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कोरोना संकट में छिपा कृषि सुधारों का एक मौका

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  May 10, 2020

कोविड-19 का फसलों से शायद कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इस महामारी के फैलने का खेती करने के तौर-तरीकों पर दूरगामी प्रभाव छोडऩे की संभावना है, खासकर फसलों की बुआई, कटाई और भंडारण के तरीकों पर। महामारी फैलने के बाद प्रवासी मजदूरों के बड़ी संख्या में अपने घर लौटने से उनकी किल्लत हो गई है। इसके अलावा सभी जगहों पर स्वास्थ्य संबंधी एहतियात बरतने की जरूरत की वजह से खेती करने के ढंग में अभी से कुछ बदलाव दिखने लगे हैं। इनमें से कई बदलाव वायरस का खौफ खत्म हो जाने के बाद भी जारी रहने की उम्मीद की जा सकती है। इनमें से कुछ खास बदलाव हैं: खेत तैयार करने, बुआई और फसल कटाई की प्रक्रिया में मशीनों का अधिक प्रयोग, कूपन प्रणाली के जरिये खाद्यान्नों की खरीद, गोदामों एवं शीतगृहों को बाजार का दर्जा देना, निजी मंडियां खोलने की अनुमति और कृषक उत्पादक संगठनों द्वारा मंडी के बाहर लेनदेन करना।

श्रम बचाने वाले उपकरणों की मांग बढऩे से कृषि मशीनों के विनिर्माण एवं किराये पर लेने के काम में निवेश बढ़ेगा। इन विनिर्माताओं को प्रोत्साहन देने से इस प्रवृत्ति में और तेजी आएगी। मशीनीकरण से खेती में अधिक सटीकता आने से खेती की समग्र सक्षमता और लाभप्रदता में सुधार होगा।

इनके अलावा मंडियों में भीड़भाड़ रोकने के लिए इस साल कृषि उपजों की सरकारी खरीद एवं विपणन की दिशा में उठाए गए कुछ नए उपाय भविष्य में भी जारी रह सकते हैं। ग्रामीण स्तर पर अस्थायी हाट-बाजार लगाने, किसानों से सीधे खरीद की अनुमति देने और गोदामों एवं शीतगृहों को बाजार का दर्जा देने का काम इस साल कई राज्यों में किया जा चुका है और इन्हें आगे भी जारी रखा जा सकता है।

पंजाब और मध्य प्रदेश ने पूरी तरह से निजी कृषि बाजार गठित करने के लिए वैधानिक प्रावधान किए हैं ताकि मौजूदा सरकारी मंडियों के समक्ष प्रतिस्पद्र्धा खड़ी की जा सके। यह कृषि उपजों की मार्केटिंग पर राज्यों का एकाधिकार खत्म करने वाली एक रूपांतरकारी पहल है। किसानों को बाजार में अपनी उपज लाने के क्रम को लेकर कूपन जारी करने की व्यवस्था कोरोना संकट खत्म होने के बाद भी जारी रह सकता है। इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में मौजूद कुछ व्यावहारिक दिक्कतों को आसानी से दूर किया जा सकता है।

मजदूरों की अधिक जरूरत वाले धान की बुआई में कई इलाकों में एक खास बदलाव आने की पूरी संभावना दिख रही है। हरित क्रांति के बाद धान की पौध तैयार कर उसे पानी से भर खेतों में बोया जाता रहा है लेकिन बदले हालात में खेत में सीधे बीज ही लगाने की सदियों पुरानी परंपरा फिर से वापसी कर सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कई कृषि विश्वविद्यालय किसानों को खेतों में सीधे बीज डालने के लिए समझाने में लगे हुए हैं। खासकर मध्यम एवं अधिक नमी वाली मिट्टी में बीज बुआई से पानी, मजदूरी एवं समय की बचत होगी और उपज पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। खास उपकरण भी उपलब्ध हैं जो अलग-अलग परिस्थितियों में सीधी बुआई कर सकते हैं। मसलन, जीरो टिलेज सिस्टम या गहरी जुताई वाली मिट्टी या गीली जुताई वाले खेतों में बीज लगाने का काम। इनमें से कुछ मशीनें बीज के साथ उर्वरक और खरपतवार-नाशक का छिड़काव भी कर सकती हैं।

आईसीएआर के उप महानिदेशक (विस्तार) ए के सिंह के मुताबिक, धान के बीज की सीधी बुआई के बारे में किए गए जमीनी परीक्षणों के नतीजे उत्साहवद्र्धक हैं। भारतीय एवं अंतरराष्टï्रीय खेती अनुसंधान केंद्रों ने ये परीक्षण किए हैं। इस तरीके से प्रति हेक्टेयर खेत में बुआई की लागत में 5,000 से लेकर 6,000 रुपये तक की गिरावट देखी गई है। इसके अलावा सिंचाई के लिए पानी की जरूरत भी काफी कम है। नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान सीधी बुआई के लिए मुफीद बासमती चावल की विभिन्न किस्मों के विकास में लगा हुआ है। पहले से ही लोकप्रिय बासमती किस्मों- पूसा बासमती-1121 और पूसा बासमती-1509 में उपयुक्त जीन डालकर ऐसा करने की मंशा है। इससे बीज अंकुरित होने के बाद भी खरपतवार-नाशक का छिड़काव कर खरपतवार पर काबू पाने में सहूलियत होगी।

इसके साथ ही कोविड-19 ने फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने का एक मौका भी दिया है। मजदूरों और पानी से लबालब भरे खेतों की अधिक जरूरत वाले धान की जगह कम पानी की जरूरत वाले मक्का, कपास, सब्जियां और गर्मी की दालें बोई जा सकती हैं। सिंह का मानना है कि देश के 256 जिलों में पानी की अत्यधिक कमी को देखते हुए ऐसा करना अपरिहार्य भी हो चुका है। मक्के की खेती चावल की तरह ही लाभ दे सकती है क्योंकि इसकी मांग बढ़ी है, बाजार में बढिय़ा भाव है और उपज की तकनीक भी बेहतर हुई है। धान की तुलना में मक्के की खेती के लिए पानी की जरूरत बहुत कम होती है। इस तरह इनपुट लागत भी सापेक्षिक रूप से कम है। अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की अनुमति देकर जरूरी बाजार समर्थन दिया जाता है तो कई अन्य फसलें भी धान से प्रतिस्पद्र्धा कर सकती हैं।

अगर कोविड-19 महामारी की वजह से खड़े हुए अवरोध खेती में ऐसे मनचाहे बदलावों को प्रेरित कर सकते हैं तो फिर इसे इस महाविपदा के एक छोटे वरदान के तौर पर देखा जाएगा।

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