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चीन की डिजिटल करेंसी एक उदाहरण पेश करती

श्याम सरन /  May 21, 2020

दिसंबर 2019 में अपने इसी स्तंभ में प्रकाशित आलेख में मैंने कहा था कि चीन ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित सॉवरिन डिजिटल करेंसी जारी करने की ओर प्रयासरत है। हालांकि उस वक्त इस बारे में विस्तृत ब्योरा नहीं था। अब इस मुद्रा की शुरुआत करीब नजर आ रही है। हेबेई प्रांत में पेइचिंग और थ्यानचिन (शेंझेन) के बीच श्याओनगन न्यू एरिया और चेंगदू (सिचुआन) में सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) के रूप में डिजिटल युआन अब प्रायोगिक तौर पर चलन में है।

समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक चीन के केंद्रीय बैंक ने निजी कंपनियों के साथ मिलकर सॉवरिन डिजिटल करेंसी के बुनियादी कामकाज का विकास कर लिया है और अब उसके प्रचलन के लिए जरूरी कानून बनाए जा रहे हैं। इसमें शामिल निजी कंपनियों के नाम हैं अलीबाबा, टेनसेंट, हुआवेई और चाइना मर्चेंट्स बैंक।

सीबीडीसी ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित है। बिटकॉइन और टीथर जैसी क्रिप्टो करेंसी भी इसका इस्तेमाल करती हैं लेकिन इनके बीच कोई तुलना नहीं है। क्रिप्टो करेंसी को जारी करने का काम विकेंद्रीकृत होता है। यह एक वितरित लेजर प्रणाली के जरिये काम करती है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। इसका संचालन एक अल्गोरिदम द्वारा होता है। क्रिप्टो करेंसी का मूल्य निर्धारण मांग और आपूर्ति पर आधारित होता है। इस व्यवस्था को भारी भरकम डेटा बैंकों की आवश्यकता होती है जो काफी ऊर्जा खपत वाले होते हैं। यह बात ध्यान देने लायक है कि भले ही चीन ने क्रिप्टो करेंसी एक्सचेंजों पर प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन इनमें से 70 फीसदी चीन में तैयार होती हैं क्योंकि वहां परिचालन लागत कम है।

सीबीडीसी के मामले में मूल्य निर्धारण का जरिया राज्य है। वही इस डिजिटल मुद्रा को कागजी मुद्रा की तरह तमाम बैंकिंग और मौद्रिक तंत्र में वितरित करेगा। ब्लॉकचेन तकनीक का इस्तेमाल जहां लेजर सिस्टम के रूप में किया जाता है, वहीं यहां नियंत्रण सरकार के हाथ में है। पायलट केंद्रों से सूचना की छंटनी करने से लेकर हर उपयोगकर्ता के व्यक्तिगत डिजिटल डिवाइस पर एक क्रिप्टो वॉलेट होगा जिसमें डिजिटल करेंसी स्थानांतरित की जाएगी। वह फंड का इस्तेमाल उन वॉलेट के लिए कर सकेगा जो उसे भुगतान ऐप (मसलन अलीबाबा का एंट फाइनैंशियल) मुहैया कराते हैं या फिर वह उनका इस्तेमाल प्रत्यक्ष नकदी की तरह भी कर सकता है।

इन जमा में मौजूदा मुद्राओं की तस्वीरें भी शामिल हैं। खुदरा क्षेत्र में मैकडॉनल्ड्स, सबवे और स्टारबक्स जैसी अमेरिकी चेन इसके परीक्षण में शामिल हैं। चीन के अधिकांश उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव शायद ही ध्यान देने लायक होगा क्योंकि वहां 70 फीसदी से अधिक लेनदेन पहले ही डिजिटल हो चुके हैं। वाणिज्यिक व्यवस्था को भी सभी तरह के लेनदेन डिजिटल करने होंगे ताकि सरकार मौद्रिक स्थानांतरण की निगरानी कर सके और कर वंचना, धन शोधन और अन्य अवैध गतिविधियों का पता लगा सके। यह प्रचलित मुद्रा को लेकर भी अधिक सटीक और समयबद्ध जानकारी सुनिश्चित करेगा। इससे मौद्रिक नीति और मुद्रा बाजार परिचालन में सुधार होगा।

