बिजनेस स्टैंडर्ड - तीन शक्तिशाली पद और एक महामारी
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तीन शक्तिशाली पद और एक महामारी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 24, 2020

एक जानेमाने अफसरशाह ने देश के शासन के बारे में अहम बात कही थी। उनका कहना था कि यह तीन इंजनों पर चलता है: पीएम, सीएम और डीएम, यानी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी। उन्हें इस बेहतरीन व्याख्या का श्रेय देते हुए मैं अपने विवेक का भी इस्तेमाल करना चाहूंगा ताकि आगे प्रस्तुत दलीलोंं का ठीकरा उनके सर न फूटे।

उनकी यह टिप्पणी कोरोनावायरस के दौर की नहीं है बल्कि उन्होंने एक स्थापित व्यवस्था को रेखांकित किया था। इस महामारी के दौरान सरकार ने महामारी अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जो विशेष अधिकार हासिल किए हैं उन्होंने इसे और अधिक स्पष्ट कर दिया है।

हमें यह सवाल पूछने की आवश्यकता है और इस पर बहस भी होनी चाहिए कि क्या इस सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आपातकाल में इस त्रिस्तरीय तानाशाही ने देश को फायदा पहुंचाया भी या नहीं। कहीं यह गड़बडिय़ों के लिए जवाबदेह तो नहीं रहा। खासकर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को हुई समस्याओं के लिए। पीएम-सीएम-डीएम युग को 2014 के बाद मजबूती मिली। बीते छह वर्ष में किसी मंत्री को कुछ बोलते हुए नहीं सुना गया। यदि सबसे वरिष्ठ मंत्रियों को भी देखें तो अमित शाह के अलावा कोई नाम ध्यान नहीं आएगा। कैबिनेट व्यवस्था बेअसर है। सामूहिक जवाबदेही, आंतरिक बहस और असहमति समाप्त हो चुकी है।

नोटबंदी जैसा बड़ा निर्णय तक कैबिनेट से छिपाकर चुपचाप लिया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी के दौर में असहमति की बहुत अधिक गुंजाइश थी। परंतु इससे पीएम-सीएम-डीएम वाली दलील को ही बल मिलेगा। शायद 18 सालों के गठबंधन सरकारों के दौर ने हमें बिगाड़ दिया था। उस गठबंधन के युग में भी तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश में वाई एस राजशेखर रेड्डी, उत्तर प्रदेश में मायावती और गुजरात में नरेंद्र मोदी के रूप में क्षेत्रीय तानाशाहों का उदय हो चुका था। ये सभी ताकतवर मुख्यमंत्री थे। उनके बीच और मौजूदा प्रधानमंत्री के बीच सबसे प्रमुख समानता यह है कि उनके मंत्री भी ऐसे ही बेबस और शक्तिहीन थे। आज की तरह तब भी चुनिंदा अफसरशाह ही तमाम अधिकारों का इस्तेमाल करते थे। अब महामारी ने उस महामारी अधिनियम को लागू करने की आवश्यकता पैदा की है जिसे अंग्रेजों ने अपने सबसे बड़े उपनिवेश के लिए सन 1897 के प्लेग के दौर में बनाया था और जिसके तहत केंद्र सरकार को ऐसे शक्तिशाली आदेश जारी करने का अधिकार है जो मध्य युग में पोप द्वारा जारी आदेशों के समान हों और जिन पर कोई सवाल न खड़ा किया जा सकेे। आपदा प्रबंधन कानून ने इसे और मजबूती प्रदान की है। इसके जरिये अधिकारों का पूरी तरह केंद्रीकरण कर दिया गया है। सन 2004 की सूनामी के बाद यह कानून बनाते वक्त संप्रग ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इसका यह हश्र होगा। इसीलिए पुरानी समझ कहती है कि कोई भी बुरा कानून पारित करते वक्त सावधान रहना चाहिए। ऐसा कानून जल्दबाजी में कतई नहीं पारित करना चाहिए।

कानून बनाने वालों ने यही सोचा होगा कि कोई आपदा एक, दो या चंद राज्यों को प्रभावित करेगी। सूनामी से ऐसा ही हुआ था। लेकिन इस बार महामारी आ गई और केंद्र सरकार को यह मौका मिल गया कि वह सारे अधिकारों का केंद्रीकरण कर दे। इस हद तक केंद्रीकरण हुआ है कि प्रधानमंत्री राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सीधे बात करते हैं और हर किसी को मौका तक नहीं मिलता। यही नहीं वह सरपंच और जमीनी अधिकारियों से सीधे बात कर सकते हैं। कैबिनेट सचिव द्वारा मुख्य सचिवों के साथ बैठक में कुछ भी गलत या असंवैधाानिक नहीं है लेकिन सवाल यह है कि ऐसे में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं की क्या स्थिति रह जाती है? खासतौर पर तब जब हालात बेकाबू हो जाएं। हमने श्रमिकों के साथ घटी त्रासदी देखी। किसे उत्तरदायी ठहराया जाएगा? कौन इसकी जवाबदेही लेगा? यहां एक विरोधाभास देखा जा सकता है। यदि इन दोनों कानूनों और संसद में बहुमत ने पूरे अधिकार प्रधानमंत्री को सौंप दिए हैं तो मुख्यमंत्रियों की क्या भूमिका है? यह बात हमारे तीन इंजन वाले फॉर्मूले को किस तरह प्रभावित करती है? देश के राजनीतिक नक्शे पर नजर डालिए। शक्तिशाली केंद्र सरकार के अधीन भी कई छोटी तानाशाहियां नजर आएंगी। इसका पार्टी लाइन से कोई लेनादेना नहीं है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय दलों के अत्यधिक शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने इन्हीं विशेष कानूनों के सहारे खुद को और अधिक मजबूत बनाया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का एकतरफा राज है। केंद्र के तमाम विशेष अधिकारों के बावजूद अपनी-अपनी तरह से वे या तो उसके साथ सहयोग करते हैं या उसकी अवहेलना। उदाहरण के लिए तेलंगाना और पश्चिम बंगाल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की झिड़कियों के बावजूद कोरोना की बहुत कम जांच कर रहे हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार मृतकों की गिनती किस तरह कर रही है यह समझ से परे है। क्या कांग्रेस इन बातों से मुक्त है? कांग्रेस के ज्यादा मुख्यमंत्री नहीं हैं लेकिन पंजाब में अमरिंदर सिंह के पास कम से कम पिछले 45 साल के दौरान हुए पूर्ववर्तियोंं से अधिक ताकत है।

