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कोविड-19 के बाद प्रवासियों की भूमिका में आएगा बड़ा बदलाव?

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  May 18, 2020

कुछ तस्वीरें मुझे डरा रही हैं। ये तस्वीरें हृदयविदारक हैं। एक तस्वीर उस छोटी लड़की की है, जिसकी मौत एक यूरोपीय शहर के समुद्र तट से कुछ दूरी पर हो गई क्योंकि उसके परिजन बेहतर भविष्य की उम्मीद में उस शहर में नाव से पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। दूसरी तस्वीर ताजा ही है। यह एक बुजुर्ग महिला की है, जो भारत में कोविड-19 की वजह से बंद एक शहर से अपने घर लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रही है। वह महिला काम के अपने सपने को छोड़ फिर उसी गांव जा रही है, जहां से वह आई थी। तीसरी तस्वीर एक युवा व्यक्ति की है, जो देश के एक बंद शहर से अपने घर पहुंचने के लिए कई दिन पैदल चलने के बाद अपने गांव से महज कुछ किलोमीटर पहले दम तोड़ देता है।

मैं पिछले एक साल से प्रवास के बारे में लिख रही हूं। मैंने लिखा था कि गरीबी, कृषि संकट और अब असामान्य मौसम की वजह से कृषि के अलाभकारी तथा जीवन कष्टप्रद बनने से गांवों में असुरक्षा बढ़ी है। यह प्रवास परंपरागत दबावों (लोग इसलिए गांव छोड़ रहे हैं क्योंकि उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है) और आकर्षण (लोग इसलिए गांव छोड़ रहे हैं क्योंकि वे ज्यादा विकल्प चाहते हैं) की वजह से हो रहा है मगर इसकी रफ्तार और पैमाना बहुत अधिक है।

गांवों से इस पलायन को मुश्किल से ही कागजात में दर्ज किया जाता है। विश्व प्रवास दिवस 2020 में कहा गया है कि वैश्विक प्रवास तेजी से बढ़ रहा है। मगर देश के भीतर प्रवास के आंकड़े मौजूद नहीं हैं। भारत में प्रवासियों की पिछली आधिकारिक गिनती 2011 की जनगणना में की गई थी। मगर यह गणना अप्रासंगिक थी, जो शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में मेरे शब्दों में 'अवैध' बस्तियों के बारे में कुछ नहीं बताती है। इन बस्तियों में अत्यधिक भीड़भाड़ है, शहरी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं और आम तौर पर ये औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र हैं, जिनकी वजह से शहर में प्रदूषण बढ़ रहा है।

आज ये अदृश्य लोग दिखने लग गए हैं। हम देख रहे हैं कि हजारों-लाखों प्रवासी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं क्योंकि सरकार उन्हें इस डर से घर नहीं जाने देगी कि उनके जरिये गांवों और सुदूरवर्ती जिलों में नोवेल कोरोनावायरस फैल जाएगा। वे हमें इसलिए नजर आ रहे हैं क्योंकि वे किसी भी कीमत पर घर जाना चाहते हैं और सार्वजनिक परिवहन के साधन नहीं चल रहे हैं। वे अपना सिर पर सामान उठाए पैदल ही बाल-बच्चों समेत लौट रहे हैं। वे बिना खाए-पिए पैदल चल रहे है और न ही उनके पास सोने का कोई ठिकाना है। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने हमसे कहा कि हमें खाना नहीं चाहिए, वे तत्काल अपने घर लौटना चाहते हैं। उनकी कराह साफ सुनाई देती है, जो हृदयविदारक है।

अब उनके आंकड़े सामने आ रहे हैं। केंद्र सरकार ने 12 अप्रैल, 2020 को उच्चतम न्यायालय को सौंपे अपने हलफनामे में कहा कि देश के सभी राज्यों में करीब 40,000 राहत शिविर हैं, जिनमें करीब 14 लाख प्रवासी कामगारों को रहने और खाने की सुविधा दी जा रही है। मगर यह अनुमान वास्तविक से बहुत कम है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो शिविरों में नहीं रह रहे हैं। वे सड़कों पर रह रहे हैं और अपने घर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन शुरू होने के करीब 40 दिन बाद यानी 29 अप्रैल को कहा कि फंसे लोग अपने घर जा सकेंगे। सभी राज्यों से बसें उन्हें अपने गृह राज्य पहुंचाएंगी। इसके बाद से आंकड़े ज्यादा साफ होने लगे हैं। शहरों से गांवों की ओर इस पलायन के वास्तविक असर को समझने के लिए हमें तब तक इंतजार करना होग, जब तक इन लोगों का हुजूम अपने गंतव्य स्थल तक नहीं पहुंच जाता।

इसका क्या असर होगा? पहला उस काम पर पड़ेगा, जो वह छोड़कर आएंगे। भले ही प्रवासी कुछ देशों में अवैध हों या अन्य देशों में असंगठित। मगर हकीकत यह है कि उनका श्रम सभी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अहम था। आज यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बहुत से हिस्सों में फसलों को काटने के लिए पर्याप्त श्रमिक नहीं हैं। आगामी महीनों में खाद्य की क्या स्थिति होगी? भारत में असर लॉकडाउन खत्म होने और अर्थव्यवस्था को फिर से चालू करने के लिए श्रमिकों की किल्लत होने के बाद महसूस किया जाएगा। क्या हम उन्हें ज्यादा तवज्जो देंगे, उन्हें बेहतर अवसर एवं लाभ मुहैया कराएंगे ताकि वे वापस लौट आएं? क्या कोविड-19 के बाद की दुनिया में प्रवासियों की भूमिका में बड़ा बदलाव आएगा?

कुछ अन्य हकीकत हैं, जिनसे कोविड-19 ने हमें रूबरू कराया है। यह बीमारी उन जगहों पर सबसे ज्यादा फैलने के आसार हैं, जहां कोई शहरी सेवाएं नहीं हैं, जहां बस्तियों में अत्यधिक भीड़भाड़ है, जहां साफ पानी की आपूर्ति एवं स्वच्छता अपर्याप्त हैं और लोगों के पास सुरक्षित रहने का कोई जरिया नहीं है। यह वे जगह हैं, जहां हमने अपने कार्यबल को रहने के लिए छोड़ दिया है।

सिंगापुर में वायरस ने तेजी से प्रहार किया है। इस द्वीपीय देश को हमेशा अपने स्वच्छता रिकॉर्ड पर गर्व रहा है। मगर अब यह पा रहा है कि उसने उन सघन बस्तियों की सुध नहीं ली, जहां प्रवासी श्रमिक रहते हैं। अन्य देशों में भी यही हाल है। इसलिए क्या हम प्र्रवासी श्रमिकों समेत शहरी गरीबों को बेहतर आवास, पानी और साफ-सफाई मुहैया कराने पर फिर से काम करेंगे? क्या इसका यह मतलब है कि हम उस माहौल को सुधारने में निवेश करेंगे, जिसमें वे रहते और काम करते हैं?

अंत में जब प्रवासी अपने घर लौट जाएंगे तो क्या होगा? क्या वे वापस लौटना चाहेंगे? ऐसे में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने का मौका है ताकि उनके पास अपना घर न छोडऩे का विकल्प रहे।

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