इन्हीं वजहों से दुनिया के 80 फीसदी से अधिक केंद्रीय बैंक चीन की राह पर चलने पर विचार कर रहे हैं। डिजिटल मुद्रा को अपनाने के पीछे अन्य लक्ष्य भी हैं। चीन इसे वित्तीय स्वायत्तता हासिल करने का जरिया बनाना चाहता है और अमेरिकी डॉलर को लेकर जोखिम कम करना चाहता है। उसका इरादा एक उन्नत डिजिटल माहौल तैयार करने का है जहां चीन की मुद्रा का इस्तेमाल दुनिया भर के रोजमर्रा के लेनदेन में हो। इसके लिए उसे सहज उपयोग वाला और लेनदेन की न्यूनतम लागत वाला रखना होगा। जहां भी इंटरनेट उपलब्ध हो, इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर एक बार ऐसा बुनियादी ढांचा बन गया तो अमेरिका और पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था के साथ-साथ उसके दबदबे वाले स्विफ्ट अंतरबैंक भुगतान प्रणाली तथा अन्य प्रणालियों को भी पछाड़ सकता है।

जो देश और संस्थान अमेरिकी प्रतिबंधों और निगरानी से त्रस्त हैं, उन्हें चीन का विकल्प खासतौर पर आकर्षक लग सकता है। समय के साथ डिजिटल युआन का कद मजबूत हो सकता है। माना जा रहा है कि डिजिटल युआन का ताजा बाह्य विस्तार चीन की बेल्ट और रोड पहल के साझेदार देशों तथा उभरते बाजारों में किया जा सकता है। चीन के बैंक 2013 से अब तक बेल्ट और रोड पहल में 820 परियोजनाओं को करीब 600 अरब डॉलर का कर्ज दे चुके हैं। इन देशों में चीन के 76 बैंक संचालित हैं। उभरते बाजारों के सीमापार ऋण में चीन के बैंकों की हिस्सेदारी 60 फीसदी से अधिक है।

कोविड-19 महामारी ने डिजिटल तकनीक को बढ़ावा दिया है और संकट समाप्त होने के बाद भी यह सिलसिला बरकरार रहेगा। सीबीडीसी की शुरुआत ने चीन को नए डिजिटल होते विश्व में बढ़त प्रदान की है। यह अन्य देशों के लिए नजीर बन सकती है। इसके साथ ही यह अधिक राष्ट्रीय नेतृत्व और आर्थिक गतिविधियों के नियमन के साथ भी जुड़ा रहेगा। चीन के डिजिटल रेनेसां फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक काओ यान का यह भी कहना है कि मौजूदा दौर जैसे संकट काल में सीबीडीसी प्रोत्साहन देने के मामले में क्वांटिटेटिव ईजिंग या ब्याज दरों में बदलाव की तुलना में अधिक सक्षम और किफायती साबित हो सकता है। इसके हस्तक्षेप अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त वास्तविक आंकड़ों पर आधारित होंगे। यह ताकतवर उपाय होगा लेकिन इसकी किफायत का परीक्षण अभी बाकी है।

अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि भारतीय रिजर्व बैंक तथा हमारी सरकार इन बड़े और अहम बदलावों को किस तरह देख परख रहे हैं। अगर सॉवरिन डिजिटल करेंसी से मौद्रिक नीति और आर्थिक नीति को किफायती बनाने में मदद मिलती है तो भारत को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। चीन के नेतृत्व वाला वैश्विक वित्तीय तंत्र जो शायद पश्चिम तंत्र के समंातर चले, उसका भारत के लिए क्या असर होगा इस पर ध्यान देना होगा। माना यही जाता है कि चूंकि चीन पूंजी नियंत्रण नहीं छोड़ेगा न ही वह पूर्ण परिवर्तनीयता और अस्थिरता को अपनाएगा, ऐसे में वह कभी अमेरिकी डॉलर का विकल्प नहीं बन सकेगा। डिजिटल करेंसी सॉवरिन नियंत्रण को न्यूनतम नुकसान के साथ मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण का बेहतरीन रास्ता साबित हो सकती है। चीन वैश्विक वित्तीय तंत्र में पहले से ही बड़ा खिलाड़ी है। उसके वित्तीय बाजार का आकार 45 लाख करोड़ डॉलर है। उसकी विदेशी बाजार परिसंपत्ति 4.2 लाख करोड़ डॉलर है जो 3 लाख करोड़ डॉलर के उसके विदेशी मुद्रा भंडार से भी अधिक है। इसके बॉन्ड और शेयर अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में शामिल हैं। ऐसे में डिजिटल मुद्रा लॉन्च करने में उसकी अग्रणी भूमिका उसे न केवल नेतृत्व प्रदान करती है बल्कि अगले कुछ समय तक तो उसके मुकाबले में भी कोई नहीं है।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के सीनियर फेलो हैं)

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