यह देखना दिलचस्प है कि केंद्र और राज्यों की राजधानियों मेंं बैठे ताकतवर लोगों के बीच अधिकारों को लेकर एक तरह का राजनीतिक अनुबंध नजर आ रहा है। आपको भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों को देखकर अवश्य दुख होगा। खासकर शिवराज सिंह चौहान और विजय रूपाणी जैसे मुख्यमंत्री जो अधिकार विहीन हैं और जिन्हें बलि का बकरा बनाकर छोड़ दिया गया है। भाजपा में भी योगी आदित्यनाथ और बीएस येद्दियुरप्पा कुछ हद तक शक्तिशाली हैं। नीतीश कुमार बिहार में शासन चला रहे हैं और आश्वस्त हैं कि वह इस वर्ष के अंत में होने वाले चुनाव जीत जाएंगे। ओडिशा में नवीन पटनायक का शासन है। महाराष्ट्र अपनी तरह का अनूठा प्रांत है। वहां पिता-पुत्र की तानाशाही इस संकट में परेशानी से जूझ रही है। उनकी पार्टी को विधानसभा में बमुश्किल 20 फीसदी सीटें हासिल हैं। उन्हें देश की औद्योगिक/आर्थिक राजधानी को चलाने का दायित्व सौंपा गया था लेकिन वे पूरी तरह भ्रमित नजर आ रहे हैं। देश की वित्तीय राजधानी मुंबई अब महामारी का केंद्र बन चुकी है। नेता न तो इसे नियंत्रित कर पा रहे हैं और न अर्थव्यवस्था को खोल रहे हैं। मंत्रिमंडल का कहीं अता-पता नहीं है। अब बात करते हैं डीएम की। जिस तरह प्रधानमंत्री अफसरशाहों के एक कार्यबल के सहारे कोविड से राष्ट्रीय लड़ाई लड़ रहे हैं उसी तरह मुख्यमंत्री अपने राज्यों में यह लड़ाई लड़ रहे हैं। केंद्र में स्थिति यह है कि स्वास्थ्य, गृह, कृषि और श्रम मंत्रियों ने कभी सामने आकर देश को संबोधित करने की जरूरत नहीं समझी। सांसद अप्रासंगिक हो चुके हैं, राज्यों के मंत्रिमंडल और विधायकों का भी यही हाल है।

इसका असर जमीन पर पड़ रहा है। आदेश जारी करने का काम ऐसे लोग कर रहे हैं जिन्हें  जमीनी हकीकत के बारे में कुछ नहीं पता है। यही कारण है कि बार-बार सुधार और स्पष्टीकरण जारी करने पड़ रहे हैं। यदि इस बड़े सरकारी ढांचे में किसी ने यह आशा नहीं की थी कि महज चार घंटे में लॉकडाउन लगाने से श्रमिकों और प्रवासियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन के दौरान किस तरह की दिक्कतें आएंगी तो इसका मतलब यह है कि फैसले लेने वाले आम जनता की परिस्थितियों से बिल्कुल कटे हुए थे। इसके साथ ही इन श्रमिकों को काम देने वाले राज्य मसलन महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, पंजाब दिल्ली और मजदूरों के गृह राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड आदि भी इस बारे में अनुमान नहीं लगा सके। ऐसा तभी हो सकता है जब राजनीतिक नेतृत्व अपना दायित्व पूरी तरह भूल चुका हो या डीएम जैसों के हवाले कर चुका हो। लॉकडाउन के पहले चरण के बाद मामला हाथ से निकलने लगा तो कौन शिकार बना? गुजरात और महाराष्ट्र ने अपनी राजधानियों के नगर निकाय के प्रमुख आईएएस अधिकारियों को हटाया। शायद इसलिए क्योंकि वे बहुत अधिक जांच कर रहे थे। बिहार में भी स्वास्थ्य सचिव को बदल दिया गया और मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सचिव और आयुक्त को। महामारी से निपटने के इस तरीके की कमियां भी अब नजर आने लगी हैं।

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