बिजनेस स्टैंडर्ड - कामगारों को काम देने की बढ़ी सिरदर्दी
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कामगारों को काम देने की बढ़ी सिरदर्दी

ईशिता आयान दत्त, नम्रता आचार्य और वीरेंद्र सिंह रावत /  05 19, 2020

बिजनेस स्टैंडर्ड कामगारों को काम देने की बढ़ी सिरदर्दीलगभग एक महीने बाद पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के एक गांव मोहनपुर में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) के तहत काम फिर शुरू हो गया है। यहां करीब 20 लोगों को काम मिला है लेकिन सिर्फ एक दिन के लिए। हालांकि एक प्रवासी मजदूर बापी दास इन भाग्यशाली लोगों में नहीं हैं जिन्हें काम मिला है। वह हाल तक तमिलनाडु में एक खानपान सेवा प्रदाता के लिए काम करते थे लेकिन कोविड-19 महामारी को नियंत्रित करने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन से ठीक पहले घर वापस लौट आए।

मोहनपुर में मनरेगा काम की मांग कई गुना बढ़ गई है क्योंकि बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार वापस अपने पैतृक गांव लौट आए हैं। जिन लोगों के पास इस वक्त कोई काम नहीं है और हाथ में कम पैसे भी बचे हैं उनके लिए मनरेगा एक उम्मीद जगा रहा है।

लेकिन दास और उनकी तरह कई ऐसे लोग जो काम की तलाश में हैं उनके दिमाग में महानगरों में वापसी की अब कोई बात नहीं है। अपने गृहराज्य वापस लौटे कामगारों की इच्छा अब यही है कि भले ही उन्हें कम पैसे मिले लेकिन वे अपने गृहराज्य को छोड़कर नहीं जाएंगे।

सोमवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज्य के 'भूमिपुत्र' से ग्रीन जोन के उद्योगों में जाकर काम करने की अपील की। उन्होंने कहा, 'अब तक आप महाराष्ट्र को बचाने के लिए घर पर ही रहे। लेकिन अब, आपको ग्रीन जोन के उद्योगों में काम करने जरूर जाना चाहिए।' महाराष्ट्र की प्रवासी मजदूरों के लिहाज से ज्यादा हिस्सेदारी है और यह ग्रीन जोन में श्रमिकों की कमी का सामना कर रहा है क्योंकि दूसरे राज्यों के कामगार वापस अपने घर जा रहे हैं। कर्नाटक को श्रमिकों की कमी की वजह से पहले अंतरराज्यीय ट्रेनें रद्द करने पर मजबूर होना पड़ा था। दरअसल निर्माण उद्योग में बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों के मजदूर जुटे थे। हाल ही में निर्माण कार्यों से जुड़े श्रमिकों को लुभाने के लिए कर्नाटक सरकार ने राज्य के 1,600 करोड़ रुपये के कोविड राहत पैकेज के हिस्से के रूप में राज्य में भवन निर्माण से जुड़े 15.8 करोड़ पंजीकृत श्रमिकों में से हरेक को 3,000 रुपये दिए। यह रकम पहले ही उनके खाते में डाले गए 2,000 रुपये के अलावा दी गई राशि है। लेकिन महाराष्ट्र और कर्नाटक के लिए जो बातें सिरदर्द बन चुकी हैं वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। ठाकरे से काफी पहले ममता ने प्रवासी कामगारों से संपर्क करते हुए उन्हें अपने गृह राज्य में रहने के लिए कहा। उन्होंने उन्हें रोजगार के मौके देने का आश्वासन दिया और राज्य प्रशासन ने इसके लिए तुरंत काम शुरू कर दिया ।

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है कि जिले के औद्योगिक केंद्रों, एमएसएमई और उद्योग चैंबर्स के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की गई। मजदूरों में किस तरह का कौशल है इसे समझने के बाद हर जिले में काम के मौके की संभावनाएं तैयार की जाएंगी। पश्चिम बंगाल में करीब 549 औद्योगिक क्लस्टर हैं और औद्योगिक पार्क के अलावा कई सूक्ष्म इकाइयों के लिए 'कर्मतीर्थ' हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए, जहां कामगारों का पलायन अधिक है वहां इन प्रवासी मजदूरों की घर वापसी जिम्मेदारी बढ़ाने के साथ-साथ एक अवसर भी दे सकता है। 16 मई तक रेलवे ने करीब 15 लाख मजदूरों को उनके गृह राज्यों में पहुंचाया है। लेकिन कई और मजदूर पैदल ही अपने गृह राज्य की ओर बढऩे लगे। मिसाल के तौर पर  कोविड-19 की वजह से लगाए गए लॉकडाउन के बाद से ही उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूर भारी तादाद में आ रहे हैं जिनकी अनुमानित तादाद 18 लाख है। इससे निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए बड़ी समस्या पैदा हो गई है क्योंकि उन्हें स्थानीय रोजगार देने की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।

