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कारगर हों सुधार

संपादकीय /  May 19, 2020

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद गत सप्ताह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चरणबद्ध ढंग से अर्थव्यवस्था की मदद के लिए कई उपायों की घोषणा की। इन उपायों में सरकार का ध्यान अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को नकद सहायता मुहैया कराने के अलावा सुधारों पर भी केंद्रित था। बहरहाल कई नीतिगत उपाय या तो पहले की गई घोषणाओं का दोहराव हैं या फिर ये ऐसी योजनाओं से ताल्लुक रखते हैं जो अतीत में वांछित सफलता नहीं पा सकीं। उदाहरण के लिए बिजली वितरण कंपनियों को 90,000 करोड़ रुपये की नकद सहायता उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना की विफलता का नतीजा है। वितरण कंपनियों पर बिजली उत्पादन कंपनियों का 90,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। नकद सहायता जहां इन कंपनियों को बकाया निपटाने में मदद करेगी, वहीं यह उनके सकल कर्ज में भी इजाफा करेगा। जब तक मूल्य निर्धारण और तकनीकी तथा वाणिज्यिक नुकसान का मसला सुलझ नहीं जाता है तब तक बिजली वितरण कंपनियां संकट से जूझती रहेंगी।

रक्षा उत्पादन के पैकेज की बात करें तो वह पहले की कई नीतिगत घोषणाओं का ही परिणाम है जो निजी क्षेत्र से संबंधित रही हैं। इनमें से कोई वांछित परिणाम देने में सफल नहीं रही। कुछ मामलों में रक्षा सेवा ने स्वयं विदेशी आपूर्ति पर जोर दिया क्योंकि तय लागत में घरेलू आपूर्ति समय पर नहीं हो पाती। ये मसले अभी भी हल नहीं हुए हैं और इनसे निपटना ही होगा। इसके अलावा आत्मनिर्भरता के नाम पर विनिर्माण को गति देने का नया प्रयास दरअसल मेक इन इंडिया अभियान के तय लक्ष्य हासिल न कर पाने का परिणाम है। खनन संबंधी पहल भी कुछ माह पहले घोषित की गई थी। सार्वजनिक उपक्रमों से संबंधित घोषणा ने भी काफी ध्यान आकृष्ट किया है। निजी क्षेत्र के लिए और अधिक गुंजाइश बनाने तथा सरकारी कंपनियों का निजीकरण करने की नीति सुधार प्रक्रिया के आरंभ से ही केंद्र में है।

बहरहाल, सरकार के लिए निजीकरण हमेशा कठिन रहा है। बीते कुछ वर्षों में सरकारी उपक्रमों में हिस्सेदारी बेचने का काम मोटे तौर पर राजकोषीय घाटे को सीमित करने के लिए किया गया है। व्यापक स्तर पर देखें तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए अतिरिक्त राशि भी 2014 के रोजगार तैयार करने के चुनावी वादे में हाथ लगी नाकामी का परिणाम है। बीते वर्षों में बेहतर रोजगार और आय ने कामगारों के एक बड़े तबके को आय के झटकों से उबरने लायक बना दिया होता।

इन बातों का यह अर्थ कतई नहीं है कि पहले की गई घोषणाएं गलत थीं। लेकिन इस बार यह सुनिश्चित करना अहम है कि पहले वाली गलतियां न दोहराई जाएं। बहुत संभव है कि सरकार का इरादा पहले की तुलना में कहीं अधिक नेक हो। परंतु यदि सरकार गतिरोधों को दूर करने में सफल नहीं होती है तो उसकी कोशिश अपर्याप्त साबित हो सकती है। इसमें बदलाव का विरोध करने वाले लॉबी समूहों से निजात भी शामिल है। उदाहरण के लिए रक्षा क्षेत्र की मौजूदा कंपनियां निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा नहीं पसंद करतीं। इसमें ऐसे मंत्रालय और मंत्री भी शामिल हो सकते हैं जो सरकारी क्षेत्र का बचाव करना चाहते हैं। कुल मिलाकर सरकार ने सुधार प्रक्रिया में आगे बढऩे का साहस दिखाया है। परंतु अतीत का अनुभव बताता है कि केवल इतना करना पर्याप्त नहीं होगा। तात्कालिक ध्यान जहां समाज के वंचित वर्ग को मदद मुहैया कराने पर केंद्रित होना चाहिए, वहीं इन सुधारों के क्रियान्वयन पर भी लगातार जोर दिया जाना चाहिए। इससे वायरस का प्रसार कमजोर पडऩे पर आर्थिक सुधार को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

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