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पिता से कामयाब पुत्र

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  05 22, 2020

एक वक्त था जब कहा जाता था कि जो जनरल मोटर्स के लिए बेहतर है वही अमेरिका के लिए भी बेहतर है। भारत में इससे मिलती जुलती टिप्पणी यह थी (हालांकि उतनी सच्ची नहीं) कि जो बिड़ला बंधुओं के लिए अच्छा है वही देश के लिए अच्छा है। यह बीते जमाने की बात हो गई। जनरल मोटर्स अब अमेरिका से अधिक कारें चीन में बेचती है और बिड़ला समूह का पराभव हो चुका है। उसकी जगह मुकेश अंबानी ने ले ली है।

मुकेश अंबानी ने पिछले महीने जो सौदे किए  वे दुनिया भर में सुर्खियों में हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज की अनुषंगी जियो प्लेटफॉम्र्स में हिस्सेदारी बेचकर उन्होंने 78,500 करोड़ रुपये  से अधिक की राशि जुटाई। सबसे नए सौदे के बाद इस डिजिटल कंपनी का मूल्यांकन 6,500 करोड़ डॉलर हो चुका है। इस बीच मूल कंपनी रिलांयस ने राइट्स इश्यू जारी किया जो तुलनात्मक रूप से छोटा लग सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा है। उससे 53,000 करोड़ रुपये की राशि जुटेगी। शेयर बिक्री के अन्य सौदे भी अलग-अलग चरण में हैं। दूरसंचार टावर कारोबार से 25,000 करोड़ रुपये और पेट्रोलियम विपणन में 49 फीसदी हिस्सेदारी ब्रिटिश पेट्रोलियम को बेचने से हासिल 7,000 करोड़ रुपये शामिल हैं। यदि तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार में सऊदी अरामको को 20 फीसदी हिस्सेदारी 1,500 करोड़ डॉलर बेचने का सौदा टूट भी जाता है तो भी यह किसी भारतीय कारोबारी द्वारा सबसे अधिक नकदी जुटाने का मामला होगा। मुकेश 2,000 करोड़ डॉलर की राशि जुटाने और विशुद्ध कर्ज पूरी तरह खत्म करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। दूरसंचार और भविष्य के संबद्ध डिजिटल कारोबार में 4,000 करोड़ डॉलर के निवेश के बावजूद उनके पास नकदी अधिशेष रह सकती है। बाजार में रिलायंस का कुल मूल्यांकन करीब 10 लाख करोड़ रुपये यानी 12,700 करोड़ डॉलर है।

कई लोग मानते थे कि दूरसंचार जैसे पहले से प्रतिस्पर्धी बाजार में इतना बड़ा निवेश उचित प्रतिफल नहीं दिला पाएगा। परंतु भविष्य को लेकर मुकेश अंबानी का अनुमान, उनकी क्रियान्वयन क्षमता और अब सौदे करने की उनकी दक्षता ने मुझ समेत तमाम शंकालुओं को गलत साबित कर दिया। मार्क जुकरबर्ग के ई-कॉमर्स साझेदार बनने के बाद कह सकते हैं कि वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट और अलीबाबा से मुकाबले का खेल तो अब शुरू हुआ है।

मुकेश ने अपने विशालकाय कारोबार का काफी विस्तार किया है और उसकी नए सिरे से परिकल्पना भी की है। कारोबारी इतिहास में ऐसे उदाहरण विरल हैं। मुकेश के पिता और रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी ने कंपनी की शुरुआत सन 1970 के दशक में सिंथेटिक टेक्सटाइल से की थी। जब उन्होंने मुकेश को स्टैनफर्ड से बुलाया और पातालगंगा और हजीरा में पेट्रोकेमिकल कारोबार विस्तार के साथ अपना काम संभालने में मदद मांगी तब तक कंपनी बदलाव का एक चक्र पूरा कर चुकी थी। इसके बाद एक शानदार तकनीकी उन्नयन वाले कदम में कंपनी ने दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल रिफाइनरी बनाई जो सबसे खराब गुणवत्ता वाले कच्चे तेल के माध्यम से भी बेहतरीन परिणाम हासिल करने में सक्षम है।

तमाम व्यापक कौशल के बावजूद कारोबार हमेशा अनुकूल सरकारी नीतियों पर निर्भर रहा। बेटे ने एक बार अपने पिता का दृष्टांत याद किया था जहां एक परिवार को खुद भोजन करने के पहले पंडित, गाय, पालतू कुत्ते और एक कौवे को भोजन कराना होता था। पीवीसी या पॉलिएस्टर फाइबर जैसे जिंस उत्पाद के लिए यह बात सही है जहां कर, शुल्क दर, लाइसेंस आदि को लेकर सरकार के निर्णय कारोबार को प्रभावित करते हैं। धीरूभाई इस मामले में हमेशा कामयाब रहे। एक पुराना चुटकुला याद कीजिए: विमान यात्रा के दौरान एक अरब एयर इंडिया की विमान परिचारिका को खरीदना चाहता है। उससे कहा जाता है कि वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि परिचारिका एयर इंडिया की है। वह एयर इंडिया को खरीदने की बात कहता है। उसे बताया जाता है कि एयर इंडिया सरकारी कंपनी है, वह उसे नहीं खरीद सकता। अब वह सरकार को खरीदने में रुचि दिखाता है। तब उसे बताया जाता है कि वह तो पहले ही धीरूभाई के हाथों बिक चुकी है।

ब्रांड और तकनीक कारोबार में सरकार की महत्ता नहीं है, हालांकि अनुकूल नीतियों से यहां भी मदद मिलती है। यही कारण है कि मुकेश अपनी कंपनी को नए सिरे से स्थापित कर रहे हैं। खुदरा कारोबार में आने का उनका पहला प्रयास गड़बड़ रहा और दूरसंचार बाजार में आने की शुरुआती कोशिश भी मार्केटिंग की दृष्टि से नाकाम रही। हालांकि वह कारोबार छोटे भाई अनिल को सौंप दिया गया। आज हमारे सामने जियो है जिसके 38.5 करोड़ ग्राहक हैं। रिलायंस जो कभी साड़ी बनाती थी, उसने खुद को नए सिरे से तलाशा है। धीरूभाई के पास सरकार थी या नहीं पता नहीं लेकिन उनका बेटा बाजार पर आधिपत्य जरूर चाहता है।

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