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आईबीसी निलंबित करने के नुकसान पर उद्योगों ने चेताया

रुचिका चित्रवंशी / नई दिल्ली May 21, 2020

बुनियादी ढांचा परियोजना में निवेश करने वाले एक पेंशन फंड को कोविड-19 के कारण गंभीर दबाव झेलना पड़ रहा है। वह जानकारी जुटा रहा है कि वह अपने कर्ज पर चूक कैसे करे, क्योंकि दिवाला प्रक्रिया खत्म होने के बाद उसे यह विकल्प ज्यादा व्यावहारिक लग रहा है। सरकार ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) एक साल तक निलंबित करने का फैसला किया है। ऐसे में तमाम को यह लगता है कि कर्जदाताओं की ओर से प्रवर्तकों को मिलने वाली धमकी भी खत्म हो गई है और सरकार द्वारा पेश एक अहम काून न होने की वजह से अप्रत्याशित नतीजे हो सकते हैं।

ईवाई में पार्टनर दिनकर वेंकटसुब्रमण्यन ने कहा, 'इस समय यह बहुत जरूरी है कि कंपनियों को कोविड-19 के बाद कारोबार पटरी पर लाने के लिए दिवाला के भय से मुक्त किया जाए। हालांकि अच्छा यह होता कि धारा 10 (जिसमें प्रवर्तक दिवाला प्रक्रिया चुन सकते हैं) को जारी रखा जाता और कंपनियों को समाधान व्यवस्था के ररूप में आईबीसी के इस्तेमाल में सक्षम बनाए रखा जाता।'

आईबीसी कभी वसूली का साधन नहीं रहा है, लेकिन प्रवर्तकों व प्रबंधन को कंपनी खोने का डर दिमाग में होता है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में बकाये का समाधान होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि निलंबन की वजह से बैंक और कर्जदाताओं को बकाया वसूली के लिए वित्तीय संपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण प्रतिभूति ब्याज के प्रवर्तन (सरफेसी) अधिनियम की ओर जाना पड़ेगा।

शार्दूल अमरचंद मंगलदास ऐंड कंपनी में पार्टनर वीणा शिवरामकृष्णन ने कहा, 'समाधान का विकल्प न होने पर वसूली के दरवाजे स्वत: खुल जाएंगे और इसका व्यापक असर हो सकता है। आईबीसी के बाहर समाधान का एक बाध्यकारी ढांचे को भारत के बाजार में बहुत कम सफलता मिली है।' निजी पार्टियां और ऑपरेशनल क्रेडिटर विशेष प्रदर्शन, समरी सूट, सिविल रिकवरी, आर्बिट्रेशन, कर्ज के पुनर्गठन जैसे वैकल्पिक समाधान पर ध्यान देंगे और आईबीसी का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में होगा।

कॉपोरेट प्रोफेशनल्स के पार्टनर मनोज कुमार ने कहा, 'कुछ समय के लिए बैंक भी सुस्ती दिखाएंगे, क्योंकि सरकार का इरादा साफ है। अब तक वैकल्पिक व्यवस्थाएं बहुत प्रभावी नहीं रही हैं और इसमें समय लगता है। लेकिन अगर इस अवधि के दौरान इसका काम बेहतर रहता है तो फिर से शुरू होने के बाद भी आईबीसी की भूमिका सीमित रह जाएगी।'

इस मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा कि तमाम निजी इक्विटी फंड, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां अपने पोर्टफोलियो का मूल्यांकन कर रही हैं, जिससे समस्या वाले क्षेत्र को चिह्नित किया जा सके और उसके बाद प्रवर्तकों से नए सिरे से बात की जा सके।

एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा, 'प्रवर्तक संचालित विदेशी ढांचों को अपनाया जा सकता है क्योंकि भारत में बहुत ज्यादा अनिश्चितता है। विदेशी निवेशकों को लगता है कि कानून में लगातार बदलाव किया जा रहा है और न्यायालयों द्वारा दिए गए फैसले अनिश्चितता को और बढ़ा रहे हैं।'

उद्योग के एक और विशेषज्ञ ने कहा, 'ऐसे भी उदाहरण हैं, जब कोविड संकट शुरू होने के ठीक पहले कर्जदाता दिवाला प्रक्रिया नहीं शुरू कर पाए। ऐसे मामलों में स्थिति साफ नहीं है कि क्या होगा। कर्जदाताओं को सि फैसले से नुकसान उठाना होगा।'

Keyword: IBC, Insolvency, Bankruptcy, Default, आईबीसी, ऋणशोधन अक्षमता, दिवालिया संहिता, डिफॉल्ट, बुनियादी ढांचा परियोजना,
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