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राजकोषीय समझदारी की इस समय भी है अहमियत

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  May 17, 2020

मोदी सरकार शुरुआत से ही राजकोषीय लक्ष्यों पर खरा उतरने को लेकर अपेक्षाकृत सजग रही है। उसने एक सीमा से अधिक खर्च नहीं किया है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राजकोषीय मोर्चे पर कोई चिंता ही नहीं है। पहली चिंता व्यय की गुणवत्ता के एक स्तर तक न रहने की है क्योंकि इस सरकार ने निजी निवेश की कीमत पर सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी। दूसरी, केंद्र सरकार ने राज्यों की कीमत पर राजस्व की हिस्सेदारी और इस पर अपना नियंत्रण बढ़ाने की लगातार कोशिश की है। तीसरी चिंता को मैं 'राजकोषीय लक्ष्य पूरा करते हुए नजर आना' कहता हूं क्योंकि अतीत में बजट से इतर उधारी लेती रही सरकार के रवैये पर वाजिब सवाल खड़े होते हैं।

इस असाधारण संकट ने आपूर्ति शृंखलाओं को पूरी तरह धराशायी कर दिया है जबकि जन स्वास्थ्य के लिए जरूरी होते हुए भी लॉकडाउन ने समूची अर्थव्यवस्था को थमने पर मजबूर कर दिया है। ऐसी स्थिति में राजकोषीय मोर्चे पर किसी-न-किसी तरह सवाल उठेंगे। इस संकट का असर अभूतपूर्व है- सीएमआईई के अनुसार आज 27 फीसदी बेरोजगारी है, यानी 12.2 करोड़ लोगों के पास कोई काम नहीं है।

सवाल यह है कि सरकार मध्यम एवं दीर्घावधि में किसी भी तरह की राजकोषीय पहल के लिए अपनी ही सफलताओं एवं नाकामियों से क्या सीख सकती है? लेकिन पहले संक्षिप्त अवधि के सबक पर गौर करते हैं। यह कोई सामान्य संकट नहीं है, यह न तो विश्वास का संकट है और न ही समन्वय का संकट है। उन संकटों को सामान्य खर्च बढ़ाने जैसे तरीकों से निपटा जा सकता है। यह तो एक ऐसा संकट है जिसमें हम वायरस के प्रसार को थामने के लिए असल में सकल घरेलू आउटपुट का एक हिस्सा घटित ही नहीं होने देना चाहते हैं। भारत के लिए मार्किट पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) में तीव्र गिरावट इस मोर्चे पर कामयाबी का संकेत है। दरअसल पीएमआई से किसी गिरावट की सघनता नहीं बल्कि गिरावट को लेकर सहमति सामने आती है। पीएमआई स्तर कम होने का मतलब है कि लगभग सारे प्रतिभागी आने वाले महीने में आउटपुट गिरने को लेकर आश्वस्त हैं। यह लॉकडाउन की कामयाबी का एक संकेत है। यानी सीमित अवधि के असाधारण कदम अर्थव्यवस्था को गहरी चोट देंगे और इससे महामारी के खिलाफ जंग भी कमजोर होगी। यानी पैसे को केवल खर्च न करें, यह बरबादी के साथ खतरनाक भी है। ऐसे में नीतियों के एक पैकेज की जरूरत है जो जनसंख्या की बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखने के साथ ही हमें राष्ट्रीय संपदा एवं परिसंपत्तियों के संरक्षण की अनुमति भी दे। हालांकि ऐसा कोई भी पैकेज सस्ता नहीं होगा। इसमें धन लगेगा जिसका इंतजाम उधारी या नए नोट छापकर होगा। बाद में इस रकम का भुगतान बढ़े हुए कर राजस्व, मुद्रास्फीति या सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बिक्री से होगा। यह एक कड़वा सच है, भारत अमेरिका या जापान नहीं है और उन देशों की तरह भारी घाटे का बोझ नहीं उठा  सकता है। लगता है कि सरकार अपने राजकोषीय कदमों के मध्यम एवं दीर्घावधि प्रभावों को समझने की इच्छा जताएगी और अपने पिछले अनुभवों के सबक को भी समाहित करेगी।

पहला, सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए। कई लोग कहेंगे कि निजी क्षेत्र की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र को खर्च के लिए निर्देशित करना आसान है जो अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने में मददगार होगा। लेकिन पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे प्रसार का एक हद से अधिक वृद्धि लाभ नहीं होता है। सरकार जिस तरह से खुद को वित्तीय संसाधन आवंटित करती है उसके बाद निजी क्षेत्र के लिए निवेश पर जोखिम लेने की गुंजाइश कम ही रह जाती है। कुछ लोगों का दावा है कि वृद्धि को बचाए रखना प्राथमिक होने से घाटा अधिक मायने नहीं रखता है क्योंकि जीडीपी के बरक्स राजकोषीय घाटे का अनुपात प्रासंगिक है और जीडीपी में कमी आना राजकोषीय घाटे के अनियंत्रित विस्तार जितना ही खराब है। लेकिन जीडीपी वृद्धि पर सार्वजनिक व्यय का असर अधिक अस्थायी रहा है। इस तरह राजकोषीय विस्तार अपरिहार्य होते हुए भी सरकार को मध्यम अवधि में निजी निवेश-केंद्रित वृद्धि को प्राथमिकता देनी होगी।

दूसरी, केंद्र सरकार को राज्यों को भी ध्यान में रखना होगा।

रेटिंग कटौती या वित्तीय संकट राज्यों की उधारी जरूरतें बढऩे से प्रभावित हो सकता है। लिहाजा उसे उपकरों पर अधिक निर्भरता नहीं रखनी चाहिए, राज्यों को उनका हिस्सा देना जारी रखे और जीएसटी क्षतिपूर्ति एवं अन्य बकाये का भुगतान करे।

आखिर में, केंद्र को अपनी योजनाओं को लेकर पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए। उसे उधारी जुटाने के तरीकों को लेकर खुद को साफ-सुथरा दिखाने और राजकोषीय दायित्व ढांचे में ठोस सुधार करने का मौका मिला है। राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम को शिथिल कर अधिक उधारी जुटाना या नए नोट छापना एकदम गलत तरीका है। इससे भारत के आंकड़ों को लेकर असहजता बढ़ेगी और लंबी अवधि में व्यय एवं निवेश के लिए संसाधनों की कमी होने लगेगी। उसे घाटे की भरपाई करने वाले आरबीआई के मौद्रिक कदमों पर रोक लगाने की जरूरत है।

इन दावों से काम नहीं चलेगा कि ये विशेष परिस्थितियां हैं जिनके लिए अस्थायी कदम काफी होंगे। मिल्टन फ्रीडमैन के शब्दों में कहें तो जब भी सरकार किसी कदम को 'अस्थायी' कहती है तो वह आखिर में 'स्थायी' हो जाता है।

सरकार संस्थागत सुधारों के जरिये अपने भावी कदमों पर लगाम लगाए। खासकर, एक उच्चाधिकार- प्राप्त समिति के राष्ट्रीय राजकोषीय परिषद के गठन संबंधी सुझाव पर इस समय ध्यान देना चाहिए। वैश्विक अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को इस संस्थान से जोड़ा जा सकता है। इससे सार्वजनिक वित्त को लेकर अंधेरा दूर होने और व्यय एवं उधारी की अधिक गुंजाइश भी पैदा होगी।
Keyword: PMI, GDP, Revenue, Health, CMIE, Fiscal Deficit, राजकोष, निजी निवेश, राजस्व, बजट, जन स्वास्थ्य, मुद्रास्फीति, जीडीपी,
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