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प्लाज्मा जेट इंजन से क्या उत्सर्जन हो जाएगा शून्य!

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  May 19, 2020

कोविड महामारी की वजह से वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में भारी कमी आई है। इसके अलावा भी पर्यावरण पर कई अन्य सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। अगर उत्सर्जन में कटौती अधिक टिकाऊ हो जाती है तो यह एक अच्छा नतीजा होगा।

लॉकडाउन के दौरान यात्राओं पर पाबंदी लगी होने से परिवहन-संबंधी उत्सर्जन काफी नीचे आ गया है। इसकी वजह यह है कि विमानों, ट्रेनों एवं सार्वजनिक परिवहन के सारे साधन बंद पड़े हुए हैं। कामकाजी दफ्तरों और शिक्षण संस्थानों ने वर्क फ्रॉॅम होम और ऑनलाइन शिक्षण कार्यक्रमों की शुरुआत की है। ऑनलाइन संवाददाता सम्मेलन और वेबिनार आज के दौर का नया चलन हैं। इसके अलावा तमाम उद्योग बंद होने से बिजली की मांग भी कम हुई है। यात्रा, व्यापार एवं उद्योग में समय बीतने के साथ रौनक लौट आएगी। लेकिन वेबिनार और घर से काम करने की नई प्रवृत्ति शायद स्थायी बदलाव हो सकते हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर संवाददाता सम्मेलन करना कंपनियों के लिए एक बड़ी बचत का सबब बन सकता है और तकनीक ने इस बात को साबित भी किया है।

नागरिक उड़ानों का एक सामान्य वर्ष में होने वाले वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में करीब 2.5 फीसदी अंशदान होता है। अगर वाणिज्यिक उड़ानों की संख्या में कमी आती है तो फिर इस उत्सर्जन में भी गिरावट आएगी। जहाजों के परिचालन में नई स्वच्छ ईंधन तकनीक को अभी जनवरी 2020 में ही अपनाया गया है जिससे उत्सर्जन में कुछ कमी आएगी।

लंबे समय में विमानन संबंधी कार्बन उत्सर्जन को कम करने में एक और तकनीक काफी कारगर हो सकती है। केरोसिन या विमान ईंधन पर चलने वाले जेट इंजन। एक ऐसे जेट इंजन की कल्पना करें जो स्वच्छ स्रोत से पैदा हुई बिजली का इस्तेमाल करता है और उसे किसी भी तरह के जीवाश्म ईंधन की जरूरत नहीं है।

प्लाज्मा जेट इंजन की अवधारणा को लेकर काफी शोध कार्य हो रहे हैं और इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय कामयाबी भी मिली है। एक परंपरागत जेट इंजन ईंधन जलाता है और बेहद प्रदूषित गर्म हवा पैदा करता है। यह गर्म हवा उच्च दबाव पर एक ट्यूब से होकर गुजरती है और टर्बाइन से जाकर टकराती है। फिर टर्बाइन के पंखे तेजी से घूमने से ऊर्जा पैदा होती है और हवा विमान के पिछले हिस्से से बाहर निकल जाती है। न्यूटन के तीसरे सिद्धांत के मुताबिक हरेक क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है, लिहाजा पीछे की तरफ हवा का प्रवाह होने से विमान आगे की तरफ बढऩे लगता है।

अब जरा यह कल्पना करें कि हवा को गर्म करने के लिए ईंधन जलाने के बजाय सूक्ष्म तरंगें ही हवा में बिजली चार्ज के लिए निर्देशित करें। यह ऑयनीकरण की स्थिति पैदा करता है। गैसों से उनके इलेक्ट्रॉन छीन लिए जाते हैं और एक सकारात्मक चार्ज के साथ वह प्लाज्मा में बदल जाता है। एक विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र होने से प्लाज्मा तेजी से धक्का देता है और विमान को आगे बढऩे की ताकत मिलती है।

