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हर कदम पर हर्ष वर्धन के साथ रही है किस्मत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  05 15, 2020

राजनीति में आकलन तो महत्त्वपूर्ण है ही, तकदीर भी उतना ही मायने रखती है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन इस बात का साक्षात उदाहरण हैं। शायद किसी और दौर में तथा किसी और स्थान पर उन्हें इस कदर उभर कर सामने आने का मौका नहीं मिलता जैसा कि अभी मिला हुआ है। यह सही है कि वह कभी भी और कहीं भी एक सक्षम स्वास्थ्य मंत्री साबित होते लेकिन एक चिकित्सक और स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते कोविड-19 महामारी ने उन्हें वह अवसर प्रदान किया है जिसकी वह आशा ही कर सकते थे। उनके जीवन की कहानी भी ऐसी ही है: वह जन्मजात भाग्यशाली हैं।

हर्ष वर्धन पेशे से नाक-कान-गला विशेषज्ञ शल्य चिकित्सक हैं। सफल और जानेमाने चिकित्सक हर्ष वर्धन सन 1969 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संपर्क में आए लेकिन उनको प्रसिद्धि मिली उनके परोपकारी चिकित्सा कार्य की वजह से। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत 1993 में हुई जब दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा। इससे पहले सन 1975 के आपातकाल के दौर में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का समर्थन करने के अलावा उन्हें कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। भाजपा की ओर से योग ध्यान आहूजा को चुनाव लडऩा था लेकिन संघ परिवार के कहने पर हर्ष वर्धन को टिकट मिला। विधायक चुना जाना तकदीर के उनके साथ होने का पहला उदाहरण था।

विधानसभा का गठन होने के बाद उन्हें मदन लाल खुराना सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्हें शिक्षा विभाग सौंपा गया और उन्होंने इकलौता सुधार यह किया कि राज्य सरकार के विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार की व्यवस्था समाप्त कर दी। इसका अर्थ यह हुआ कि उत्तर प्रदेश या बिहार के किसी कम नामचीन विश्वविद्यालय के प्रत्याशी भी दिल्ली के स्कूल में शिक्षक बनने के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के समान काबिलियत वाले हो गए। सन 1996 में भाजपा ने मदन लाल खुराना से इस्तीफा देने को कहा क्योंकि उनका और लालकृष्ण आडवाणी का नाम जैन हवाला डायरी में सामने आया था। आश्चर्यजनक ढंग से खुराना के विकल्प के रूप में हर्ष वर्धन का नाम सामने किया गया जबकि उन्हें सक्रिय राजनीति में आए हुए केवल तीन वर्ष हुए थे। हालांकि आरएसएस का प्रभाव काम नहीं आया और साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के नए मुख्यमंत्री बने।

सन 1998 के विधानसभा चुनाव में सुषमा स्वराज को पार्टी ने मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया। सन 2003 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में मदन लाल खुराना की वापसी हुई लेकिन पार्टी चुनाव हार गई। इस हार के दौरान हर्ष वर्धन अध्यक्ष थे। जाहिर है इसका दोष उनके ऊपर भी जाना था।

परंतु इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें दंडित नहीं किया। ऐसा व्यापक तौर पर इसलिए हुआ क्योंकि दिल्ली भाजपा में उन्हें कभी खतरा समझा ही नहीं गया। उस दौर में भी विजय गोयल को बड़ा खतरा माना गया जो भाजपा का वैश्य चेहरा होने के साथ-साथ अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और महत्त्वाकांक्षी नेता माने जाते रहे हैं। सन 2013 के विधानसभा चुनाव के पहले जब भाजपा के दिल्ली में सरकार बनाने की संभावना सबसे अधिक थी, दिल्ली भाजपा के दो बड़े नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जो एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे, वे विजय गोयल को रोकने के लिए साथ आए। उन्होंने भी हर्ष वर्धन पर ही दांव चला। चुनाव के दो सप्ताह पहले गोयल से कहा गया कि वह हर्ष वर्धन के लिए पार्टी अध्यक्ष का पद खाली कर दें। जाहिर है तकदीर उनके साथ थी।

परंतु 2013 के चुनाव में भाजपा को 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में केवल 32 सीटें मिलीं। आम आदमी पार्टी ने 49 दिनों के लिए सरकार बनाई। हर्ष वर्धन नेता प्रतिपक्ष बने। आप की सरकार गिरने के बाद भाजपा ने सरकार बनाने का दावा पेश करने के बजाय विधानसभा भंग करने को तरजीह दी। गोयल दिल्ली की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो गए। यही पार्टी नेतृत्व की मंशा भी थी। प्रदेश में केंद्र का शासन लागू रहा और अगले विधानसभा चुनाव 2015 में हुए।

इस बीच 2014 के आम चुनाव हुए। नरेंद्र मोदी से हर्ष वर्धन की मुलाकात सन 1996 में हुई थी। यह मुलाकात लालकृष्ण आडवाणी ने करवाई थी। हर्ष वर्धन का पूरा काम पूर्वी दिल्ली  में था लेकिन उन्होंने 2014 का आम चुनाव चांदनी चौक से लड़ा। एक बार फिर तकदीर उनके साथ रही। उस सीट से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वरिष्ठ नेता और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष सुधांशु मित्तल को चुनाव लडऩा था लेकिन अरुण जेटली ने मित्तल को रोकने के लिए हर्ष वर्धन के दावे का समर्थन किया। जीत के बाद हर्ष वर्धन को मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। इस बीच उन्होंने एक बड़ी गलती की और भारतीय चिकित्सा परिषद के ताकतवर मुखिया केतन देसाई को हटा दिया। देसाई बाद में निजी चिकित्सा महाविद्यालय घोटाले में जेल भी गए। बहरहाल हर्ष वर्धन मंत्री तो बने रहे लेकिन उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय से हटाकर पृथ्वी विज्ञान विभाग में भेज दिया गया। इस बीच एक समय दिल्ली का भावी मुख्यमंत्री माने जाने वाले हर्ष वर्धन चुपचाप देखते रह गए और 2015 के चुनाव में किरण बेदी को भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया गया। बेदी के कारण दिल्ली में सत्ता पाने की रही सही संभावना भी छिन गई। हर्ष वर्धन इन बातों से बेपरवाह रहे क्योंकि केंद्र का मंत्री पद तो उनके पास था ही। सन 2019 भी वह चुनाव जीते और ऐसे समय में देश के स्वास्थ्य मंत्री हैं जब उसे स्वास्थ्य मंत्री की सबसे अधिक आवश्यकता है। अब इसे किस्मत नहीं तो और क्या कहा जाए?

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