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जल और थल मेंं दक्ष युद्धपोतों की क्षमता बढ़ाना आवश्यक

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  May 25, 2020

भारतीय नौसेना के पांच सबसे बड़े युद्धपोत विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने तथा मित्र देशों को अनाज पहुंचाने, वहां चिकित्सा टीमों को लाने ले जाने तथा औषधियां पहुंचाने के काम में लगे हैं। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा मुहैया कराने वाले देश की हमारी छवि मजबूत हो रही है। इन पांचों पोतों-आईएनएस जलाश्व, केसरी, मगर, शार्दूल और ऐरावत में एक बात साझा है: ये सभी उभयचर (जल-थल दोनों में कारगर) हमलावर पोत हैं। ऐसे पोत इसलिए बनाए जाते हैं ताकि बड़ी तादाद में सैनिक, हथियार आदि शत्रु के तट पर ले जाए जा सकें। ये पोत जवानों को ले जाने, मानवीय सहायता और आपदा राहत के लिए भी उपयुक्त हैं। भारत जैसी क्षेत्रीय शक्ति जो खुद को हिंद महासागर का निगहबान दर्शाती है, उसके लिए मजबूत उभयचर बेड़ा तैयार करना कूटनीतिक और सामरिक दृष्टि से बेहतर है। यह बेड़ा हमारी 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा और विभिन्न द्वीपों की रखवाली करता है और जरूरत पडऩे पर आपदा राहत भी पहुंचाता है।

प्रधानमंत्री की इस समूचे क्षेत्र के विकास और सुरक्षा से जुड़ी पहल 'सागर' में नौसेना की मानवीय सहायता और आपदा राहत की भूमिका का अहम योगदान है। सन 2004 की सूनामी के वक्त भी इस क्षेत्र के देशों को भारतीय मदद ने अमेरिकी नौसेना को हमारी ताकत का अहसास कराया था। पिछले वर्ष ही भारत के छोटे उभयचर बेड़े को समूचे हिंद महासागर क्षेत्र में सराहना मिली। मार्च 2019 में जब इदाई चक्रवात ने मोजांबिक पर असर डाला था तब आईएनएस शार्दूल ने बेरिया बंदरगाह पहुंचकर मदद की थी। इस बीच आईएनएस मगर कोच्चि से मुंबई पहुंचा आर टनों खाना, दवाई और अन्य आपूर्ति लेकर बेरिया रवाना हुआ।

गत जनवरी मेंं कोविड-19 की आहट के बीच अदा चक्रवात ने मेडागास्कर को प्रभावित किया। अच्छी बात है कि आईएनएस ऐरावत सेशेल्स की राह पर था, उसे तत्काल मेडागास्कर भेजा गया। वहां के राष्ट्रपति ने भी इसकी सराहना की। ऐसी मदद क्या असर छोड़ती है इसे इस बात से समझ सकते हैं कि मई 2017 में जब आईएनएस सुमित्रा बंगाल की खाड़ी में तैनात था तब बांग्लादेश में 'मोरा' तूफान आया था। तूफान ने उसके 33 मछुआरों को चटगांव से 100 समुद्री मील दूर बहा दिया था। आईएनएस सुमित्रा ने उन्हें बचाया। बांग्लादेशी मीडिया ने भारत की जमकर तारीफ की थी।

