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कोविड के बाद होगी एक बेहतर दुनिया?

अजित बालकृष्णन /  May 12, 2020

हममें से अधिकांश लोग, अगर पेशेवर दार्शनिक न हों तो हमारा जीवन अपने करियर और परिवार की खुशहाली के इर्दगिर्द बीतता है। इस दौरान हम उस वैचारिक ढांचे के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते जिसने हमें अनजाने ही घेर रखा है।

उदाहरण के लिए यह कि भारतीय राज्य को आर्थिक मसलन बैंक ब्याज दरें तय करने, गेहूं या चावल का बाजार मूल्य तय करने में क्या भूमिका निभानी चाहिए और क्या ऐसे निर्णय पूरी तरह बाजार ताकतों पर छोड़ देने चाहिए। दुनिया में वैचारिक बहस उस समय से चली आ रही है जब ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस ने सन 1930 के दशक में इसकी शुरुआत की थी। उदाहरण के लिए भारत ने सन 1950 के दशक मे एक्टिविस्ट राज्य की अवधारणा को अपनाया और योजना आयोग का गठन किया। इसके बाद उसने सन 1990 के दशक के आरंभ में इन तमाम अवधारणाओं को बाजारोन्मुखी रुख के लिए ठुकरा दिया। परंतु मौजूदा कोविड-19 महामारी के दौरान देश के तमाम इलाकों में स्थानीय अनौपचारिक संगठन खाना बांटने और लॉकडाउन के कारण आजीविका गंवा चुके पीडि़त लोगों को आश्रय मुहैया कराने की घटनाओं में प्रमुख रूप से सामने आए। क्या यह बात हमारे भीतर एक नया नजरिया तैयार करेगी कि राज्य और बाजार वाकई मायने नहीं रखते और नागरिकों का एक दूसरे के साथ सहयोग और सहायता करना ही मायने रखता है?

या फिर वैश्वीकरण की विचारधारा का उदाहरण ले सकते हैं। 19वीं सदी के मध्य में इसकी शुरुआत 'श्वेत व्यक्ति के बोझ' (औपनिवेशिक शासकों द्वारा शासितों का ध्यान रखना) के रूप में हुई थी। इसका लक्ष्य था उपनिवेशवाद को बौद्धिक रूप से उचित ठहराना। समय-समय पर इसे उन्नत किया गया। ताजातरीन मामला है ब्रेटन वुड्स समझौता। इस समझौते के तहत पश्चिमी देशों के नियंत्रण वाले संस्थान मसलन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई। इसके साथ ही मुक्त व्यापार को तृतीय विश्व के देशों की गरीबी का हल बताया गया। वैश्वीकरण और व्यापार अवरोधों को कम करना जीवन के प्रति आधुनिक रुख का संकेत बन गया।

तब से अब तक यही विचारधारा सर्वोच्च बनी हुई है। ध्यान दें तो पता चलता है कि कोविड-19 के प्रसार का रुझान भी व्यापारिक रुझानों के अनुरूप ही है। जिन शहरों का अंतरराष्ट्रीय संपर्क ज्यादा था वे हॉटस्पॉट बन गए हैं। इन्हीं शहरों को सबसे अधिक आर्थिक नुकसान होने की आशंका भी है। क्या यह वैश्वीकरण की अवधारणा को प्रभावित करेगा?

