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सत्ता की संवेदनहीनता के शिकार हुए श्रमिक

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  May 17, 2020

हम अक्सर कामगारों को उनकी कमीज के कॉलर के रंग के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बांटकर देखते हैं: सफेद कॉलर और नीले कॉलर वाले। दुख की बात है कि हमारे राजमार्गों पर इन दिनों जो दुखद और स्तब्ध करने वाला वाकया लगातार घट रहा है और वह हमें अहसास करा रहा है कि कामगारों का एक तीसरा वर्ग भी है। हम इन्हें बिना कॉलर वाले कामगार कह सकते हैं।

आप पूछ सकते हैं कि बिना कॉलर वाले क्यों? मैं चाहूंगा कि आप इन सैकड़ों-हजारों लोगों को गौर से देखें, ये वही लोग हैं जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को सुरक्षित और आसान बनाते हैं।

ट्रकों से ईंट, सीमेंट और स्टील चढ़ाने और उतारने वाले यही लोग हैं। विनिर्माण स्थलों पर काम करने वाले, हमारे कपड़ों पर इस्तरी करने वाले, हमारी बगिया की देखभाल करने वाले, रिक्शा खींचने वाले, हमारे बाल काटने वाले, स्थानीय हलवाई की दुकान पर समोसे और जलेबी बनाने वाले यही लोग हैं। आपने काम के दौरान इन्हें कमीज पहने हुए कितनी बार देखा है? कमीज पहनना इनके काम को बाधित करता है इसलिए वे अक्सर काम करते समय कमीज उतार देते हैं। वे अक्सर बनियान पहनकर या टीशर्ट में काम करते हैं। लेकिन इससे उनका काम कम महत्त्वपूर्ण नहीं हो जाता। उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। मिसाल के तौर पर नाई के बिना तो प्रधानमंत्री तक की मूंछ भी बढ़ी हुई दिखती है। पुरानी तस्वीरें देखते हुए आप आसानी से यह समझ सकते हैं। हम सबको प्रेस वाले, माली और रद्दी वालों और कचरा उठाने वालों तक की कमी महसूस होती है।

कामगारों की यह तीसरी श्रेणी जो हमारे लिए अदृश्य थी वह बाकी दोनों कॉलर वाले वर्गों से कहीं अधिक तादाद में है। हम इन पर इसलिए ध्यान नहीं देते क्योंकि हम उन्हें हलके में लेते हैं। इसलिए भी क्योंकि वे खामोश रहते आए। अब वे बोल रहे हैं और अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। उनमें से कई अपने बच्चों को साथ लेकर सफर कर रहे हैं। आगरा के बाहर एक बच्चा सूटकेस पर लटका हुआ देखा गया। जबकि आप भी जानते हैं कि अब तक किसी कंपनी ने ऐसा सूटकेस नहीं बनाया जो 500 किलोमीटर पैदल घसीटा जा सके। कुछ लोग बुजुर्ग मां-बाप को अपने कंधों पर उठाए चले जा रहे हैं, जिंदगी भर के शारीरिक श्रम ने उनके कंधे इतने मजबूत तो कर ही दिए हैं। कुछ स्त्रियों ने रास्ते में ही संतान को जन्म दे दिया और कुछ सफर में ही मर गए। किसी को ट्रक या ट्रेन ने रौंद दिया तो कोई बीमारी से मारा गया। 68 वर्ष के राम कृपाल ऐसे ही एक व्यक्ति थे जो एक ट्रक में सवार होकर मुंबई से 1,600 किमी दूर उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर स्थित अपने घर के लिए निकले और घर के करीब पहुंचकर उनका निधन हो गया। वह प्यासे और थके थे इसलिए इतना कुछ झेल नहीं पाए। निधन के बाद पता चला कि वह भी कोरोना पॉजिटिव थे।

अच्छी बात यह है कि अब तक ओझल रहे इस कामगार वर्ग का पता लगने के बाद हम सभी उसकी मदद करना चाहते हैं। बुरी बात यह है कि हम अब तक मामले को सही ढंग से समझ नहीं पा रहे। हमें अब तक यह नहीं पता कि वे कौन हैं। जाहिर है हम कहेंगे कि वे बेहद गरीब हैं। वे भूखे हैं, बेघरबार हैं, बेरोजगार हैं, उनकी कोई आय नहीं है, जूते नहीं हैं, पैरों में छाले हैं, वे बदकिस्मत हैं। वे घबराहट में और अज्ञानतावश अपने घरों की ओर भाग रहे हैं। यदि वे समझदार होते तो शायद जान पाते कि वे शहरों में ही अधिक सुरक्षित हैं।

