बिजनेस स्टैंडर्ड - मौजूदा एपीएमसी कानून सीमित कर रहे व्यापार एवं प्रतिस्‍पर्द्धा : रमेश चंद
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मौजूदा एपीएमसी कानून सीमित कर रहे व्यापार एवं प्रतिस्‍पर्द्धा : रमेश चंद

संजीव मुखर्जी /  05 25, 2020

बीएस बातचीत

केंद्र सरकार ने किसानों को अपनी उपज की बिक्री के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने और कृषि में निवेश बढ़ाने की दिशा में तीन कदमों की घोषणा की है। संजीव मुखर्जी के साथ बातचीत में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने कहा है कि सही ढंग से लागू होने पर इन कदमों से काफी मदद मिलेगी। पेश हैं संपादित अंश:

बिजनेस स्टैंडर्ड मौजूदा एपीएमसी कानून सीमित कर रहे व्यापार एवं प्रतिस्‍पर्द्धा : रमेश चंदकेंद्र ने कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) के दायरे से बाहर फसल उत्पादकों के लिए नए मार्केटिंग चैनल के गठन की अनुमति देने वाला कानून लाने और कृषि उपज के लिए ई-कारोबार का ढांचा खड़ा करने की घोषणा की है। बीते वर्षों में एपीएमसी का कामकाज कैसा रहा है?

एपीएमसी अधिनियम ने कृषि बाजारों में व्यवस्था लाने और बिचौलियों के हाथों किसानों का शोषण रोकने की दिशा में सराहनीय काम किए हैं। अधिकांश राज्यों में पहले अपने-अपने एपीएमसी कानून थे लेकिन केंद्रीय स्तर पर कानून आने के बाद इसका असली मकसद पूरा हो सका।

लेकिन एपीएमसी व्यवस्था समय और जरूरत के हिसाब से विकसित नहीं हो पाई। मंडी ढांचे में बढ़ोतरी कृषि जिंसों के अधिशेष की खरीद-बिक्री में वृद्धि से तालमेल नहीं बिठा पाई और आधुनिकीकरण एवं प्रतियोगी माहौल बढ़ाने की कोशिशें भी नहीं हुईं। समय के साथ एपीएमसी मंडियों में वसूले जाने वाले शुल्क कई राज्यों ने हद से अधिक बढ़ा दिए। मसलन, मंडियों में ग्रामीण विकास निधि, कृषि कल्याण उपकर, विकास उपकर लगा दिए गए। इसी तरह कुछ मंडियों में फलों एवं सब्जियों के कमीशन एजेंटों पर 4-8 फीसदी शुल्क लगा दिए गए।

इस तरह एपीएमसी अधिनियम की शक्ति का इस्तेमाल संसाधन पैदा करने और बिचौलियों के हितों की भरपाई में किया जाता रहा है। ये शुल्क एवं कर खेत एवं थाली के बीच के मूल्य अंतर को बढ़ा देते हैं, उत्पादकों को मिलने वाली राशि कम हो जाती है और उपभोक्ताओं को भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।

एपीएमसी कानून और इससे जुड़े नियम कृषि उपजों के कारोबार एवं प्रतिस्पद्र्धा को सीमित करते हैं। सबसे बड़ा अवरोध यह है कि कृषि उपज को केवल एपीएमसी द्वारा स्वीकृत जगह पर ही खरीदा और बेचा जा सकता है और इस सौदे पर एपीएमसी के सारे नियम-कानून लागू होते हैं। इसकी वजह से किसान अपनी पैदावार केवल एपीएमसी चैनल से ही बेचने के लिए बाध्य होते हैं और उन्हें अन्य स्थलों पर बेचने की छूट नहीं मिलती है। कुछ विशेषज्ञ इसे एपीएमसी का खरीदार एकाधिकार कहते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कोई भी खरीदार सीधे किसानों से उपज नहीं खरीद सकता है और उसे अनिवार्य रूप से एपीएमसी मंडी का रास्ता ही अख्तियार करना होगा। यह कृषि उपज में प्राथमिक कारोबार के वैकल्पिक चैनलों पर पूर्ण विराम लगा देता है।


कई बार एपीएमसी विरोधाभासी वैचारिक आग्रहों के चलते राजनीति का मैदान बन जाती हैं। नया कानून इस समस्या से कैसे निपटेगा?