एक और उदाहरण हमारे बड़े केंद्रीकृत कार्यालय भी हैं जहां हमारे सबसे काबिल कर्मी बैठते हैं और जो उच्च उत्पादकता हासिल करने का जरिया है। मुंबई या दिल्ली या फिर न्यूयॉर्क या लंदन जैसे बड़े और महंगे शहर की किसी ऊंची इमारत में मौजूद मुख्यालय को एक संगठन की विश्वसनीयता और उसकी प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। भले ही कर्मचारियों को वहां पहुंचने में रोज कई घंटे का समय लग जाता हो। एक कार्यालय के भीतर भी कर्मचारियों को उनके अधिकार के अनुसार ही जगह का आवंटन किया जाता है। परंतु बीते एक महीने के दौरान कामकाज से जुड़ी नई हकीकत हम सबको यही सिखा रही है कि घर से काम करना भी उतना ही उत्पादक है जितना कि अपने प्रमुख कार्यालय में बैठकर काम करना। पूरा दिन घर पर रहना और ऑडियो या वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से काम करना बौद्धिक काम करने वालों के लिए काफी उत्पादक प्रतीत होता है। क्या इसका अर्थ यह है कि अब केंद्रीकृत कार्यालयों की अवधारणा को शंका की दृष्टि से देखा जाएगा और ज्यादातर कर्मचारी स्थायी रूप से घर से काम करेंगे?

कोविड-19 से सर्वाधिक प्रभावित उद्योगों की सूची में भी एक खास रुझान देखने को मिलता है। एयरलाइंस इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं, दूसरे नंबर पर होटल कारोबार आता है। वाहन क्षेत्र में वाहन निर्माता, वितरक, कलपुर्जा निर्माता, पेट्रोल पंप और सुधारक इस सिलसिले में तीसरे नंबर पर हैं। इसमें दो राय नहीं कि ये उद्योग पिछले वर्ष से ही संघर्षरत हैं। इससे यह भी साफ होता है कि हम जो यात्राएं करते हैं उनमें से सभी जरूरी नहीं होतीं। हमें अचानक यह भी पता चला है कि अधिकांश देशों में तेल की कुल खपत में आधे से अधिक केवल कार उद्योग के हिस्से है। यह भी खबर है कि बड़े शहरों में 50 फीसदी से अधिक जगह कार पार्किंग में इस्तेमाल होती है। संभव है कि कारों के स्वामित्व और उनके इस्तेमाल में लगातार गिरावट के बाद पार्किंग की जगहों पर लोगों के लिए पार्क बनाए जा सकें।

बहरहाल कार उद्योग के पराभव का यह अर्थ भी हो सकता है कि विनिर्माण के जादुई रोजगार प्रदाता होने की बात केवल भ्रम साबित हो। अब तक तो तमाम राजनेता और नीति निर्माता लाखों युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए इसी के भरोसे रहे आए थे।

इन उद्योगों के अलावा खेल उद्योग को भी गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है। देश में क्रिकेट और फुटबॉल ही प्रमुख खेल हैं। अब तक यही माना जाता रहा है कि हालात अच्छे हों या बुरे, प्रशंसक मैच देखने अवश्य जाएंगे, वहां खाएंगे-पिएंगे, चीजें खरीदेंगे। इसके साथ व्यापक प्रसारण अधिकार, प्रायोजन आदि सब जुड़े रहते हैं। बहरहाल, इससे जुड़ी एक बात यह भी है क्या भविष्य में सोफे पर बैठकर खिलाडिय़ों को खेल के मैदान पर जलवे बिखेरते हुए देखने के बजाय हम व्यायाम पर अधिक ध्यान देंगे? मसलन रोज आधा घंटा योग करना?

क्या कोविड-19 के बाद एक नई दुनिया हमारी प्रतीक्षा कर रही है? एक ऐसी दुनिया जहां आधे से अधिक कर्मचारी घर से ऑनलाइन काम करेंगे? क्या रोजगार की तलाश में शहरों की दिशा में भागने का सिलसिला थमेगा? क्या हम अब अपनी भावनाओं को दूसरों से साझा करने के लिए ऑनलाइन माध्यमों का सहारा लेंगे? क्या हम अपने शहरों में जिस हवा में सांस लेते हैं वह एक बार फिर स्वच्छ होगी और आकाश दोबारा नीला हो जाएगा? क्या इसका अर्थ स्वस्थ आबादी और उत्पादक कारोबार के रूप में हमारे सामने आएगा?

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