बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोना संकट में रुपहले पर्दे के हिस्से के लिए छिड़ी जंग
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कोरोना संकट में रुपहले पर्दे के हिस्से के लिए छिड़ी जंग

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  May 22, 2020

सत्तर के दशक में किसी भी शनिवार को कोहली परिवार अपनी फिएट कार में सवार होकर बांद्रा ईस्ट के एक सिनेमाघर जाता था। मुंबई में आज उसी जगह पर बांद्रा-कुर्ला परिसर बना हुआ है। हम शाम सात बजे के शो के टिकट खरीदते थे, अपनी कार एक छोटे स्टैंड में खड़ी करते थे और कार के दरवाजे से टिककर खड़े हो जाते थे। कुछ परिवार तो अपनी कार के भीतर ही बैठे रहते थे जबकि कुछ परिवार फोल्डिंग कुर्सियों पर या जमीन पर बिछी दरी पर बैठकर अंखियों के झरोखे से (1978) या काला पत्थर (1979) जैसी फिल्में देखा करते थे। मैं तो उस समय काफी छोटी थी लिहाजा फिल्मों के नाम भी याद नहीं हैं।

लेकिन ये पुरानी यादें मुझे इस हफ्ते फिर से दस्तक देने आ पहुंचीं। इसकी वजह यह है कि अमेरिका, जर्मनी और अन्य विकसित देशों के कई कस्बों में लोग एक बार फिर से ऐसे ड्राइव-इन थिएटरों का रुख करने लगे हैं। इस तरह लोग लंबे समय तक घरों में कैद रहने के बाद फिल्में देखने के साथ ही शारीरिक दूरी बरतने के नियमों का पालन भी कर रहे हैं। अमेरिका में मौजूद करीब 300 ड्राइव-इन सिनेमाघरों में से सारे ही पूरी क्षमता से चल रहे हैं और पूरे हफ्ते के लिए बुक हो चुके हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि नेटफ्लिक्स का अपना घर होने के साथ ही अमेरिका में इंटरनेट की रफ्तार भी बहुत तेज है और एक मजबूत टेलीविजन बाजार भी है। फिर भी लोग घर से बाहर निकलकर मनोरंजन को लालायित हैं। भारत के मल्टीप्लेक्स ऑपरेटरों और फिल्म स्टूडियो को भी टिकट खरीदारों की राह देखते समय इस पहलू पर नजर रखनी चाहिए।

पिछले हफ्ते जब यह ऐलान हुआ कि सुजित सरकार की फिल्म गुलाबो सिताबो और अनु मेनन की फिल्म शकुंतला देवी को एमेजॉन प्राइम वीडियो पर ऑनलाइन रिलीज किया जाएगा तो काफी हंगामा हुआ। आइनॉक्स लेजर ने इसके खिलाफ तल्ख टिप्पणी करते हुए एक बयान जारी कर दिया। पीवीआर सिनेमाज ने इसे निराशाजनक बताया तो प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपनी मुश्किल स्थिति बयां करते हुए हालात को समझने की अपील की। आप इनमें से किसी को भी गलत नहीं ठहरा सकते हैं।

भारत में लॉकडाउन लागू होने के पहले से ही फिल्मों का प्रदर्शन ठप पड़ा हुआ है। फिल्मों के निर्माता एवं स्टूडियो फिल्म बनाने के लिए फंड जुटाते हैं लेकिन पिछले दो महीने से फिल्में प्रदर्शित न होने से न केवल पूरी बन चुकी फिल्मों का प्रदर्शन नहीं हो पा रहा है बल्कि ब्याज एवं कर्मचारियों पर होने वाला व्यय भी बढ़ता जा रहा है। कुछ निर्माता तो हालात बदलने का इंतजार कर रहे हैं लेकिन बाकी लोगों का संयम जवाब दे रहा है। यह समर्पण असामान्य हालात के चलते पैदा हुई विसंगति के कारण है और तीन कारणों से यह देर तक नहीं चलेगा। एक, सिनेमाघरों में फिल्म का प्रदर्शन होने पर राजस्व मिलने के साथ ही ऐसा विस्तारण भी होता है जो किसी अन्य फॉर्मेट में संभव नहीं है। वर्ष 2019 में भारतीय फिल्मों की कुल 19,100 करोड़ रुपये की कमाई में 60 फीसदी योगदान सिनेमाघरों का ही था। एक फिल्म को सिनेमाघरों में मिलने वाला प्यार राजस्व संग्रह के अन्य माध्यमों- टीवी, ओटीटी और विदेश कारोबार की कीमत को भी प्रभावित करता है।

