बिजनेस स्टैंडर्ड - राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं
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राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं

संजीव मुखर्जी /  May 17, 2020

बीएस बातचीत

केंद्र सरकार ने कृषि बाजारों को उदार बनाने और किसानों को माल बेचने का वैकल्पिक माध्यम उपलब्ध कराने के लिए कई घोषणाएं की हैं। कृषि तथा ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संजीव मुखर्जी से कहा कि राज्य इन कदमों का विरोध नहीं करेंगे क्योंकि राज्य किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाना नहीं चाहेंगे। संपादित अंश :

क्या कृषि वस्तुओं का एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना रुकावट व्यापार सुनिश्चित करने वाला केंद्र का प्रस्ताव राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं है और इससे दोनों में टकराव नहीं होगा?

मामला राज्य के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण का नहीं बल्कि किसानों का कल्याण सुनिश्चित करने का है। आज किसान फसल उगाते हैं, पूंजी लगाते हैं, कड़ी मेहनत करते हैं और प्रकृति के भरोसे रह जाते हैं। मगर वे इकलौते उत्पादक हैं, जो न तो अपने माल की कीमत तय करते हैं और न ही उसे पसंदीदा ग्राहक को बेच पाते हैं। उलटे वह कई नियमों से बंधे हैं। दूसरे उत्पादकों को माल तैयार करने और जिसे चाहे, जहां चाहे बेचने की आजादी है। इसलिए किसानों की आय बढ़ाने के लिए इन बड़े सुधारों की बहुत जरूरत थी। मुझे नहीं लगता कि कोई भी राज्य अपने किसानों का अहित करना चाहेगा।


कानूनों का क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित करेंगे? अध्यादेश लाएंगे या संसद जाएंगे?

घोषणा हो चुकी हैं। अब हम कानून बनाएंगे और उसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल तथा प्रधानमंत्री तय करेंगे कि अध्यादेश लाएं या संसद में जाएं।


अनुबंध कृषि कानून कैसे काम करेगा? पहले से मौजूद आदर्श अधिनियम से यह कितना अलग है?

अनुबंध खेती के लिए नीति आयोग द्वारा बनाया गया आदर्शन अधिनियम पहले से है, जो राज्यों तक पहुंचाया जा चुका है। हम उसी आदर्श अधिनियम को केंद्रीय कानून बनाने का प्रयास करेंगे।


आपको नहीं लगता कि इस समय सीधे किसानों को सहायता राशि देना ज्यादा सही होता?

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कुछ समय पहले घोषित पीएम-किसान सबसे बड़ी प्रत्यक्ष सहायता योजना है। पिछले एक साल में हमने पीएम-किसान के जरिये किसानों को लगभग 71,000 करोड़ रुपये दिए हैं। लॉकडाउन के दौरान भी उनके खातों में करीब 19,000 करोड़ रुपये भेजे गए हैं। बड़ा सवाल है कि आप किसानों को अनुदान और सहायता के भरोसे कब तक रख सकते हैं? उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए चौतरफा मदद करनी चाहिए ताकि वे सरकारी मदद के भरोसे नहीं रहें।


इनमें से कई उपायों की घोषणा तो 2020-21 के बजट में और उससे भी पहले की गई थी?

हां, कुछ घोषणाएं शायद बजट में थीं, लेकिन उस समय कई योजनाओं में इनके लिए राशि आवंटित नहीं की गई थी। अब हमने राशि आवंटित कर दी है और पहले घोषित कई उपायों को अमल में भी ला रहे हैं।


मनरेगा का कार्यक्षेत्र बढ़ाने की मांग है ताकि उसमें अधिक काम हों और अतिरिक्त मजदूरों को काम मिल सके। आपका क्या कहना है?

मुझे लगता है कि मनरेगा और उसके कामकाज पर सवाल उठाने वालों को ग्रामीण भारत के बारे में कुछ नहीं पता। उन्हें पता ही नहीं कि कितने प्रवासी मजदूर गांव पहुंचे हैं और कितनों को इस योजना में काम मिला है। मैं बताना चाहता हूं कि हमने अब तक मनरेगा के लिए 33,000 करोड़ रुपये मंजूरर किए हैं, जिसमें से 21,000 करोड़ राज्यों को दिए जा चुके हैं। इस वित्त वर्ष में अभी तक ढाई करोड़ लोगों को इसके तहत काम दिया जा चुका है।


खरीफ  बुआई का आगामी सत्र कैसा लग रहा है?

सभी राज्यों ने कहा है कि चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि खरीफ सत्र के लिए उनके पास पर्याप्त उर्वरक, बीज तथा कीटनाशक हैं। आम तौर पर 1.5 करोड़ टन बीज की जरूरत होती है और देश में 1.53 करोड़ टन बीज मौजूद है। साथ ही मौसम विभाग का पूर्वानुमान देखते हुए मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि खरीफ की शानदार फसल होगी।

Keyword: Agriculture, Rural Development, Farmers, Narendra Singh Tomar, कृषि सुधार, फसल, कृषि बाजार, किसान, ग्रामीण विकास,
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