प्रस्तावित केंद्रीय कानून एपीएमसी के कामकाज में कोई दखल नहीं देगा। एपीएमसी के कामकाज में कोई भी बदलाव राज्यों की विधानसभाएं ही कर सकती हैं क्योंकि कृषि बाजार एवं हाट राज्य सूची में आते हैं। नया कानून एपीएमसी के कामकाज से जुड़ी कुछ खामियों को दूर करने के लिए एक विकल्प पेश करने का काम करेगा। इससे एपीएमसी प्रणाली पर से अपना कारोबारी परिवेश सुधारने एवं नए ग्राहकों को आकर्षित करने का दबाव कम होगा।


दरअसल राज्यों ने कुछ वजहों से एपीएमसी को संरक्षण दिया हुआ है। ऐसे में वैकल्पिक उपज खरीद का ढांचा खड़ा करने वाला कोई भी कानून उनके अधिकार-क्षेत्र में दखल नहीं देगा?

यह कहना गलत है कि नया कानून मौजूदा एपीएमसी पर किसी तरह का दबाव डालेगा। इसका मकसद ही है कि मॉडल कानून में प्रस्तावित तमाम सुधारों को देश भर में समान रूप से लागू किया जाए। नया कानून किसानों के लिए उपज बेचने का नया विकल्प देने और कृषि कारोबार में लगी फर्मों  को देश भर में कहीं भी कारोबार करने की छूट देने की बात करता है और ऐसा करते समय वह एपीएमसी कानूनों के प्रावधानों एवं शुल्कों से मुक्त होंगी।

एपीएमसी ढांचा इतना सक्षम नहीं है कि देश भर में बिक्री योग्य कृषि उपज की खरीब-बिक्री को संभाल सके। अनुमान है कि आधा उपज अधिशेष मंडियों के जरिये बिकता है, बाकी उपज मंडियों के बाहर ही बेच दी जाती है।

नए कानून का एपीएमसी मंडियों पर इकलौता असर केवल यही दिख रहा है कि वे अधिक प्रतिस्पद्र्धी, सक्षम एवं किसान एवं कारोबार-अनुकूल हो जाएंगी और मंडियों में वसूला जाने वाला शुल्क भी उनकी सेवाओं के अनुपात में ही होगा।


एक मत यह है कि नीति-निर्माता एपीएमसी के सुधार को लेकर अनावश्यक जज्बाती हैं क्योंकि समूचे कृषि कारोबार का एक छोटा हिस्सा ही इन मंडियों का है। निजी कारोबारी पहले से ही बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में वैकल्पिक मार्केटिंग चैनल खड़ा करने से क्या बदलेगा?

एपीएमसी अधिनियम में सुधार का सुझाव लगभग सभी तरफ से आया है। मॉडल एपीएमसी अधिनियम 2003 को केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ परामर्श के बाद ही बनाया था। राज्यों के मंत्रियों की एक समिति 2010 में बनाई गई जिसे राज्यों को कृषि बाजार से संबंधित सुधार लागू करने के लिए मनाने का दायित्व दिया गया था। पहला एवं सबसे अहम सुझाव यही था कि राज्यों को इस मॉडल कानून के मुताबिक अपने एपीएमसी कानूनों को जल्द ही संशोधित करना चाहिए।

दूसरा सुझाव यह था कि कारोबारियों एवं कमीशन एजेंटों को लाइसेंस देने की मौजूदा प्रक्रिया बदलकर पंजीकरण की एक आधुनिक एवं पारदर्शी व्यवस्था अपनाई जाए।

कृषि जिंसों में कारोबार के लिए अधिकृत स्थल से बाहर ऐसा कारोबार करना एपीएमसी कानून का उल्लंघन है और दबे-छिपे रूप में यह काम किया जाता है। लेकिन कोई भी गैरकानूनी कारोबार बढिय़ा नतीजे नहीं दे सकता है। इसमें एपीएमसी कानून के शुल्कों एवं प्रावधानों से बचने के लिए अधिकारियों को भुगतान भी करना पड़ता है। यही वजह है कि कानून का पालन करने वाले कई निजी कारोबारी कृषि कारोबार से परहेज ही करते हैं। इसके अलावा किसानों एवं कारोबारियों के बीच अधिसूचित जिंसों में प्रत्यक्ष कारोबार की इजाजत नहीं है।