हम सब गलत हैं। इसलिए कि हम सब उन्हें गलत समझते हैं। इसलिए हमारे उपाय भी गलत हैं। खाने के पैकेट, पुराने कपड़े देना, उनके लिए दुखी होना, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर अपना दुख प्रकट करना। इस व्यापक पलायन पर दुख प्रकट करना या कोरोनावायरस को कोसना। पाखंड यही तो है। अगर आप कहीं रुककर इन कामगारों से पूछेंगे कि वे शहरों में क्या कर रहे थे और उस काम के लिए वे कितना कमा रहे थे, तब आपको पता चलेगा कि आप कितने गलत थे। ट्रक पर माल चढ़ाने उतारने का काम करने वाला विशुद्ध श्रमिक एक दिन में 500 से 1,000 रुपये तक कमाता है। जाहिर है उनके काम के घंटे भी महज आठ नहीं होते लेकिन वे इसके लिए शहर नहीं आए थे। यह वह तबका है जिसे हम अकुशल कामगार कहते हैं। जरा भी कुशलता वाले कामगार मसलन दर्जी, नाई, बढ़ई आदि इससे कहीं अधिक कमाते हैं। वे एकदम वंचित, भूखे और असहाय नहीं हैं जो तीन वक्त भोजन मिलने को ही खुशकिस्मती मानते हों। इन लोगों ने अपना गांव इसलिए नहीं छोड़ा था क्योंकि वे भूखे मर रहे थे। वे बेहतर जीवन की तलाश में शहर आए थे।

देश के भीतर यानी गांवों से शहरों की ओर प्रवास काफी हद तक वैसा ही है जैसे कोई इंजीनियर एच1बी वीजा और ग्रीन कार्ड का सपना देखता है। हमारे मध्य वर्ग के बच्चों के लिए जो हैसियत ग्रीन कार्ड की है वही हैसियत पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमांत किसान परिवार के बच्चे के लिए शहर में 600 रुपये रोजाना के काम की है।

उनसे दया दिखाते हुए नहीं बल्कि धैर्य से पूछिए कि वे शहर क्यों आए? वे अपने कमाए पैसों से क्या करते हैं? आपको जो उत्तर मिलेंगे वे काफी हद तक ऐसे हो सकते हैं: खुद की, अपने बच्चों की और परिवार की जीवन दशा सुधारने। कुछ अतिरिक्त कमाने जिसकी बचत करके घर भेजा जा सके और बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके।

अपने घरों को लौट रहे लाखों लोग भिखारी नहीं हैं। वे देश के आकांक्षी कामगार वर्ग की नई पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। ये वे लोग हैं जिनके स्वाभिमान और आत्मसम्मान को अचानक ठेस लगी है। यह कई दशकों में देश के सबसे मेहनती वर्ग का सबसे बड़ा सार्वजनिक अपमान है।

वे हमारी उभरती अर्थव्यवस्था के निर्माता हैं, हमारा अधिशेष तैयार करने वाले हैं, वे हमारे जनांकीय प्रतिभा भंडार में योगदान करने वाले हैं। वे दिन पर दिन अपना जीवन इसी आकांक्षा में सुधारते हैं कि एक दिन उनके बच्चे उनसे अच्छा जीवन जिएं। हमारे देश के बच्चे जिस देश का ग्रीन कार्ड हासिल करना चाहते हैं वहां इसे अमेरिकी स्वप्र कहा जाता है। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार चोट पहुंचा रही है। उन्हें पता है कि गलती हो चुकी है। देश के हर इलाके से ऐसी तस्वीरें और आवाजें आ रही हैं। खासकर हिंदी प्रदेशों से जहां उनके मतदाता बसते हैं।

सरकार ने भी उन्हें गलत समझा। उसे लगा कि इन लोगों को केवल बैंक खातों में थोड़ी सी धनराशि और तात्कालिक राहत चाहिए। सरकार यह समझ नहीं पाई कि अचानक लगे लॉकडाउन में इन लाखों लोगों की जिंदगी का ध्यान नहीं रखा जा सका और वह पूरी तरह उलट-पुलट गई। लॉकडाउन का सबसे अधिक नुकसान इस कॉलर विहीन कामगार वर्ग को हुआ।

हमने इसे कितना गलत समझा इसे समझने के लिए अपनी कॉलोनी के गेट पर खड़े सुरक्षा गार्ड को देखिए जो अवैध आगंतुकों को दूर रखता है। वे क्यों अपने घरों को नहीं लौट रहे? क्या वे अपने परिवार को लेकर चिंतित नहीं हैं? क्या उन्हें वायरस का खौफ नहीं है? क्या वे गरीब नहीं हैं?

ऐसा नहीं है। उन पर ये सारी बातें लागू होती हैं। वे केवल इसलिए रुके हैं क्योंकि उनका वेतन मिलना तय है और उन्हें यह समझ है कि वे शहर इसलिए आए थे ताकि अपने परिवार का जीवन स्तर सुधार सकें। इनमें से ज्यादातर लोग दोहरी पालियों में काम करते हैं और एक कमरे में दर्जन भर लोग रहते हैं ताकि घर भेजने के लिए कुछ पैसे बचा सकें। अंतर केवल यह है कि उनके नियोक्ताओं ने उन्हें काम से नहीं निकाला है। अगर बाकियों को भी कुछ सप्ताह तक आजीविका बरकरार रहने का ऐसा आश्वासन मिल जाता तो शायद करोड़ों लोग इस झटके से बच जाते और हमारा देश वैश्विक शर्मिंदगी से बच जाता।

Keyword: Migrant Workers, Accident, Lockdown, श्रमिक, कामगार, राजमार्ग, ईंट, सीमेंट, स्टील,
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