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ड्रैगन का फीनिक्स की तरह उदय

पार्थसारथि शोम /  May 15, 2020

चीन ने कोविड-19 महामारी के समय एक बार फिर अपनी ताकत दिखा दी। एक तरफ पूरी दुनिया में बवंडर मचा हुआ था, वहीं चीन ने बहुत तेजी से खुद को संभाला, महामारी पर काबू पाया और फिर से वृद्धि पथ पर बढ़ चला। अमेरिकी राष्ट्रपति ने महामारी पर काबू पाने में चीन के प्रयासों की सराहना करने के साथ ही इसके प्रसार के लिए उसे जिम्मेदार भी ठहराया था। विडंबना ही है कि इसके बावजूद अमेरिका ने चीन से स्वास्थ्य उत्पादों के आयात पर रोक नहीं लगाई जबकि चीन अपने चरित्र के अनुरूप उदासीन बना रहा और अपने कारोबार में जुटा रहा।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था की तीन चिंताओं में चीन की तीव्र रफ्तार आने वाले दशकों में भी जारी रहेगी जबकि यूरोप केंद्र से दूर बना हुआ है और अमेरिका विरोधाभासों में ही उलझा हुआ है। ये चिंताएं हैं उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार, उच्च तकनीक का हस्तांतरण एवं समावेशन और अंतरराष्ट्रीय विनिमय के माध्यम के तौर पर मुद्रा की भूमिका। इन तीनों परिप्रेक्ष्यों में चीन की रफ्तार जबरदस्त है।

व्यापार के मामले में, संतुलन के मौजूदा अभाव के संकेतक के तौर पर अमेरिका अकेले चीन को उतने डॉलर दे देता है जितना वह बाकी दुनिया को नहीं देता है। दूसरे देश भी चीन के साथ ऐसे ही चालू खाता घाटे का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2010 के दशक में चीन ने अमेरिका की क्वांटिटेटिव ईजिंग (क्यूई) नीति के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू कर दिया था। उसने अपने अधिशेष का इस्तेमाल अमेरिकी ट्रेजरी बिलों की खरीद में करना शुरू कर दिया जिससे सड़क, बंदरगाह और बिजली संयंत्र जैसे आर्थिक आधारभूत ढांचे को मजबूत किया जा सके। इसके बाद चीन 'रेशम मार्ग' की संकल्पना भी लेकर आया। प्रेक्षकों का कहना है कि यह अपने पड़ोसियों और यूरोप को सड़क मार्ग से जोडऩे के लिए चीन की यह एक सोची-समझी नीति है क्योंकि समुद्री मार्ग पर तो अमेरिका बाज की तरह नजरें गड़ाए रहता है।

अमेरिकी अनुभव बताता है कि अपरिचित इलाकों में बड़े भूभाग पर नियंत्रण रखने की वित्तीय एवं श्रम लागत बहुत अधिक होती है। इस तरह अपने जमीन-आधारित संपर्क में चीन की प्रगति अधिक सुरक्षित एवं परेशान करने वाली है।

बाकी दुनिया के साथ अपना जिंस विनिर्माण एवं उद्योग व्यापार आगे और बढऩे की संभावना को देखते हुए चीन यह सुनिश्चित कर रहा है कि उसके भविष्य की सुरक्षा अमेरिकी हितों की परवाह न करने वाले दोस्ताना मार्गों से ही गारंटी की जा सकती है।

तकनीक के संदर्भ में देखें तो अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां ट्रंप प्रशासन के विपरीत रुख के बावजूद चीन को तकनीक का हस्तांतरण जारी रखे हुए हैं।

भारत के उलट चीन की अफसरशाही आर्थिक प्रगति एवं भ्रष्टाचार जैसी बाधाओं पर नजर रखती है।  चीन यह सुनिश्चित करता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की राह में कोई भी बाधा न खड़ी हो।

चीन में भ्रष्टाचार के मामलों में जल्द सुनवाई होती है और कड़ी सजा का भी प्रावधान है। वैसे तो चीनी समाज में भ्रष्टाचार हर जगह मौजूद है। फिर भी चीन के पास ऐसे साधन हैं कि अपने सामरिक हितों के मुद्दों पर भ्रष्टाचार के मसले को दरकिनार कर देता है।

इसका परिणाम यह होता है कि चीन के कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) विश्व स्तर के आधारभूत ढांचे को टक्कर देते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बड़ी संख्या चीन में अपना अनुबंधित कार्यकाल पूरा होने पर उन्नत तकनीक सौंप देती हैं। ये कंपनियां कोई परोपकारी नहीं हैं, उनके चीन जाने की वजह वहां पर श्रम कानूनों का मूक होना और अफसरशाही की अड़चनें न होना है। चीन ने बाकी सभी देशों की तुलना में खुद को कहीं बेहतर रूप में पेश किया है।

