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महामारी के दौर में 'विनम्र' नेताओं का अभाव

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  May 12, 2020

महामारी के इन दिनों में किस तरह का नेतृत्व असरदार दिख रहा है? एक स्तर पर किसी भी तरह का नेतृत्व हो, आखिर राष्ट्रीय संकट का सुपरिचित प्रभाव ही यह होता है कि उस समय पदासीन किसी भी शख्स के प्रति जन-समर्थन बढ़ जाता है। हालांकि 'झंडे तले इक_ा होने' वाला प्रभाव अक्सर अस्थायी ही होता है।

मसलन, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की स्वीकृति रेटिंग मार्च की शुरुआत में ऋणात्मक 10 अंक पर थी, यानी उनके कामकाज को नापसंद करने वालों की संख्या पसंद करने वाले लोगों से 10 फीसदी अधिक थी। लेकिन कोरोनावायरस का प्रसार शुरू होने के बाद इसमें सुधार आने लगा। मार्च के अंत तक स्वीकृति रेटिंग सुधार के साथ ऋणात्मक चार अंक पर पहुंच गई थी। लेकिन हालात काबू में न आता देख फिर से यह मार्च के शुरुआती दिनों के स्तर पर पहुंच गई है।

लिहाजा उन संकटों में से एक है जिनमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कुछ कर रहे हैं, बल्कि इससे फर्क पड़ता है कि कैसे कर रहे हैं? लोकप्रियता के मोर्चे पर पिछली तमाम चुनौतियों को पार कर जाने वाले नेता भी इस समय जूझते नजर आ रहे हैं। अपनी मर्दाना राष्ट्रवादी सख्त छवि के लिए विख्यात रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन को ही लीजिए। पुतिन अब भी खासे लोकप्रिय हैं, उनकी लोकप्रियता रेटिंग 60 फीसदी के करीब है। लेकिन अपनी महाशक्ति आकांक्षा के अनुरूप स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे देश में महामारी के कदम रखने के बाद उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ा है। वर्ष 1999 में सत्ता पर काबिज होने के बाद से यह उनकी लोकप्रियता का निम्नतम स्तर है। पिछली बार इसके आसपास की रैंकिंग 2013 में रही थी। उस समय रूस ने क्रीमिया पर हमला पर उसे अपने कब्जे में ले लिया था और उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई थी। शायद उनके पड़ोसियों को कोरोनावायरस के प्रसार से कुछ अधिक की चिंता होनी चाहिए।

पुतिन आम तौर पर आत्म-विश्वास से लबरेज नेता हैं लेकिन कोविड-19 संकट के समय वह इतने लो-प्रोफाइल रहे हैं कि उनके प्रवक्ता को यह स्पष्ट करना पड़ा कि राष्ट्रपति किसी बंकर में नहीं हैं। सच तो यह है कि अगर ऐसी महामारी को किसी तरह राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का कोई तरीका होता तो पुतिन ऐसा करने वाले पहले नेता होते। हालांकि वह अब भी ऐसा कर सकते हैं। दुनिया भर के लोकप्रिय ताकतवर नेताओं ने इस अवसर का इस्तेमाल अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने या अपनी ताकत को मजबूत करने में किया है। फिलीपींस के रोड्रिग दुतेर्ते ने एक स्वतंत्र मीडिया प्रतिष्ठान को बंद कर दिया। कोरोनावायरस को 'लिटल फ्लू' कहने वाले ब्राजील के जाइर बोल्सोनारो मास्क पहनने से इनकार करते हैं, लॉकडाउन-विरोधी समर्थकों की एक भीड़ में जानबूझकर खांसते नजर आए और अपने प्रांतों के गवर्नरों के नियंत्रणकारी तरीकों की आलोचना भी की है।

यह हाल केवल दक्षिणपंथी नेताओं का ही नहीं है, मैक्सिको के वामपंथी राष्ट्रपति भी इस दौरान एहतियात बरतते हुए नहीं दिखे। हंगरी के विक्टर ऑर्बन ने महामारी का इस्तेमाल खुद को इतनी आपातकालीन शक्तियां प्रदान कर दी हैं कि फ्रीडम हाउस के समीक्षकों की नजर में हंगरी को अब लोकतांत्रिक देश माना ही नहीं जाना चाहिए।

लोगों को ऐसा लगेगा कि जिस हाल में वास्तविक क्षमता और डॉक्टरों, महामारी-विशेषज्ञों एवं आपूर्ति शृंखला जानकारों पर विश्वास अधिक मायने रखता है, उस समय हालिया समय के प्रभावी लोकप्रिय नेता मातम मनाने के लिए आएंगे। आप जर्मनी की क्वांटम रसायन में पीएचडी डिग्रीधारी चांसलर एंगेला मर्केल  की सजग, डेटा एवं विशेषज्ञता-आधारित नेतृत्व या ताइवान के सेई इंगवेन (उनके उप राष्ट्रपति जॉन्स हॉॅपकिंस में शिक्षित महामारी-विशेषज्ञ हैं) की तरफ इशारा कर सकते हैं। निश्चित रूप से मतदाता ही तय करेंगे कि कौन सा रवैया बेहतर है?

मैं बहुत आश्वस्त नहीं हो सकता। मर्केल और सेई दोनों की ही इस बात के लिए तारीफ हुई है कि वायरस पर काबू पाने के लिए उन्होंने विज्ञान का रुख किया और असाधारण अनिश्चितता के दौर में नीति-निर्माण को लेकर काफी पारदर्शिता बरती।

सत्ता की आकांक्षा रखने वाले नेता भी इस समय अपना नजरिया दिखाने की कोशिश में रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने की होड़ में लगे जो बाइडन ने अपने लिए एक जन स्वास्थ्य सलाहकार समिति बनाई हुई है। वहीं राहुल गांधी भी लॉकडाउन के प्रभावों से अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने के मुद्दे पर दो मशहूर अर्थशास्त्रियों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र में नजर आए। फिर भी सच यह है कि बेहतर जानकारी रखने वाले लोग सत्ता के भीतर या बाहर बैठे नेताओं की ऐसी कोशिशों का उपहास करते हुए नजर आएंगे।

नेताओं को अपनी जानकारी एवं समझ को लेकर विनम्र होना चाहिए और उससे भी ज्यादा इस बात का जिसकी उन्हें जानकारी न हो। कोरोनावायरस जैसी स्थिति में सच यह है कि महामारी-विज्ञान, श्वसन संबंधी बीमारियों, वायरस संक्रमण या औचक आपूर्ति झटकों के बारे में अध्ययन करने वाले लोगों को भी ऐसी परिस्थितियों के बारे में बहुत पता नहीं होता। फिर भी वे लोग हर वक्त सीख रहे होते हैं और नीति-निर्माताओं एवं जनता दोनों को ही सही राह दिखाने की एकदम माकूल स्थिति में होते हैं। राजनेताओं को यह साफ कर देना चाहिए कि वे मामले की बागडोर उन लोगों पर छोड़ रहे हैं जिन्हें कुछ महारत हासिल है। इसी तरह जानकारों को भी खुलकर कहना चाहिए कि वे किस तरह नई बातें सीखकर अपनी धारणाओं को नई समझ में ढाल रहे हैं। नेतृत्व को पूरे विश्वास के साथ अपनी बात कह देना भर मानने की सोत छोटी, अतिसरलीकृत, अदूरदर्शी एवं पूर्णत: गलत मंत्र है और दुनिया को मौत के लोकलुभावन चक्कर में डालने वाला है।

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