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श्रम कानूनों पर राज्यों के अध्यादेश के खिलाफ श्रम मंत्रालय

सोमेश झा / नई दिल्ली May 21, 2020

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय राज्य सरकारों की इस योजना के पक्ष में नहीं है कि राज्य में एक अध्यादेश लाकर ज्यादातर श्रम कानूनों को अस्थायी रूप से हटा दिया जाए। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने यह जानकारी दी। जब श्रम मंत्रालय के इस अधिकारी से उत्तर प्रदेश और गुजरात सरकार द्वारा प्रस्तावित अध्यादेश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'यह कदम उचित नहीं लगता है।'

अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने का आग्रह करते हुए कहा, 'कैसे एक अध्यादेश किसी राज्य में श्रम कानूनों को खत्म कर सकता है? यह केवल श्रम कानूनों का नहीं बल्कि श्रम अधिकारों का भी मुद्दा है। अगर औद्योगिक विवाद व्यवस्था को खत्म कर

दिया जाएगा तो किसे फायदा मिलेगा?'

अधिकारी ने कहा कि श्रम मंत्रालय इन अध्यादेशों पर अपनी उचित प्रतिक्रिया देने की तैयारी कर रहा है और इसे लेकर अंतिम फैसला अगले कुुछ दिनों में लिया जाएगा। उत्तर प्रदेश और गुजरात सरकार ने पिछले सप्ताह प्रारूप अध्यादेश राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा था। दोनों राज्य अपने-अपने राज्यपालों से इसकी मंजूरी पहले ही ले चुके हैं।

देश के संविधान में श्रम समवर्ती सूची का विषय है। राज्य इस विषय में अपने कानून बना सकते हैं मगर उन्हें केंद्रीय कानूनों में संशोधनों के लिए केंद्र की मंजूरी लेने की जरूरत होती है। राष्ट्रपति केंद्र सरकार से सलाह लेने के बाद इन अध्यादेशों पर अपना अंतिम फैसला लेंगे। श्रम एवं रोजगार सचिव हीरालाल समारिया ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के सवालों का जवाब नहीं दिया। उन्होंने इस संवाददाता से मंत्रालय के संयुक्त सचिव से संपर्क करने को कहा मगर उन्होंने बातचीत करने से इनकार कर दिया।

दोनों राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों से कंपनियों को छूट देने वाले इस अध्यादेश की जरूरत को तर्कसंगत ठहराया है। उन्होंने कहा है कि कोविड-19 का कारोबार एवं नौकरियों पर असर पड़ा है, इसलिए राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए श्रम कानूनों में रियायत देना जरूरी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि देशव्यापी लॉकडाउन से राज्य में श्रमिक वापस लौट आए हैं और उन्हें रोजगार देने की जरूरत होगी।

हालांकि इस अध्यादेश से औद्योगिक विवाद दायर करने या श्रम संगठन बनाने और छंटनी के समय मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार छिन जाएगा। इससे निरीक्षण की व्यवस्था भी बंद हो जाएगी। इसके अलावा उद्योगों को श्रम कल्याण उपायों का पालन भी नहीं करना होगा।

श्रम संगठनों के अलावा विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी और बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज जैसे उद्योगपतियों ने श्रम कानूनों को खत्म करने के कदम की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।                               

संविधान विशेषज्ञ और वकील गौतम भाटिया ने कहा, 'राष्ट्रपति मंत्री परिषद की सलाह लेंगे इसलिए इन अध्यादेशों पर फैसला लेने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलानी होगी। मंत्रिमंडल अपना औपचारिक फैसला राष्ट्रपति को बताएगा और अगर वह सहमत नहीं हुए तो वह इसे पुनर्विचार के लिए राज्यों को लौटा सकते हैं।'भाटिया ने वर्ष 2017 के उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए अध्यादेश को 'अवैध' बताया। अदालत के इस फैसले में कहा गया था कि अध्यादेश के रास्ते का इस्तेमाल केवल आपात स्थिति में किया जा सकता है और यह कानून का विकल्प नहीं हो सकता। भाटिया ने कहा, 'अध्यादेश के जरिये श्रम कानून में तत्काल बदलाव करने की कोई जरूरत नहीं है। राज्य सरकार विधान सभा के सत्र का इंतजार कर सकती है।' विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि अध्यादेश के जरिये केंद्रीय कानूनों को समाप्त करना विधायी शक्ति का दुरुपयोग है। श्रम कानूनों की वकील रमाप्रिया गोपालकृष्णन ने कहा, 'श्रम कानूनों को समाप्त करने के लिए अध्यादेश का इस्तेमाल करना और इस क्षेत्र में एक खालीपन पैदा करना भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त विधायी शक्तियों का दुरुपयोग है। राज्य संशोधन के लिए शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं मगर खालीपन नहीं पैदा कर सकते हैं।'

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