बिजनेस स्टैंडर्ड - कौन वहन करेगा मौजूदा नुकसान?
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कौन वहन करेगा मौजूदा नुकसान?

नीलकंठ मिश्रा /  May 13, 2020

कोविड-19 के सक्रिय मामलों के निकट भविष्य में समाप्त होने के कोई आसार नहीं हैं। ऐसे में यह स्पष्ट हो चुका है कि हमें वायरस के साथ ही जीना होगा। केरल जैसी जगहों में यह अभी भी संभव है क्योंकि वहां सक्रिय मामले अब दो तिहाई तक घट गए हैं। देश के 300 से अधिक ग्रीन जोन वाले जिलों में भी ऐसा हो सकता है। परंतु अधिकांश बड़े राज्यों में जहां हजारों लोग संक्रमित हैं और मामलों के दोगुना होने की दर अभी भी 8 से 12 दिन है, वहां यह संकट जल्दी टलता नहीं दिखता।

ऐसे मेंं आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना और सामाजिक दूरी को अपनाना ही एक उपाय रह गया। कम से कम तब तक जब तक कि इस वायरस का इलाज या टीका नहीं आ जाता। यह हालात लंबे समय तक जारी रहने वाले हैं। ऐसे हालात में जबकि हम जिंदा रहने और आजीविका को बचाए रखने के दो लक्ष्यों के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश में हैं, ऐसे में एक नया देशव्यापी लॉकडाउन अब अवांछित है। इसके बजाय अगर मामले बढ़ते हैं तो विभिन्न जिले ग्रीन से ऑरेंज और आरेंज से रेड जोन में बदलेंगे और अगर मामले घटते हैं तो यह क्रम उलट जाएगा।

अगर ऐसा होता है तो कई कामगारों और उपक्रमों को आय का लंबा नुकसान होगा। यह प्रभाव ऐसे क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा जहां प्रतिबंध लागू हैं बल्कि खपत के चैनल के माध्यम से इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी होगा।

इसे समझने के लिए दो उदाहरणों पर काम करते हैं। पहले और सबसे गंभीर लॉकडाउन के दौरान भी बिजली उत्पादन का काम जारी रहा। परंतु मांग एक चौथाई रह जाने के कारण बिजली उत्पादन और वितरण कंपनियां दोनों बुरी तरह प्रभावित हुईं। इसी प्रकार ईंधन के खुदरा कारोबार की अनुमति दी गई लेकिन करीब अप्रैल में पेट्रोल और डीजल की खपत में दो तिहाई की कमी आई। इससे तेल विपणन कंपनियां और रिफाइनरी दोनों प्रभावित हुईं।

आय को हो रहे नुकसान की बात करें तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के पूर्वानुमान में अर्थशास्त्री जिस तरह लगातार कटौती कर रहे हैं उससे पता चल रहा है कि आय में कमी आ रही है। बीते दो महीनों में चालू वर्ष के अनुमान में 8.5 लाख करोड़ रुपये की कटौती की गई है। पूर्वानुमान के संशोधित आंकड़ों के प्रकाशन में कुछ सप्ताह के अंतराल को देखते हुए बहुत हद तक यह संभव है कि दूसरे लॉकडाउन का असर पूरी तरह इन अनुमानों में नजर न आए। जाहिर है तीसरा लॉकडाउन और वायरस के साथ लंबी लड़ाई भी इसमें शामिल नहीं है। जाहिर है आय को होने वाला वास्तविक नुकसान कहीं अधिक हो सकता है। मान लेते हैं कि यह राशि 10 लाख करोड़ रुपये होगी। ध्यान रहे कि यह केवल एक अनुमान है।

