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कोविड के बाद व्यापार सौदों को अंजाम देने की कला

प्रांजुल भंडारी /  05 25, 2020

अब किसी के लिए भी यह रहस्य नहीं रह गया है कि इस साल आर्थिक वृद्धि बहुत कम रहेगी। ऐसे समय में जल्द हालात को सामान्य करने के साथ ही इस संकट की वजह से पैदा हुई नई वृद्धि संभावनाओं का दोहन करने की भी चुनौती होगी। उसके लिए हमें इस बात पर गौर करना होगा कि कोविड-19 अपने पीछे कौन से निशान छोड़कर जाने वाला है? किस तरह के खतरे एवं अवसर होंगे? भारत उनका सामना करने के लिए किस तरह खुद को तैयार कर सकता है?

महामारी से जुड़े अनुभवों के चलते पूरी दुनिया में अपने घरेलू क्षेत्र को लेकर एक तरह का आग्रह दिख सकता है। घरेलू स्तर पर अधिक उत्पादन और नए राष्ट्रीय विजेताओं के विकास को बढ़ावा देने की कवायद काफी तेज हो सकती है। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं सीमित होंगी और देशों के बीच होने वाले कारोबार में कमी आ सकती है। सच कहें तो वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से ऐसा होना शुरू भी हो चुका है लेकिन कोविड संकट के बाद इसमें और तेजी आ सकती है।

फिर भी समय के साथ निर्यात के लिए नए बाजार भी बढ़ सकते हैं क्योंकि आयातक खुद को विविधीकृत करने के लिए नई उत्पादकों का रुख करेंगे। लेकिन भारत को इस मौके का फायदा उठाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि सिमटते हुए बाजार में हिस्सा हासिल करना कभी भी आसान नहीं होता है। कारोबार करने को आसान बनाने से जुड़े सुधारों को लागू करना काफी हद तक इसकी प्रशासकीय क्षमता पर निर्भर करता है।

अगर वैश्विक व्यापार सिमटता है तो विदेश से होने वाला वित्त पोषण भी कम हो जाएगा। और अगर पूंजी पर नियंत्रण एवं अन्य पाबंदियां बढ़ती हैं तो विदेशी फंड लुभावने प्रतिफल का लालच देखकर ही उभरते बाजार के जोखिमों को नजरअंदाज करेंगे। अधिक वृद्धि की संभावना वाले देशों को अधिक नकदी मिलेगी। भारत के लिए इसका मतलब बेहद जरूरी सुधारों को अंजाम देने से है।

ये सुधार क्या हैं? भारत की संभावित वृद्धि को बेहतर करने वाले और इसकी निर्यात प्रतिस्पद्र्धात्मकता बढ़ाने वाले उपाय मोटे तौर पर इस श्रेणी में आते हैं। लेकिन हम निर्यात को प्रतिस्पद्र्धी बनाने पर ध्यान देंगे क्योंकि इस मोर्चे पर प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। वित्त वर्ष 2013-14 से ही प्रमुख क्षेत्रों का निर्यात गिरकर जीडीपी के 4.5 फीसदी तक आ गया है। विश्व व्यापार के अनुपात में भारत का अंशदान महज 1.7 फीसदी है। इस दिशा में हुई प्रगति बहुत कम रही है।

इसके लिए जिम्मेदार कारणों की तलाश करने पर हमने तीन प्रमुख कारकों की पहचान की: घरेलू अड़चनों के चलते 50 फीसदी सुस्ती रही, सुस्त वैश्विक वृद्धि का योगदान 33 फीसदी और विनिमय दर का अंशदान 20 फीसदी से भी कम रहा है।

लेकिन यह स्थिति वृहद स्तर पर है। जब हमने निर्यात के क्षेत्रवार आंकड़ों पर गौर किया तो कुछ ऐसा पता चला जो हमारी आंखें खोल सकता है। तीनों प्रमुख कारक अब भी मायने रखते हैं लेकिन क्षेत्र-विशेष से जुड़े कारकों की भी भूमिका काफी अहम रही है।

अगर कुछ बिंदुओं का उल्लेख करें तो हमने पाया कि वैश्विक मांग कृत्रिम रेशे की तरफ बढऩे के बावजूद कपास उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता होने और कपास के बारे में असंगत नीतिगत कदमों ने वस्त्र निर्यात की वृद्धि को संकुचित किया है। इसी तरह कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए सिंचाई ढांचा मायने रखता है और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और घरेलू आयात शुल्क दरें मायने रखती हैं।

