बिजनेस स्टैंडर्ड - खुली पेशकश अस्वीकार करने के लिए आवश्यक ढांचा जरूरी
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खुली पेशकश अस्वीकार करने के लिए आवश्यक ढांचा जरूरी

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  May 21, 2020

पूंजी के दुर्लभ होते जाने और सूचीबद्ध कंपनियों के मंदी के रुझानों से दो-चार होने के बीच विलय और अधिग्रहण ही वह रास्ता है जिसके जरिये कारोबार को मजबूत करके बाजार में बना रहा जा सकता है। जिन कंपनियों को फंड की आवश्यकता है, उनका अधिग्रहण हो सकता है। अगर किसी कंपनी को फंड जुटाने की आवश्यकता नहीं है तो भी उसे परिचालन बरकरार रखने के लिए स्वामित्व में बदलाव करना पड़ सकता है।

जहां तक सूचीबद्ध कंपनियों की बात है, उनके लिए वह नियम आकर्षक होगा जिसके तहत अंशधारकों से शेयर खरीदने के लिए खुली पेशकश की जा सकती है। इसके लिए और अधिक पूंजी की आवश्यकता होगी। इसके चलते किसी सूचीबद्ध कंपनी को बचाने की योजना मुश्किल नजर आ सकती है और इसे खरीदने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति दूरी बना सकता है। बचाव पैकेज नहीं मिलने से कंपनी नाकाम हो सकती है। ऐसे में अंशधारक और अधिक परेशान होंगे।

इस समस्या का एक सहज समाधान है। अंशधारकों को खुली पेशकश एक अहम सांविधिक अधिकार है जिसे छीना नहीं जाना चाहिए। इसके बावजूद अगर यह महंगा प्रस्ताव प्रतीत होता है और कंपनी बिना अधिग्रहण के भी विफल हो सकती है। इस समस्या का हल इस बात में निहित है कि अंशधारकों को नियामक के भरोसे रहने देने के बजाय खुद विकल्प चुनने दिया जाए। संभव है अंशधारक कंपनी को बचाये जाने को प्राथमिकता दें और खुली पेशकश के लिए अपने अधिकार त्याग दें। हमें उन्हें एक ढांचा मुहैया कराना होगा जहां वे अपने अधिकार त्यागने के अधिकार का प्रयोग कर सकें।

कई अंशधारकों का निर्णय प्रतिभूति नियमन के अधीन एक विशेष बहुमत रखता है। ऐसे में अंशधारकों द्वारा खुली पेशकश के समक्ष समर्पण के सकारात्मक मत के लिए कहीं अधिक ऊंची सीमा पर भी विचार किया जा सकता है। बाजार प्रतिभागी संवेदनशील होते हैं और गैर पितृ सुलभ रुख अपनाने से कहीं अधिक व्यापक लक्ष्य हासिल हो सकते हैं। उदाहरण के लिए खुली पेशकश के समक्ष अपने सांविधिक अधिकार की रक्षा करते हुए भी सूचीबद्ध कंपनियों के व्यापक हित में वे अपने अधिकार सौंप सकते हैं। बदले में उन्हें बाजार में उच्च शेयर मूल्य के रूप में इसका प्रतिफल मिल सकता है। वे जब भी कारोबार से बाहर होना चाहें, बाजार में अपने शेयर बेच सकते हैं और बचाव पैकेज से लाभान्वित कंपनी के शेयर कीमतों में सुधार से लाभान्वित हो सकते हैं।

खुली पेशकश के त्याग के लिए नियंत्रक अंशधारकों के अलावा अंशधारकों में से तीन चौथाई की मंजूरी की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कुल शेयरों के लगभग 90 फीसदी की आवश्यकता होती है। यदि नियंत्रक अंशधारक की हिस्सेदारी कम होती है और वह अंशधारक बना रहता है तब कहा जा सकता है कि वे भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं और उन्हें निजी तौर पर अधिग्रहण से कुछ नहीं हासिल हो रहा। यदि अंशधारक खुली पेशकश त्याग दें, तो लेनदेन बिना खुली पेशकश के हो सकता है और यदि अंशधारक इसे त्यागने से इनकार कर दें तो लेनदेन या तो पूरी तरह समाप्त हो जाएगी या फिर उसे अंशधाकों को खुली पेशकश के साथ ही पूरा किया जाएगा।

अवधारणा के स्तर पर देखें तो कानूनी अधिकार रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार को त्यागने या उसके साथ बने रहने का निर्णय कर सकता है। अधिकार से जुड़े किसी भी मुद्दे पर पात्रता का निर्धारण इसी प्रकार होता है।

इस तरह शेयर से हासिल होने वाले लाभ को बिना वोटिंग अधिकार के पार्टिसिपेटरी नोट में बेचा जा सकता है। इसी तरह शेयर वोटिंग अधिकार या संपत्ति अधिकार को पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से बेचा जा सकता है। जब भी बात खुली पेशकश की आती है जहां व्यापक अंशधारक उसका लाभ ले सकते हैं, वहां नियमन में एक विधायी ढांचा आवश्यक है ताकि ऐसे मानक तय किए जा सकें जहां पूरी गतिविधि निष्पक्ष और साफ-सुथरी साबित हो।

एक अनुभवजनित अध्ययन यही बताएगा कि अधिकांश खुली पेशकश पर आने वाली प्रतिक्रिया अकादमिक होती है। अंशधारक बाजार में बिक्री करके प्रसन्न होते हैं और खुली पेशकश के लिए प्रतीक्षा करने और कई सप्ताह बाद फंड पाने के बजाय उन्हें दो दिन में तत्काल पैसा पाना अच्छा लगता है। जब तक अप्रत्यक्ष रूप से अधिग्रहीत कंपनी के शेयरों के उचित मूल्य को लेकर विवाद के कारण मूल्य में अंतर का कोई बड़ा लाभ सामने नहीं हो तब तक खुली पेशकश विशुद्ध अकादमिक बात है।

पूंजी बाजार नियामक को बीते तीन वर्ष के दौरान की गई खुली पेशकश को लेकर एक अध्ययन करना चाहिए और यह ध्यान में रखना चाहिए कि अगले एक या दो वर्ष में नाकाम होने के कगार पर खड़े विभिन्न उपक्रमों को उबारने के क्रम में अधिग्रहण और नियंत्रण हासिल करना एक अहम गतिविधि होगी। खुली पेशकश से सामूहिक रूप से बाहर रहने की सुविधा देने वाला ढांचा जरूरी तेजी प्रदान कर सकता है। श्रम कानूनों जैसे जो कानून वंचितों की रक्षा के लिए बने हैं उनमें सांविधिक अधिकारों के हनन के खिलाफ प्रावधान पहले से ही मौजूद रहते हैं। उन अधिकारों को भी अब निलंबित किया जा रहा है। बहरहाल उसके लिए अलग से स्तंभ लिखना होगा। फिलहाल तो वक्त का तकाजा यही है कि अंशधारकों को किसी अधिग्रहणकर्ता की खुली पेशकश से बचाने वाला ढांचा तैयार किया जाए।

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