नया केंद्रीय कानून एपीएमसी बाजारों के बाहर होने वाली खरीद-फरोख्त को संस्थागत दर्जा देगा। ऐसे कारोबार को कानूनी वैधता मिलने से कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश, नवाचार, प्रतिस्पद्र्धा और ई-कॉमर्स लाने में मदद मिलेगी।


दशकों पुराने आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से कई महत्त्वपूर्ण उत्पादों को बाहर करने के लिए इस कानून में बदलाव किए जाने की भी काफी चर्चा हो रही है। अगर जिंसों के भाव में भारी उठापटक होती है तो क्या होगा?

आवश्यक वस्तु अधिनियम को उस समय सही ठहराया गया था जब देश खाद्यान्न के मोर्चे पर लगातार अवरोधों का सामना कर रहा था, परिवहन एवं संचार के साधन भी बहुत सीमित थे और इस कारोबार पर छोटे कारोबारियों का ही दबदबा होता था। ऐसी स्थिति में जमाखोरी एवं कालाबाजारी के जरिये मोटा मुनाफा कमाना आसान एवं लुभावना था। लेकिन अब हालात नाटकीय रूप से बदल गए हैं। अब देश में तिलहन एवं दालों को छोड़कर अधिकांश जिंसों में अधिशेष की स्थिति है। सभी प्रमुख फसलों में उपज की अस्थिरता कम हुई है और बाजार एकीकरण सुधरा है। आज के समय में निजी कारोबारी कीमतों में जोड़तोड़ के बजाय कहीं अधिक कमाई कर सकते हैं।

अनुभव बताते हैं कि कई मामलों में कीमतों में हुई असामान्य वृद्धि जमाखोरी के बजाय मांग एवं आपूर्ति संबंधी गतिरोधों के कारण हुई है। इस कानून में बदलाव कर अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को इसके दायरे से बाहर करने का प्रस्ताव है। इन उत्पादों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिए जाने के बाद उन पर कई तरह के नियंत्रण नहीं रखे जा सकते हैं।


आवश्यक वस्तु अधिनियम के अभाव में उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान कैसे रखा जाएगा, खासकर कीमतों में तीव्र उछाल या गिरावट की स्थिति में?

कुछ स्थितियां सरकार के नियंत्रण से भी बाहर हो सकती हैं और ऐसा होने पर कीमतों में आने वाली जबरदस्त उछाल उपभोक्ताओं, उत्पादकों एवं अर्थव्यवस्था तीनों के हितों के प्रतिकूल होगी। युद्ध, अकाल और गंभीर प्राकृतिक आपदा जैसी असामान्य स्थितियों के लिए कानून में एक प्रावधान जोड़कर मूल्य वृद्धि पर पारदर्शी नियंत्रण रखा जा सकता है। जिम्मेदार सरकार वाले सभी देशों में ऐसा किया जाता है। इसके अलावा कृषि कारोबार फर्मों के हितों को भी संरक्षित रखा जा सकता है।


तीसरा कदम कृषि उपज की कीमत एवं गुणवत्ता आश्वासन पर कानून बनाने का है। यह कैसे काम करेगा?

इस कानून के पीछे यह तर्क है कि किसान, खासकर छोटे किसान वैल्यू चेन भागीदारों एवं कृषि कारोबार फर्मों के साथ करार का हिस्सा बनें और नई पूंजी एवं उन्नत तकनीकी जानकारी तक पहुंच बना सकें। इससे एक ऐसी व्यवस्था बन सकेगी जिसमें किसान गुणवत्तापूर्ण उपज, अधिक मूल्य वाली फसलें उगाने और बाजार एवं कीमत संबंधी जोखिमों से सुरक्षित रह सकेंगे। वैल्यू चेन में किसानों की सहभागिता को कानूनी समर्थन देने से वे उन्नत एवं खास बाजारों और निर्यात के बारे में भी सोच सकेंगे।

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