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व्यापक तस्वीर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 15, 2020

मौजूदा दौर की व्यापक तस्वीर की चर्चा करें तो पहली बात यह कि कोविड ज्यादातर लोगों के अनुमान से कहीं अधिक असर छोडऩे वाला है। संक्रमितों की तादाद में भारत अब चीन को पीछे छोड़ चुका है। देश में 84,000 से अधिक संक्रमित हैं। ज्यादा समय नहीं हुआ जब यह आंकड़ा दूर की कौड़ी नजर आ रहा था। बमुश्किल आठ सप्ताह पहले जब देश में पहला लॉकडाउन लागू किया गया था तब हमारे यहां 500 से भी कम संक्रमित थे। चीन में यह आंकड़ा उसी समय 80,000 पार कर चुका था।

सरकार मामलों के दोगुना होने की दर पर नजर रखे हुए है और उसका कहना है कि यह गति धीमी हो रही है। परंतु यह दर उतनी भी धीमी नहीं है। बीते 32 दिन में आंकड़े तीन बार दोगुना हुए हैं और मामलों में आठ गुना से अधिक वृद्धि हुई है। अगर मान लें कि भविष्य में यह दर और धीमी होगी और अगले 50 दिन में यानी जुलाई के आरंभ तक मामले दो बार ही दोगुना होंगे तो भी उस वक्त यह आंकड़ा 3,00,000 तक पहुंच जाएगा। उस स्थिति में भारत अमेरिका, रूस और ब्राजील के बाद कोविड संक्रमण से चौथा सर्वाधिक प्रभावित देश बन जाएगा। इनमें से कोई देश कोविड-19 की बेहतर रोकथाम के लिए नहीं जाना जाता। अगर इसे टालना है तो हमें दोगुना होने की दर के बजाय रोज सामने आने वाले मामलों और उनमें गिरावट पर नजर रखनी होगी।

अगर दोगुना होने का सिलसिला चलता रहा तो हमें बुरी खबरों के लिए तैयार रहना होगा। ये बुरी खबरें केवल चिकित्सा क्षेत्र से नहीं आएंगी बल्कि अर्थव्यवस्था को भी सामान्य होने में बहुत लंबा वक्त  लग जाएगा। कोविड महामारी के संभावित असर की तरह ज्यादातर लोगों ने इसके आर्थिक प्रभाव को भी कम करके आंका था। पूर्वानुमान लगाने वाले अभी भी इस वित्त वर्ष के लिए वृद्धि के सकारात्मक आंकड़ों की तलाश में हैं। शेयर बाजार का अल्पावधि की खबरों पर प्रतिक्रिया देना जारी है। परंतु दोनों ही उस सूनामी की अनदेखी कर रहे हैं जो शायद करीब ही है। अगर विशेषज्ञ कहते हैं हम जिन हालात से गुजर रहे हैं वे महामंदी के समान हैं तो हमें भविष्य को लेकर अपने अनुमान हकीकत के करीब करने होंगे।

इस बीच वित्त मंत्री ने पिछले दिनों जो दो तरह के उपाय घोषित किए उनमें बुनियादी रूप से कुछ भी गलत नहीं है। एकमात्र चूक प्रोत्साहन पैकेज के आकार को बढ़ाचढ़ाकर बताने की हुई है। यहां तक कि कर रिफंड को भी पैकेज का हिस्सा बता दिया गया है। वे उपाय व्यापक तौर पर वैसे ही हैं जैसी कि अधिकांश लोगों ने हिमायत की थी। लेकिन इनमें समझदारी या कहें चतुराई (जो भी आपका नजरिया हो) दिखाते हुए केंद्र सरकार पर कम से कम आर्थिक बोझ डालने की कोशिश की गई है। साथ ही राज्य सरकारों की व्यय शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ खास उपाय नहीं किए गए। सरकार की व्यय करने की सीमा एकदम स्पष्ट है।

वित्त मंत्री ने गुरुवार को जो सबसे स्पष्ट आंकड़ा पेश किया वह यह था कि करीब 8 करोड़ प्रवासी श्रमिक सरकार तथा नागरिक समाज द्वारा उपलब्ध कराई जगहों पर आसरा लिए हुए हैं। यह आंकड़ा दिमाग को झकझोरने वाला है। यह बहुत बड़ी बात है कि इतने लोगों को अस्थायी रूप से ठहराया जा सकता है। सरकार का वादा है कि इन सभी लोगों को शीघ्र भोजन मुहैया कराया जाएगा। यह भी बड़ी बात है। इसके बावजूद निर्मला सीतारमण गरीब और प्रवासियों के लिए ज्यादा घोषणाएं नहीं कर पाईं। जाहिर सी बात है कि कई लाख लोग बिना किसी मदद के रह जाएंगे। ग्रामीण इलाकों में कामकाज के ज्यादा विकल्प न होने के कारण और सरकार के पास कोई ठोस स्थायी इंतजाम न होने के कारण इन लाखों लोगों के दोबारा गरीबी के भंवर में घिर जाने की आशंका है।

अंत में एक बात निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं के लिए भी जो जोरदार तरीके से सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि श्रमिकों को वापस लाया जाए। निश्चित तौर पर अगर उनके श्रमिक अपने गांव-घर के लंबे अनिश्चित सफर पर चल निकले हैं तो उसकी कुछ जवाबदेही उनको भी लेनी चाहिए। क्योंकि ये लोग बुनियादी तौर पर काम की तलाश में ही निकले हैं। इससे पता चलता है कि कैसे नियोक्ताओं ने इन लाखों कामगारों को उनके हाल पर छोड़ दिया और उनके बारे में तनिक न सोचा। राज्य सरकारों द्वारा मनमाने ढंग से श्रम कानूनों को खत्म करना उनके दुखों में इजाफा करने वाला कदम है। एक व्यक्ति ने कहा भी कि समस्याग्रस्त कानूनों का जवाब कानून खत्म कर देना नहीं है बल्कि मनमाने ढंग से काम करने वाली सरकारों पर निवेशक भी सवाल उठा सकते हैं कि कल उनके साथ भी ऐसा व्यवहार हो सकता है। अतीत में ऐसा हो भी चुका है।

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