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लॉकडाउन हटाने की बेहतर हो बुनियाद

अजय शाह /  May 11, 2020

जब भारत ने दुनिया का सबसे अधिक सख्ती वाला लॉकडाउन घोषित किया तो इसे लेकर काफी चिंता जताई गई थी। ऐसे में लॉकडाउन समाप्त करने को लेकर भी एक समझदारी भरी प्रक्रिया अब नजर आ रही है। इस माहौल में आर्थिक नीति के क्रियान्वयन को लेकर विधिक और संस्थागत उपायों में कमजोरियां भी नजर आई हैं। इस बीच संभावना यही है कि यह महामारी जल्दी जाने वाली नहीं है। ऐसे में बेहतर यही होगा कि महामारी के दौर में आर्थिक नीति को लेकर बेहतर विधिक और संस्थागत बुनियाद तैयार करने की दिशा में काम किया जाए।

दुनिया के अन्य हिस्सों में कोविड-19 को लेकर लगे प्रतिबंध भारत जितने कड़े नहीं हैं। ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भारत के कदमों को दुनिया में सर्वाधिक प्रतिबंधात्मक बताया है। एमेजॉन दुनिया के कई देशों में कारोबार करती है और उसके काम में सबसे अधिक गिरावट भारत में आई।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वर्ष 2020 की शुरुआत काफी खराब रही। ऐसे में कमजोर अर्थव्यवस्था पर लॉकडाउन के कड़े प्रतिबंधों के असर को लेकर भी काफी चिंता जताई गई। अब हम देख रहे हैं कि प्रतिबंध समाप्त करने की दिशा में समझदारी भरी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रतिबंधों में ढील देने की शुरुआत 18 अप्रैल को हुई और 1 मई को रियायतों में और अधिक इजाफा किया गया। आकार और विविधता के मामले में भारत की तुलना यूरोपीय संघ से की जा सकती है। ऐसे में स्थानीय हालात के मुताबिक अलग-अलग कदम उठाना समझा जा सकता है। पूरे देश के लिए एक नीतिगत ढांचे के बजाय हमने तीन अलग तरह के जिलों को ध्यान में रखकर नीति तैयार की।

इस राह पर आगे बढऩा समझदारी भरा होगा। अधिक विकेंद्रीकृत रुख अपनाने के अपने फायदे हैं। देश में हर 10 किलोमीटर की दूरी पर जीवन और आजीविका के तौर तरीकों में बदलाव आने लगता है। असम मेंं सूरज शाम 6 बजे डूबता है जबकि गुजरात में यह शाम 7.20 बजे डूबता है। जाहिर है पूरे देश में सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक वाहन चलाने देने का एक समान नियम सही नहीं होगा। ऐसे में जाहिर है जो बात एक जगह पर लागू होगी वह देश के किसी दूसरे हिस्से के लिए गलत भी हो सकती है। ऐसे में स्थानीय सूचनाओं, समस्या समाधान के स्थानीय तरीकों और सामाजिक दूरी जैसे प्रतिबंध पर स्थानीय नियंत्रण की बहुत अधिक अहमियत है।

मौजूदा दौर में सबसे बड़ी समस्या क्या है? समस्या है गृह मंत्रालय का 1 मई का आदेश जो आर्थिक नीति से संबंधित है। इस आदेश में लिखे शब्द पूरे देश की आजीविका को बहुत गहरे तक प्रभावित करने वाले हैं। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का निर्माण भूकंप या चक्रवात से निपटने के लिए किया गया था: यह देशव्यापी आर्थिक नीति का संचालन करने के लिए उचित नहीं है।

आर्थिक नीति तभी बेहतर काम करती है जब नियम उल्लंघन की जवाबदेही दीवानी प्रकृति की हो। सभी आर्थिक कदम वित्तीय लाभ की तलाश में ही उठाए जाते हैं। अगर गलत तरीके से अर्जित धन के तीन गुना राशि के बराबर जुर्माना लगाया जाए तो नियम उल्लंघन की आशंका को कम किया जा सकता है। परंतु आपदा प्रबंधन अधिनियम इसे आपराधिक बनाता है। इससे अधिकारियों और जनता के बीच का रिश्ता बिगड़ेगा। विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम (फेरा), 1973 के मामले में हमने देखा कि आपराधिक जवाबदेही का कितना बुरा परिणाम होता है। हाल के वर्षों में फेमा में इसका दोहराव देखने को मिला।

