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श्रम सुधार या श्रमिक वर्ग के शोषण का लाइसेंस?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  05 15, 2020

राज्य सरकारों ने बंद पड़ी फैक्टरियां दोबारा शुरू करने के वास्ते श्रम कानूनों को शिथिल करने के लिए जो अध्यादेश पारित किए हैं उनको देखने का एक नजरिया यह भी है कि सरकारों को पता चल चुका है कि देश की अधिकांश श्रम शक्ति के लिए हालात कैसे हैं? संगठित क्षेत्र में अनुबंधित श्रमिकों को काम पर रखने वाली बड़ी फैक्टरियों को छोड़ दिया जाए तो सप्ताह में 72 घंटे का काम और बुनियादी सुरक्षा तथा कल्याणकारी मानकों की अनुपस्थिति आम बात है। ये अध्यादेश, कारोबार मालिकों को वैधानिक रूप से निरीक्षकों की निरंतर प्रताडऩा और इससे बचने की कीमत से निजात दिलाते हैं। परंतु इसके साथ ही ये इस बात को भी साफ जाहिर करते हैं कि हमारे राजनीतिक वर्ग में अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने तथा निवेश आकर्षित करने को लेकर किस कदर गलतफहमी है।

आबादी के एक बड़े हिस्से के अधिकारों की अनदेखी करना, खासकर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के अधिकारोंं की अनदेखी करना आसान है। चूंकि फैक्टरियों में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक प्रवासी हैं इसलिए मेजबान राज्य का सत्ता प्रतिष्ठान चुनावों के समय उनके वोट को लेकर भी बहुत चिंतित नहीं होता। कर्नाटक में प्रवासी श्रमिकों के साथ दुखद व्यवहार के बीच राज्य के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने जाने-अनजाने इस बात को रेखांकित भी किया। ये नागरिक भले ही पुणे, बेंगलूरु अथवा गुरुग्राम मेंं रहते हों लेकिन वे अपना वोट बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और ओडिशा मेंं ही देते हैं। और अगर उन्हें घुसपैठिया ही करार दे दिया जाए तो फिर भला उनके शोषण की परवाह ही किसे है। बंगाल के मुस्लिम कामगारों को आमतौर पर घुसपैठिया होने की तोहमत झेलनी पड़ती है।

वाम आंदोलनों को छोड़ दिया जाए तो देश के श्रमिकों का ऐसा निरंतर और स्पष्ट शोषण कभी किसी की राजनीति में शामिल नहीं रहा। एक समय वाम शासित रहे पश्चिम बंगाल और केरल में कुछ अभियान जरूर छिड़े जो प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों पर या प्रवासी श्रमिक संरक्षण कानून लागू करने पर केंद्रित थे।

अब शोषण का लाइसेंस जारी करने वाली जो नीति सामने आई है उसमेंं प्रधानमंत्री के हालिया आत्म निर्भर और समृद्ध भारत बनाने से संबंधित कोई दृष्टि नजर नहीं आती है। बल्कि हकीकत तो यह है कि उनकी सरकार ने सन 2017 मेंं स्टार्ट अप इंडिया अभियान के साथ इसकी दिशा पहले ही तय कर दी थी। उस वक्त श्रम मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी थी कि वे स्टार्टअप को कम से कम पांच वर्षों तक छह श्रम कानूनों के मामले में स्व प्रमाणन की छूट दें। कई राज्यों ने इस सलाह को माना भी था। इन कानूनों में भविष्य निधि, बीमा, ग्रैच्युटी और ध्यान देने वाली बात है कि अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों की कार्य स्थिति जैसी बातें शामिल थीं। यह विभिन्न प्रकार के नियमन से किनारा करने की खुली छूट है। जब आईएलऐंडएफएस से लेकर येस बैंक जैसे बड़े शक्तिशाली निगमों के प्रबंधन और मालिकान कारोबारी नैतिकता को लेकर चिंता नहीं दिखाते तो छोटे कारोबार मालिकों से इसकी अपेक्षा करना बेमानी है।

इसके बावजूद यह बात बेचैन करने वाली है कि विनिर्माताओं को औपचारिक रूप से यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वे श्रमिकों के अधिकारों को कम कर सकें। ऐसा कारोबारी सुगमता बढ़ाने के नाम पर किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार के इन कदमों की बदौलत डॉलर में निवेश की बाढ़ आ जाएगी क्योंकि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे जिन अधिनायकवादी राष्ट्रों से हमारी प्रतिस्पर्धा है वहां भी श्रमिक अधिकारों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है।

असली सबक यह है कि उस तरीके में सुधार लाया जाए जिसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के नियमन और नियामकीय तथा प्रवर्तन एजेंसियां अनुपालन में सुधार के लिए काम करती हैं।

जैसा कि पूर्व अफसरशाह के पी कृष्णन ने हाल ही में एक आलेख में कहा भी कि अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम के अधीन परिस्थितियां सुविचारित हैं लेकिन वे इतनी कठिन हैं कि कारोबारियों के लिए उनका अनुपालन करना कठिन और महंगा हो जाता है। इसके अलावा निरीक्षकों के लिए भी उनकी निगरानी करना आसान नहीं होता।

उदाहरण के लिए कानून के अनुसार प्रवासी श्रमिकों को नियमित श्रमिकों के अनुरूप ही वेतन मिलना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें विस्थापन भत्ता, यात्रा भत्ता, यात्रा के दौरान भुगतान आदि मिलना चाहिए। ये सारी चीजें मिलकर उनको काम पर रखने की लागत को अव्यावहारिक स्तर तक बढ़ा देती हैं। इससे ठेकेदार और कारोबार मालिक इस बात के लिए प्रोत्साहित होते हैं कि वे पंजीयन को कम करके बताएं। इसका असर हमें हाल मेंं तब देखने को मिला जब बड़े शहरों से बड़ी तादाद में बेकार हुए प्रवासी श्रमिकों का पलायन शुरू हुआ।

बहरहाल, कुछ राज्यों ने अधिक सार्थक श्रम सुधारों को अंजाम देते हुए नौकरी पर रखने या निकालने की 100 की प्रतिबंधात्मक सीमा को शिथिल किया। यह सीमा सन 1980 से लागू थी। कुछ राज्यों ने तयशुदा अनुबंध का उपयोगी उपाय भी अपनाया जो कहीं अधिक मजबूत संकेत देने वाला है।

कमजोर श्रमिक अधिकारों की मदद से निवेश आकर्षित करने की बात की जाए तो यह निवेशकों के लिए केवल एक पहलू है। उनके लिए उत्पादकता एक अन्य पहलू है। इस मामले में भारतीय श्रम का प्रदर्शन कमजोर है। पानी से लेकर बिजली और विनिर्माण की इजाजत तक सारी चीजों की मंजूरी एक अन्य समस्या है। इन बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने के लिए तो बिचौलियों का एक पूरा उद्योग खड़ा हो गया है। इसके अलावा अगर आप बहुत अमीर नहीं हैं तो भारत में रहना भी कोई आसान काम नहीं है। सड़कों पर पैदल सैकड़ों मील का सफर तय करते प्रवासी श्रमिकों की मौजूदगी के अहसास से भी आप तभी बच सकते हैं जब आपके पास इतना पैसा हो कि आप चहारदीवारी वाले महंगे आवास में रह सकें।

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