इसके बावजूद विमानवाहक पोत और पनडुब्बी विकास में जोरदार प्रगति करने वाली नौसेना मानवीय सहायता और आपदा राहत क्षमता विकास मेंं हिचकिचा रही है। सन 1934 में रॉयल इंडियन नेवी की स्थापना के बाद ऐसी योजनाएं बनीं लेकिन उनमें प्रगति नहीं हुई। आजादी के बाद नेहरूवादी नीति ने उभयचर युद्ध क्षमता को आक्रामकता से जोड़ दिया। मौजूदा नौसेना के पास फंड का अभाव है इसलिए यह प्राथमिकता से बाहर है। हमने पहला उभयचर पोत सन 1960 के दशक मेंं पोलैंड से खरीदा। सन 1971 में चटगांव में उभयचर पोत ले जाने में भारी नाकामी हाथ लगी थी जो जीत के परदे में ढक गई। सन 1980 के दशक मेंं एक बड़ा उभयचर पोत सेवा मे आया। लैंडिंग शिप टैंक (मीडियम) एलएसी-एम भी पोलैंड से खरीदा गया था। जबकि एलएसटी (लार्ज) भारत में बनाया गया। ये चपटी सतह वाले यान थे जो टैंक और सैन्य टुकडिय़ों को शत्रु के समुद्र तट के करीब ले जा सकते थे। श्रीलंका में ऑपरेशन पवन (1987-90) के दौरान शांति सेना द्वारा इनका सफल इस्तेमाल किया गया। परंतु उभयचर युद्ध क्षमता हाशिये पर बनी रही।

वर्ष 2004-05 के बाद हालात बदल गए। हिंद महासागर में आई सूनामी ने भारतीय नौसेना को आपदा राहत और मानवीय सहायता के क्षेत्र में उसकी क्षमताओं और कमियों का अहसास कराया। अमेरिका के साथ नए रिश्ते में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक भागीदारी का विचार शामिल हुआ और अमेरिका ने भारत को एक ऐसा पोत लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (एलपीडी) बेचा। इसे 2007 में आईएनएस जलाश्व का नाम दिया गया।

यह किफायती तो था ही साथ ही यह अमेरिकी मरीन कोर की अवधारणा अपने साथ लाया। इसके तहत पोत समुद्र में 30-40 किमी भीतर रहता है और वहीं से इसके छह हेलीकॉप्टर हमले शुरू करते हैं। प्रत्येक हेलीकॉप्टर पर 10-12 जवान तैनात रहते हैं। चूंकि एलपीडी को उथले पानी में नहीं जाना होता इसलिए उसे खतरा कम रहता है। जलाश्व गहरे समुद्र से ही चार लैंडिंग क्राफ्ट मेकनाइज्ड (एलसीएम) लॉन्च करता है। इनमें से प्रत्येक 150 इन्फैंट्रीमेन या 50 सैनिकों और हथियारबंद वाहन को ले जा सकता है। यानी जलाश्व एक बार में ही एक पूरी बटालियन को ले जा सकता है। मानवीय सहायता या आपदा में इस्तेमाल के लिए 16,600 टन का आईएनएस जलाश्व जैसा एलपीडी एक बार में 1,000 लोगों को बचा सकता है। इसमें चार ऑपरेशन थिएटर, 12 बिस्तर का वार्ड, एक प्रयोगशाला और एक दंत चिकित्सा इकाई शामिल हैं। इसे सैकड़ों लोगों के लिए अस्पताल पोत में भी बदला जा सकता है। एलपीडी की दोहरी क्षमता को देखते हुए नौसेना ने 2008 में चार और एलपीडी बनाना तय किया जो आईएनएस जलाश्व से बड़े होंगे। उसी वर्ष निविदा जारी कर दी गई थी लेकिन 12 वर्ष बाद भी यह इस आशंका में स्थगित है कि कहीं आपूर्ति के मामले में खराब रिकॉर्ड वाला कोई निजी पोत निर्माता न्यूनतम बोली लगाकर कामयाबी न हासिल कर ले और वह इस आपूर्ति में भी विफल न हो जाए। अब नौसेना दोबारा नई निविदा जारी करने जा रही है जहां नए खरीद नियम लागू होंगे।

यदि इस नई निविदा को विशेष आपात स्थिति न माना जाए तो शायद तीन नए एलपीडी इस दशक के अंत में ही मिल पाएंगे। ऐसे में इस निविदा का काम तेज गति से निपटाना जरूरी है। आईएनएस मगर और घडिय़ाल भी अब उम्रदराज हो चले हैं। ऐसे में दो नए एलएसटी (एल) के लिए भी निविदा जारी की जानी चाहिए।

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