बहरहाल, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने विभाग प्रमुखों को लघु एवं मझोले उद्योग खंड, एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना, खादी, खाद्य प्रसंस्करण आदि में सामूहिक रूप से 20 लाख से अधिक स्थानीय स्तर के रोजगार के अवसर बनाने के लिए एक रोडमैप तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा सरकार मनरेगा में काम के मौके देने की तादाद दोगुनी करना चाहती है ताकि मौजूदा 25 लाख के मुकाबले 50 लाख लाभार्थियों को इस योजना में काम के अवसर दिए जा सकें।

उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने कहा कि सरकार सभी प्रवासी मजदूरों के लिए एक  'मस्टर रोल' तैयार कर रही है, ताकि उन्हें काम दिया जा सके। इसमें कामगारों के कौशल के अलावा अन्य ब्योरे भी शामिल किए जाएंगे। प्रवासी कामगारों के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि एक बड़ा हिस्सा अकुशल मजदूरों का है जिन्हें कौशल प्रशिक्षण देने की जरूरत पड़ सकती है। मुमकिन है कि इसमें काफी वक्त लग सकता है। हालांकि ओडिशा के उद्योग सचिव हेमंत शर्मा ने कहा, 'जब हम इन मजदूरों के कौशल का जायजा ले रहे थे तब हमने यह पाया कि कुछ के पास आईटीआई प्रमाणपत्र था और कुछ तो पॉलिटेक्निक डिप्लोमा वाले भी थे। लगभग 15-20 प्रतिशत कामगारों को काम में लगाया जा सकता है क्योंकि उन्हें कौशल प्रशिक्षण देने की जरूरत नहीं होगी।' सभी राज्यों ने प्रवासी कामगारों को पंजीकृत करने के लिए पोर्टल शुरू कर दिए हैं। मजदूरों की कुशलता का अंदाजा लेने के लिए इसमें रोजगार के क्षेत्र और पिछले 2-3 वर्षों में मिले पगार का ब्योरा भी देने के लिए जगह दी गई है।

जमशेदपुर के एक्सएलआरआई (जेवियर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट) में प्रोफेसर (एचआरएम एरिया) के आर श्याम सुंदर ने कहा कि संभव है कि राज्य ज्यादा अकुशल कामगारों को लेने में गलती कर दे लेकिन कुशलता में वक्त के साथ बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि राज्यों के पास प्रवासी कामगारों के लिए एक खुली नीति होनी चाहिए। ओडिशा सरकार प्रवासी कामगारों से जुड़ी अन्य योजनाओं पर विचार-विमर्श कर रही है। शर्मा कहते हैं, 'संभव है कि हम प्रवासी श्रमिकों को इस्पात संयंत्र के साथ जोडऩे के लिए एक समझौता ज्ञापन करें। यह अनिवार्य नहीं है लेकिन इसके लिए कोशिश करनी होगी। इसके अलावा अगर श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा किसी विशेष क्षेत्र से है, तो उस क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए विशेष प्रोत्साहन की पेशकश की जा सकती है।' महामारी की स्थिति को देखते हुए उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया गया है जिसमें यह विमर्श भी हो सकता है कि प्रवासी कामगारों को कैसे काम दिया जाए।

जब तक आर्थिक गतिविधियां सामान्य नहीं हो जाती हैं तब तक मनरेगा और कुछ सरकारी योजनाएं घर वापस लौटे मजदूरों को व्यस्त रख सकती हैं लेकिन सवाल यह है कि ऐसा कब तक चलेगा?

(साथ में समरीन अहमद और अनीश फडणीस)

Keyword: Economic Package, Mini Budget, PMGKY, MGNREGA, Rural Employment, प्रोत्साहन पैकेज, मनरेगा, प्रवासी श्रमिक, कामगार,
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