इस लागत का बोझ कौन वहन करेगा? किसी अर्थव्यवस्था की समेकित आय निजी व्यक्तियों, कंपनियों (मुनाफा) और सरकार (कर) में बंटी रहती है। भारत में व्यक्तिगत आय इसके दोतिहाई के बराबर है। सरकार छठे हिस्से की हिस्सेदार है और शेष कंपनियों का मुनाफा। जीडीपी को 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान इसी अनुपात में नहीं बंटेगा। कंपनियां अपने खर्च को केवल वेतन, किराये और ब्याज जैसी तयशुदा लागत पर रोक नहीं पाएंगी। यानी नुकसान में उनकी हिस्सेदारी अधिक होगी। सरकार भी सामान्य से अधिक प्रभावित होगी क्योंकि कर नुकसान के अलावा उसे महामारी से निपटने में स्वास्थ्य सेवा पर होने वाले खर्च का बोझ भी उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा उसे प्रवासी श्रमिकों के रहने, आवागमन और खानपान की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। यानी देश के कामगारों में बहुत कम को वेतन मिलेगा और व्यक्तिगत आय में भारी गिरावट आएगी।

इस नुकसान पर हम सबको कितना ध्यान देना चाहिए? व्यक्तिगत स्तर पर देखें तो आय का नुकसान खपत में कमी और बचत में कमी में बंटा हुआ है। वास्तव में उन लोगों के नुकसान पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिनके पास कोई बचत ही नहीं है और उनकी खपत केवल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए है। इस पर कहीं कोई बहस नहीं है। सरकार के समक्ष अपनी चुनौतियां हैं लेकिन संप्रभु सरकार होने के नाते वह भविष्य की मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन के जोखिम से निपटने का काम कर सकती है।

कंपनियों की गंवाई गई आय की समस्या को हल करते हुए कई जटिल प्रश्न उठ खड़े होते हैं। एक ओर वितरित किया जाने वाला लाभ (भविष्य के कर दाता निजी कंपनियों का समर्थन क्यों करें ?) और दूसरी ओर उत्पादक क्षमता। ये कंपनियां कर चुकाती हैं और लोगों को रोजगार देती हैं। ये लोग कर चुकाते हैं, खपत करते हैं और इस तरह वृद्धि को आगे बढ़ाते हैं। इससे भी अहम बात यह है कि चूंकि कंपनियां अपनी जमापूंजी खर्च करने पर मजबूर हैं। देश की मध्यम अवधि का वृद्धि अनुमान खत्म हो रहा है।

कंपनियां जिस पैमाने पर काम करती हैं वह आकार हासिल करने में और पूंजी जुटाने में कई वर्ष का समय लग जाता है। जैसा कि जोहो कैपिटल के संस्थापक ने हाल ही में कहा कि दो दशक पहले जब उन्होंने चंद लोगों के साथ काम शुरू किया था, तब वह केवल छोटी परियोजनाओं पर काम कर सकते थे जो तत्काल राजस्व मुहैया कराएं। परंतु अब बचाव के लिए पूंजी मौजूद है तो फर्म महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में निवेश कर रही है ताकि वह सॉफ्टवेयर क्षेत्र में वैश्विक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों से मुकाबला कर सके। इससे 5 से 10 वर्षों में उसका राजस्व बेहतर होने की अपेक्षा है।

अपने उदाहरण की ओर वापस लौटें तो समग्र रूप से देश को ही इन नुकसानों को वहन करना होगा। अगर राज्य ने इन्हें वहन नहीं किया और छोटे उपक्रमों को पूंजी गंवाने या नाकाम होने दिया गया तो इसका वृद्धि और करों पर बहुत बुरा असर होगा। सबसे बुरी बात यह कि एक बार ऋण डिफॉल्ट की शुरुआत होने के बाद ये पूरे वित्तीय तंत्र को जोखिम में डाल सकते हैं। ऐसे में सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है लेकिन तब तक वित्तीय तंत्र और उपक्रमों को नुकसान हो चुका होगा।

कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत के पास असीमित राजकोषीय गुंजाइश नहीं है लेकिन अब हमें इस बहस से आगे निकलना चाहिए कि हम घाटा बरदाश्त कर सकते हैं या नहीं। बल्कि हमें इस बात पर विचार करना होगा वृहद आर्थिक स्थिरता से बचाव के लिए क्या करना आवश्यक होगा। यदि नॉमिनल जीडीपी दर गिरने दी गई तो रेटिंग में गिरावट अधिक हो सकती है।

(लेखक क्रेडिट स्विस में एपैक स्ट्रैटजी के को-हेड एवं इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं)

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