मसलन, भारत में टीवी दर्शकों की कुल संख्या का करीब चौथाई हिस्सा फिल्मों का है और यह दूसरा सबसे लोकप्रिय मनोरंजन माध्यम है। वर्ष 2019 में प्रसारकों ने 2,200 करोड़ रुपये का भुगतान कर फिल्मों के अधिकार खरीदे और मनोरंजन उद्योग राजस्व में 12 फीसदी अंशदान किया। यह रकम प्रसारण नेटवर्क के लिए 7,700 करोड़ रुपये के अनुमानित विज्ञापन राजस्व का हिस्सा बनी। अगर एक फिल्म किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पहले प्रदर्शित होती है तो उसके विज्ञापन राजस्व संग्रह की संभावना कम हो जाती है। फिर वे इसके लिए इस तरह का पैसा क्यों देंगे? आप यह दलील दे सकते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म इसकी भरपाई कर सकते हैं। यह दूसरी वजह है इसके महज एक विसंगति होने की। एक फॉर्मेट के तौर पर ओटीटी फिल्म उद्योग के राजस्व का 10 फीसदी लेकर आया। यह इससे भी थोड़ा आगे जा सकता था लेकिन यह किसी फिल्म के प्रदर्शन से जुड़ी पूरी शृंखला का विकल्प नहीं बन सकता है जिसमें सिनेमाघर, विदेश में रिलीज, टीवी और ओटीटी जैसे मंच शामिल होते हैं।

तीसरा, 2015 से लेकर 2018 तक सिनेमाघरों में आने वाले दर्शकों की संख्या और टिकट बिक्री या तो स्थिर रही या उसमें गिरावट देखी गई। पिछले साल जब ओटीटी दर्शक संख्या में जबरदस्त उछाल आई, फिल्म टिकट बिक्री भी रिकॉर्ड एक अरब के पार पहुंच गई। फिल्म कारोबार के रचनात्मक कायापलट की वजह से यह वृद्धि लगातार ऊपर ही रही। लेकिन मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं के लिए यह साल बेहतरीन रहने के बजाय उनके लिए कोई कमाई न होने से किराये एवं वेतन का इंतजाम कर पाना भारी पड़ रहा है। ऐसे में पुनर्वितरण की चर्चा गुस्से की उपज बनती दिख रही है। इसका यह मतलब नहीं है कि सिनेमाघर कारोबार धराशायी हो चुका है या फिर फिल्में ओटीटी पर ही पहले रिलीज हुआ करेंगी। किसी भी नए फॉर्मेट के लोकप्रिय होने पर ऐसी स्थिति पैदा होती है। टीवी से फिल्मों के खत्म होने, इंटरनेट से सबकुछ खत्म होने की बातें कही गईं। लेकिन सभी फॉर्मेट बने रहे। कोई भी फिल्म एक बार में ही कमाई नहीं करती है, यह एक साल, पांच साल या फिर दशकों बाद भी कमाई करती है जैसे कि दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे या फिर शोले। यह तमाम फॉर्मेट, क्षेत्रों एवं दर्शकों से इतर की पारिस्थितिकी का अंग है। निर्माता या स्टूडियो और सिनेमाघरों के मालिक इस पारिस्थितिकी का अहम हिस्सा हैं। उनकी अंतर्निर्भरता इतनी अधिक है कि कम अवधि की नकदी के लिए जोखिम नहीं ले सकते हैं। अमेरिका में हो रही घटनाओं पर गौर करें तो कई स्टूडियो छोटे बजट की फिल्मों को ऑनलाइन रिलीज कर रहे हैं और बड़ी फिल्मों का प्रदर्शन टाल रहे हैं। उन्हें बखूबी पता है कि मोटी कमाई सिनेमाघर खुलने पर ही होगी।

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