अच्छा है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में अगर नई राजधानियों का निर्माण होता है तो ये दोनों ही मकसद पूरा होंगे।

नल से जल: वर्ष 2024 तक सबको जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार की तरफ से लाई गई यह परियोजना भी सफलतापूर्वक क्रियान्वित होने की स्थिति में ऐसा असर डालेगी कि दशकों तक उसे महसूस किया जाता रहेगा।

नए एम्स अस्पताल: दिल्ली का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नेहरू काल में बनाया गया था लेकिन इतने वर्षों बाद भी स्वास्थ्य सुविधा के मामले में वही अस्पताल शिखर पर है। समय आ गया है कि एम्स अस्पताल के निर्माण की सोच को दिल्ली के बाहर भी विस्तार दिया जाए और देश भर में ऐसे 22 अस्पतालों के निर्माण का प्रस्ताव तेजी से अमल में लाया जाना चाहिए। यह एक ऐसी परियोजना है जो कम कीमत पर स्तरीय स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की कोरोना-पश्चात जरूरत के लिहाज से भी अनुकूल है।

यह निश्चित रूप से इतिहास में भारत का अपना 'न्यू डील' वाला अहसास है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई को जीडीपी के 10 फीसदी हिस्से के बराबर 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा कर इस मौके को दोनों हाथों से लपकने की कोशिश की है।

(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)

Keyword: New Deal, NRF, Fiscal Deficit, Covid Crisis, GDP, राहत पैकेज, राजकोषीय घाटा, एनआरएफ, न्यू डील, क्रेडिट रेटिंग,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या स्मार्टफोन बाजार में दमदार वापसी कर पाएंगी देसी कंपनियां?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.