प्लाज्मा प्रक्षेपकों का इस्तेमाल अंतरिक्षयानों में हो चुका है। शुरुआती प्लाज्मा प्रक्षेपकों का इस्तेमाल 1960 के दशक में ही हुआ था। लेकिन ये प्रक्षेपक काफी कमजोर हैं और वायुमंडल में काम करने के लिए सक्षम नहीं हैं और उन्हें जेनॉन गैस के तौर पर अपना खुद का ईंधन लेकर जाना होगा। वर्ष 2018 में एमआईटी की एक शोध टीम ने प्लाज्मा ऊर्जा से लैस माइक्रोलाइट ग्लाइडर का प्रदर्शन कर यह दिखाया कि सापेक्षिक रूप से कमजोर धक्का होते हुए भी यह वायुमंडल में काम कर सकता है।

हाल ही में वुहान यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल साइंसेज द्वारा प्रकाशित एक शोध-पत्र में दावा किया गया है कि इंजीनियरों के एक दल ने इस धक्के को परंपरागत जेट इंजन के बराबर पाया है। शोध दल ने 2.45 गीगाहट्र्ज ऑयनीकरण चैंबर में पैदा उच्च तापमान एवं उच्च दबाव वाले प्लाज्मा पर अत्यधिक दबाव के साथ हवा फेंकी। शोध-पत्र के मुताबिक, इस तरीके से वाणिज्यिक जेट विमानों के समान विमान को आगे की ओर धक्का देने वाली प्रणोदन शक्ति और जेट दबाव हासिल की जा सकती है।

इस प्रायोगिक परीक्षण में ट्यूब के ऊपर स्टील की एक खोखली गेंद भी लगाई गई थी। उच्च दबाव वाले प्लाज्मा को इस ट्यूब में प्रवाहित किया गया और उसमें आग लगा दी गई। इससे गेंद पर जबरदस्त धक्का लगा और वह चारों तरफ घूमने लगी। प्लाज्मा का प्रवाह टिकाऊ बनाए रखने के लिए ट्यूब के भीतर सामान्य हवा को भी प्रवाहित किया गया था। 

इस स्टील गेंद में नियंत्रित तरीके से द्रव्यमान भी डाला गया क्योंकि विद्युत क्षेत्र की ताकत अलग-अलग दर्ज की गई। इस दौरान गेंद की आवाजाही को मापा गया और गैर-प्लाज्मा वायु प्रवाह के लिए भी गुंजाइश छोड़ी गई। शोधपत्र कहता है कि 310 किलोवॉट समकक्ष ऊर्जा वाली एक मानक टेस्ला बैटरी का इस्तेमाल करें तो परीक्षण के दौरान करीब 8500 न्यूटन की ताकत पैदा हो सकती है। एक न्यूटन का आशय उस शक्ति से है जो एक किलोग्राम वजन को एक मीटर प्रति सेकंड की गति से हटाने के लिए चाहिए होता है। इस तरह प्रायोगिक परीक्षण के दौरान प्लाज्मा तकनीक से पैदा हुई ऊर्जा परंपरागत जेट इंजन के बराबर ही होनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में शोधपत्र इस संभावना को स्वीकार करता है कि आगे चलकर एक ऐसा सूक्ष्म-तरंग वाला प्लाज्मा जेट प्रक्षेपक बनाया जा सकता है जिससे कार्बन उत्सर्जन एवं वैश्विक तापमान से बचने में मदद मिलेगी।

हालांकि इस संकल्पना को कार्यरूप में ढालने की राह में अभी कई चुनौतियों से पार पाना होगा। सच है कि इस परीक्षण के दौरान काफी अधिक गर्मी पैदा हुई। ऐसे में इतने ऊंचे तापमान का उपकरण पर असर एवं धक्के को संभालने जैसे मामलों से निपटना भी खासा मुश्किल होगा। अगर एक कार्यशील प्लाज्मा जेट इंजन बन जाता है तो विमानन क्षेत्र में उत्सर्जन का स्तर लगभग शून्य हो जाएगा।

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