बात केवल तकनीक की ही नहीं है। चीन का सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) उद्योग हुआवेई और जेडटीई के साथ परवान चढ़ा जो दूरसंचार क्षेत्र के बड़े उपकरण बनाने वाली कंपनी हैं। ये कंपनियां भारत के आईटी सेवा उद्योग से किस तरह अलग हैं जो दशकों से कर रियायतें लेने के बावजूद गहन शोध एवं विकास में निवेश करने में नाकाम रहे। अगर ऐसा हुआ रहता तो वे भी उच्च प्रौद्योगिकी में वैश्विक कंपनियां बन सकते थे। इसके बजाय वे भारत के 'कर व्यय' इतिहास में दी जाने वाली सबसे बड़ी छूटों के लाभार्थी रहे। इसके अलावा भारत की निराशाजनक एसईजेड नीति भी इसके लिए जिम्मेदार रही है।

आईटी हार्डवेयर क्षेत्र में चीन के उदय ने अमेरिका को कठोर प्रतिक्रिया के लिए मजबूर किया, भले ही उसके कुछ कदम ठहर नहीं पाए, मसलन जेडटीई के खिलाफ की गई कार्रवाई। हुआवेई के मुख्य वित्तीय अधिकारी को ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अमेरिका ने ऊंचे दांव वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा में सेमी-कंडक्टर के निर्यात पर रोक लगाने की धमकी भी दे दी। हालांकि अमेरिका के 1996 के दूरसंचार अधिनियम की वजह से वह संभावना खत्म हो गई। असल में, ब्रिटेन ने अपने 5जी नेटवर्क के लिए हुआवेई से संचार उपकरणों का आयात किया क्योंकि उसे कोई अमेरिकी आपूर्तिकर्ता मिला ही नहीं। जो भी हो, ब्रिटेन ने अमेरिका को नाराज तो कर ही दिया।

ऐसे में अमेरिकी सेमी-कंडक्टरों की चीन को बिक्री रोकना या तकनीक हस्तांतरण या बौद्धिक संपदा संरक्षण को अब भी नियंत्रित रख पाना विवादास्पद सवाल लगता है। यह भी संदेह के घेरे में है कि क्या अमेरिका इसे सफलतापूर्वक अंजाम दे सकता है? काफी हद तक स्वतंत्र विचारों वाली अमेरिकी न्याय प्रणाली रातोरात फैसले लेने वाले चीन के आगे बेबस नजर आती है।

आखिर में, भरपूर खजाना रखने वाला चीन एक नई मुद्रा रेनमिनबी की तरफ बढ़ता है। अगर चीन रेनमिनबी को अमेरिकी डॉलर के बरक्स उभरने की इजाजत देता है और अमेरिकी ट्रेजरी बिल के मुकाबले में रेनमिनबी बॉन्ड भी लेकर आ जाता है तो चीनी मुद्रा की मजबूती को देखते हुए रेनमिनबी बॉन्ड की लिवाली बढ़ जानी चाहिए।

नतीजतन, रेनमिनबी में होने वाला अंतरराष्ट्रीय व्यापार कम-से-कम पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ सकता है। आगे चलकर दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उसके दोस्ताना देश भी इसे अपना सकते हैं। इसके अलावा चीन इन क्षेत्रों को कर्ज देने की अपनी विदेशी मदद नीति को मजबूती भी दे सकता है। हालांकि ये कर्ज ऊंची दरों पर दिए जाते हैं लेकिन बाकी जगहों से तो उन्हें वह भी नहीं मिलता है।

निष्कर्षत: भूमि मार्गों के जरिये बढ़ा हुआ अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीकी समानता की कभी खत्म न होने वाली दौड़ और रेनमिनबी मुद्रा महज कल्पना के घोड़े नहीं हैं। उदीयमान 'एशियन टाइगर' का इतिहास तो इस नई दिशा के बारे में पहले ही बता चुका है।

चीन सांस्कृतिक क्रांति, लॉन्ग मार्च, तिब्बत, थ्येन आन मन चौक जैसी घटनाओं पर फैली तबाही के बाद भी खुद पर कोई अंकुश लगाने के बजाय शिनच्यांग और हॉन्गकॉन्ग जैसी घटनाएं अंजाम देता है। वह ताइवान को अपना मानता है और दक्षिण चीन सागर के पूरे इलाके पर अधिकार बताता है। वह अरुणाचल प्रदेश को 'निचला तिब्बत' कहता है और अक्सर सीमा का उल्लंघन करता है। इसने भारत को पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश को प्रलोभन देकर भारत की घेराबंदी कर दी है। इसने अफ्रीका में प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र खरीदे हैं और लैटिन अमेरिका में भी अपने कदम रख दिए हैं। इस तथाकथित गरीब देश की बहुपक्षीय संगठनों में उच्च प्रबंधन स्तर पर मौजूदगी लगातार बढ़ी है। उपभोगवादी पश्चिम ने न तो कुछ किया, न कुछ कर रहा है और आगे भी बहुत कम ही कर सकता है।

दुनिया के साथ क्या हो सकता है जब चीन का आजीवन राष्ट्रपति बना शख्स महज डराने के लिए न हो।

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