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सीमित प्रभाव

संपादकीय /  May 24, 2020

गत सप्ताह एक और नीतिगत बैठक में भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत रीपो दर में 40 आधार अंकों की कटौती कर इसे 4 प्रतिशत कर दिया। दरों में कटौती खस्ता होती आर्थिक स्थिति को देखते हुए की गई। आरबीआई के आकलन के मुताबिक मांग और आपूर्ति को लगे झटके के बाद चालू वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधियां धीमी बनी रहेंगी। आशा की जा रही है कि दूसरी छमाही में आर्थिक स्थिति में सुधार होगा परंतु फिर भी मौजूदा अनिश्चितताओं को देखते हुए आरबीआई को यही लग रहा है कि चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर ऋणात्मक बनी रहेगी। दूसरी ओर केंद्रीय बैंक को लग रहा है कि शीर्ष मुद्रास्फीति की दर पहली छमाही में मजबूत बनी रहेगी और दूसरी छमाही में उसमें कुछ शिथिलता आएगी। फिलहाल वृद्धि और मुद्रास्फीति दोनों के पूर्वानुमान काफी अनिश्चित हैं। उच्च तीव्रता वाले संकेतक यह बताते हैं कि लॉकडाउन ने देश में उत्पादन को किस हद तक नुकसान पहुंचाया है। आरबीआई ने सक्रियता दिखाकर अच्छा किया है लेकिन अभी यह देखना होगा कि दरों में कटौती से अर्थव्यवस्था को कितनी मदद मिलती है।

हाल के दिनों में दरों में कटौती जरूर की गई है लेकिन वह फिलहाल आर्थिक गतिविधियों में नई जान फूंकने में कामयाब नहीं रही है। उदाहरण के लिए आरबीआई का ताजा आंकड़ा बताता है कि कुल बकाया गैर खाद्य ऋण वित्त वर्ष के आरंभ से 8 मई तक 1.36 लाख करोड़ रुपये घट गया। यानी मार्च में 75 आधार अंकों की कटौती के कारण बैंकिंग से लिए जाने वाले ऋण में कोई इजाफा नहीं हुआ। कुल बकाया ऋण में कमी के लिए मांग और आपूर्ति दोनों क्षेत्रों से वजह हो सकती है। संभव है कि कंपनियां और अधिक कर्ज लेने की इच्छुक नहीं हों क्योंकि आर्थिक अनिश्चितता बरकरार है। बहरहाल, यह भी संभव है कि बैंक ही ऋण देने के इच्छुक नहीं हों क्योंकि समग्र मांग कमजोर रहने और ऋण के तीन माह के स्थगन की अवधि समाप्त होने के बाद फंसे हुए कर्ज में इजाफा हो सकता है। यदि अर्थव्यवस्था में गिरावट आती है तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि ऋण लेने वाले पर्याप्त राजस्व जुटा पाएंगे और चालू वर्ष में अपना बकाया चुकाने लायक परिचालन मुनाफा कमा पाएंगे।

ऐसे में काफी संभव है कि दरों में एक बार फिर कटौती के बावजूद वास्तविक ऋण में इजाफा न हो। खासतौर पर ऐसे समय में जबकि सरकार इसे लेकर बैंकिंग तंत्र से काफी अपेक्षाएं कर रही है। भारतीय बैंक, खासतौर पर सरकारी बैंक कोविड-19 के प्रसार से पहले भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं थे। आर्थिक गतिविधियों में नई जान फूंकने और लक्षित ऋण का बोझ बैंकों की मुसीबत बढ़ा सकता है।

इतना ही नहीं यह भी संभव है कि बैंकिंग नियामक कर्ज के एकबारगी पुनर्गठन की बात कहे। ऐसा तब हो सकता है जबकि कर्जदारों को लगे कि कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उनको कर्ज चुकाने में दिक्कत हो रही है। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के एक वर्ष के लिए निलंबित होने से भी कर्जदारों की स्थिति कमजोर पड़ सकती है। इस संहिता के आगमन से कर्जदारों को लाभ हुआ था और कंपनी प्रवर्तकों को यह आशंका होने लगी थी कि बड़े मामलों के निपटान में वे कंपनी पर से नियंत्रण भी गंवा सकते हैं। ऐसे में सरकार के लिए नियम बनाने में सावधानी बरतना जरूरी है ताकि संहिता अप्रासंगिक न हो जाए। इसके एक वर्ष के निलंबन की भी समीक्षा होनी चाहिए। फिलहाल कई ऐसी बातें हैं जो मौद्रिक कदम के असर को सीमित कर सकती हैं। नीतिगत मोर्चे पर मुद्रास्फीति से जुड़ी अनिश्चितता भी इसके असर को सीमित करेगी। व्यापक स्तर पर देखें तो वास्तविक असर वायरस को नियंत्रित करने और अर्थव्यवस्था को खोलने की हमारी प्रशासनिक क्षमता पर निर्भर करेगा।

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