आमतौर पर हमने देखा है कि किसी भी कानून में आपराधिक जवाबदेही का समावेश भय को जन्म देता है। गत दशक में कंपनी अधिनियम और निजी क्षेत्र पर उसके नकारात्मक असर से हम सभी वाकिफ हैं। आज जबकि आपदा प्रबंधन अधिनियम प्रमुख आर्थिक कानून है तो कंपनियों पर एक बार फिर विपरीत प्रभाव का जोखिम है।

आर्थिक नीति तब सही काम करती है जब समस्याओं को समझने के लिए एक धीमी, बौद्धिक और मशविरे वाली प्रक्रिया हो, लागत-लाभ का भली भांति विश्लेषण किया जाए, अनावश्यक हस्तक्षेप न किए जाएं और छोटे-छोटे कदम उठाते हुए आगे बढ़ा जाए। आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 में ऐसी जांच परख और संतुलन की गुंजाइश नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस कानून की परिकल्पना कभी आर्थिक कानून के रूप में की ही नहीं गई थी।

राज्य की उत्पीडऩ शक्ति को बरतने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है और इसमें विधायिका, कार्यपालिका समेत तमाम तरह के संतुलन शामिल होते हैं। उत्पीडऩ के हर तत्त्व को लेकर हजारों सवाल हैं जिन्हें कानून की स्पष्ट व्याख्या के साथ साफ किया जाना चाहिए। यह काम न्यायशास्त्र और अधीनस्थ कानूनों की मदद ली जा सकती है। आपदा प्रबंधन अधिनियम अथवा 1 मई, 2020 के आदेश के पहले इनमें से कुछ नहीं किया गया। इसके परिणामस्वरूप इसे लेकर तमाम तरह के भ्रम उत्पन्न हो गए हैं कि क्या किया जा सकता है और क्या नहीं किया जा सकता। देश भर के लाखों अधिकारी मनमाने ढंग से यह तय कर सकते हैं कि किसे अनुमति देनी है और किस पर प्रतिबंध लगाना है।

भारतीय अफसरशाही संस्कृति में अच्छे नतीजों को लेकर जवाबदेही कम ही रहती है लेकिन जब भी कुछ गड़बड़ होती है तो लोगों में यह भय उत्पन्न हो जाता है कि वे संकट में पड़ जाएंगे। जाहिर है इससे अधिकारियों को प्रतिबंध के पक्ष में पूर्वग्रह ग्रसित होने को बढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए दुनिया के तमाम बड़े देशों ने फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन इसका जमीनी क्रियान्वयन अपने ग्राहक को जानें (केवाईसी) और आधार के रूप में हुआ जो आम जनता के बिल्कुल अनुकूल नहीं है। यह समस्या सामाजिक दूरी के नियमों के क्रियान्वयन में आड़े आती है। पूरे देश में लोगों को इसे लेकर बहुत खराब अनुभवों का सामना करना पड़ रहा है। इसका लोगों के नैतिक साहस, आशावाद और आत्मसम्मान पर नकारात्मक असर पड़ता है।

बाजार अर्थव्यवस्था बहुत नाजुक रूप से जटिल पर्यावास में काम करती है जहां लोग स्वैच्छिक रूप से लेनदेन किया करते हैं। ऐसे में राज्य की उत्पीडऩ शक्ति बाजार अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकती है। प्रश्न यह है कि कोविड-19 कोई भूकंप या बाढ़ जैसी समस्या नहीं है, यह स्थानीय भी नहीं है और इसका जल्दी अंत भी नहीं होने वाला है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे बड़े आर्थिक नीति कदमों से संबंधित जटिलताओं को पहचानें। ये वे जटिलताएं हैं जो केंद्र सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन अधिनियम के क्रियान्वयन के बीच सामने आ रही हैं। इसके बाद इनका हल तलाशने का प्रयास करना चाहिए।

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)

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