हमें अपने अध्ययन से कई ऐसी बातें पता चलीं जो भारत का निर्यात बढ़ाने के लिए जरूरी है:

पहला, घरेलू गतिरोधों को दूर करने से समूचे निर्यात क्षेत्र को मदद मिलेगी। इसकी सूची काफी लंबी है लिहाजा भूमि, बिजली एवं परिवहन क्षेत्रों में अधिक जरूरी सुधारों पर गौर किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में बदलाव की चाल पहले से ही जारी है।

मसलन, राज्यों ने हाल में बड़े भूमि बैंक बनाने की कुछ घोषणाएं की हैं, खासकर बंदरगाहों और हवाईअड्डों के आसपास। इन स्थानों को विनिर्माण केंद्र के तौर पर विकसित करना, कोयले की अधिक टिकाऊ आपूर्ति के लिए नई वाणिज्यिक कोयला खनन नीति लेकर आना और भारत के प्रमुख बंदरगाहों को अधिक सक्षम बनाना।

दूसरा, क्षेत्र-आधारित कारक एक सार्थक अर्थ पैदा कर सकते हैं। मुक्त बाजार के समर्थक यही चाहेंगे कि अधिकारी कारोबार के फलने-फूलने वाला एक माहौल बनाने की दिशा में काम करें, न कि क्षेत्र-आधारित नीतियां बनाने में जुटे रहें। वैसे पिछली नीतियों की वजह से कुछ समस्याएं होने से खुछ क्षेत्र-आधारित सुधारात्मक कदमों की जरूरत हो सकती है। मसलन, कपास एवं कृत्रिम रेशे दोनों के लिए समान समर्थन होने से भारत के कपड़ा निर्यात के लिए अधिक सेहतमंद संतुलन एवं वृद्धि हासिल की जा सकती है।

तीसरा, दुनिया को यह संकेत दें कि भारत व्यापार के लिए तैयार है। यहां, भारत पिछले दो-तीन वर्षों में आयात शुल्क बढ़ाकर एकदम उलटा करता रहा है। इस रवैये के साथ जुड़ा जोखिम यह है कि आयात पर कर लगाने का परिणाम निर्यात पर कर लगाने के रूप में सामने आ सकता है। इसके बजाय, भारत को एशिया के क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते का हिस्सा बनना चाहिए और इस मौके का फायदा उठाना चाहिए।

चौथा, निर्यात संबंधी चिंताओं का ठीकरा अकेले मुद्रा पर फोडऩा कोई समाधान नहीं है। वर्ष 2014-19 के बीच रुपये की कीमत में 11 फीसदी तक की वास्तविक प्रभावी दर पिछले कुछ वर्षों में निर्यात में आई एक चौथाई की सुस्ती को बयां करती है।

आखिर में, भारत की आईटी कंपनियों के लिए कुछ अच्छी खबरें भी हैं। वर्क फ्रॉम होम के लोकप्रिय होने से दुनिया भर में डिजिटल कायांतरण, साइबर सुरक्षा और क्लाउड माइग्रेशन में अधिक निवेश किए जाने की संभावना है। भारतीय आईटी कंपनियों ने अतीत में खुद को नए बदलावों के लिए काफी तैयार दिखाया है और इस मौके का फायदा उठाने के लिए वे बेहतर स्थिति में नजर आ रही हैं। उन्हें फलने-फूलने की छूट दी जानी चाहिए।

अतीत में ऐसा हुआ है कि भारत ने संकटकाल में ही व्यापक स्तर पर सुधार किए हैं। अगर वह तेजी से सही रणनीतिक विकल्प चुन सकता है तो वह आर्थिक वृद्धि एवं रोजगार सृजन में खोई रफ्तार की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है।

(लेखिका एचएसबीसी सिक्योरिटीज ऐंड कैपिटल मार्केट्स इंडिया की चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट हैं)

Keyword: FDI, Global Trade, Port, Airport, Import, Export, आर्थिक वृद्धि, आपूर्ति शृंखला, वैश्विक व्यापार, निर्यात, कृषि उत्पाद,
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